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संकल्प

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  लघु संकल्प मंत्र :  “ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः अद्यैतस्य (रात मे : अस्यां रात्र्यां कहे) मासोतमे मासे ………. २ मासे …………   ३ पक्षे ………… ४ तिथौ …………५  वासरे …………  ६  गोत्रोत्पन्नः ………… ७  शर्माऽहं/(वर्माऽहं/गुप्तोऽहं) ममात्मनः  सर्वारिष्ट निरसन पूर्वक सर्वपाप क्षयार्थं, दीर्घायु शरीरारोग्य कामनया धन-धान्य-बल-पुष्टि-कीर्ति-यश लाभार्थं,  श्रुति स्मृति पुराणतन्त्रोक्त फल प्राप्तयर्थं, सकल मनोरथ सिध्यर्थं  ……………  ८  करिष्ये।” सरल संकल्प मंत्र  “ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः श्रीमद् भगवतो महापुरूषस्य,विष्णुराज्ञया प्रवर्तमानस्य अद्य (रात मे : अस्यां रात्र्यां कहे) ब्रह्मणोऽह्नि द्वितीये परार्धे श्रीश्वेत वाराहकल्पे वैवस्वत मन्वन्तरे अष्टाविंशति तमे कलियुगे कलि प्रथमचरणे भारतवर्षे भरतखण्डे जम्बूद्वीपे आर्यावर्तैक देशान्तर्गते …………   १ संवतसरे महांमागल्यप्रद मासोतमे मासे ………. २ मासे …………   ३ पक्षे ………… ४ तिथौ …………५  वासरे …………  ६  गोत्रोत्पन्नः ………… ७  शर्माऽहं/(वर्माऽहं/गुप्तोऽहं) ममात्मनः...

जन्मदिन/जन्म दिन मनाने की भारतीय विधि

  वर्तमान युग में अधिकतर लोग पाश्चात्य सभ्यता से प्रभावित होकर अपना जन्म दिन रात में धूम धड़ाका करके मानते है । लोग रात्रि में पहले केक पर मोमबत्ती जलाकर उसे फूंक मार कर बुझा देते है, फिर उस केक को जिस पर उनका नाम लिखा होता है उसे काटकर सब लोगो को खिलाते है , उस रात्रि में लोग मौज-मस्ती करके माँस मदिरा का सेवन करते है जो कि सर्वथा गलत है ।  इस संसार में प्रत्येक जातक का जन्म किसी ना किसी उद्देश्य से ही हुआ है , ईश्वर ने हम सभी पर बहुत बड़ी कृपा की है कि हमें 84 लाख योनियों में मनुष्य योनि में जन्म दिया है।  हमें इस बात का अवश्य ही ध्यान देना चाहिए की ईश्वर ने हमें जितनी आयु दे रखी है , उसकी अवधि शने: शने: समाप्त हो रही है, इसलिए इस दिन हम ईश्वर से अपनी सभी पिछली जाने अनजाने में की गयी गलतियों के लिए क्षमा माँगते हुए उन्हें अब तक के जीवन के लिए धन्यवाद दें । उनसे प्रार्थना करें कि हमारा आने वाला जीवन और भी अधिक सार्थक और उद्देश्य पूर्ण साबित हो ।   हम जन्मदिन दिनांक के आधार पर मानते है लेकिन हमें अपना जन्मदिन तिथि के अनुसार मनाना चाहिए । तिथि नुसार जन्मदिन मनाने से...

शिव पूजा

   शिव जी की पूजा को श्रद्धा और भक्ति से किया जाना चाहिए। यह पूजा साधक को संतोष, सुख, समृद्धि, आत्मिक आनंद और आत्मा की मुक्ति की प्राप्ति में सहायता करती है। शिव जी की कृपा से भक्त की सभी कठिनाइयों को दूर किया जा सकता        शिव जी की पूजा स्नान समर्पण मंत्र    ॐ वरुणस्योत्तम्भनमसि वरुणस्य सकम्भ सर्ज्जनीस्थो | वरुणस्य ऋतसदन्यसि वरुणस्य ऋतसदनमसि वरुणस्य ऋतसदनमासीद् ||    कब करें :  शिव जी की पूजा के दौरान इस मंत्र के द्वारा उन्हें स्नान कराएं।     शिवलिंग पर जल चढ़ाने का मंत्र   मन्दाकिन्यास्तु यद्वारि सर्वपापहरं शुभम् । तदिदं कल्पितं देव स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम् ॥ श्रीभगवते साम्बशिवाय नमः । स्नानीयं जलं समर्पयामि।      कब करें :  शिव जी की पूजा के दौरान इस मंत्र के द्वारा शिवलिंग पर जल चढ़ाये।      भगवान शिव की यज्ञोपवीत समर्पण  मंत्र   ॐ ब्रह्म ज्ज्ञानप्रथमं पुरस्ताद्विसीमतः सुरुचो वेन आवः | स बुध्न्या उपमा अस्य विष्ठाः सतश्च योनिमसतश्च विवः ||    कब करें : ...

आचमन

  आचमन के समय हाथ धुटनो के भीतर हों। ब्राह्मण इतना जल पीये कि हृदय तक पहुँच सके, क्षत्रिय इतना जल पीये कि कण्ठ तक पहुँच सके और वैश्य इतना जल पीये कि तालु तक पहुँच सके। आचमन का जल पीते समय ओठ बहुत न खोले। अंगुलियाँ आपस में सटी हुई हों। जल मणिबंध की ओर से पीये। आचमन सदैव बैठ कर ही करना चाहिए, इसलिए द्वार पर आचमन में केवल कान स्पर्श करते हैं, जल नहीं पीते।

नवीन यज्ञोपवीत

  १* नवीन यज्ञोपवीत धारण करने के लिए स्नान करके आसन पर बैठ जाएँ फिर आचमन कर के, नौ तन्तुओं में क्रमशः   ॐकार, अग्नि, सर्प, सोम, पितर, प्रजापति, वायु, यम  और  विश्वदेव  की तथा तीन ग्रन्थियों में क्रमशः  ब्रह्मा, विष्णु  और  रुद्र  की भावना करके विनियोग मंत्र पढ़े – ॐ यज्ञोपवीतमिति परमेष्ठी ऋषिः, त्रिष्टुप् छन्दः, लिङ्गोक्ता देवता, श्रोतस्मार्त कर्मानुष्ठानाधिकारसिद्धये यज्ञोपवीतपरिधाने विनियोगः। यज्ञोपवीत धारण का मंत्र – ॐ यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत् सहजं पुरस्तात्। आयुष्यमग्र्यं प्रतिमुञ्च शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः॥ ॐ  यज्ञोपवीतमसि यज्ञस्य त्वा यज्ञोपवीतेनोपनह्यामि। इस मंत्र को पढ़कर एक जोड़ा यज्ञोपवीत पहन ले। फिर कम-से-कम बीस बार गायत्री-मंत्र का जप करे। इसके बाद पुराने जनेऊ को ऊतार कर  “ समुद्रं गच्छ स्वाहा ”  या ( एतावद्दिनपर्यन्तं ब्रह्म त्वं धारितं मया। जीर्णत्वात् त्वत्वपरित्यागो गच्छ सूत्र यथासुखम् ॥ ) – बोल कर जलाशय में फेंक दे। *२*

संध्योपासन

  संध्योपासन द्विजमात्रके लिये बहुत ही आवश्यक कर्म है । इसके बिना पूजा आदि कार्य करनेकी योग्यता नही आती । अतः द्विजमात्रके लिये संध्या करना आवश्यक है । स्नानके बाद दो वस्त्र धारणकर पूर्व, ईशानकोण या उत्तरकि ओर मुँह कर आसनपर बैठ जाय । आसनकी ग्रन्थि उत्तर-दक्षिणकी ओर हो । तुलसी, रुद्राक्ष आदिकि माला धारण कर ले । दोनों अनामिकाओंमे पवित्री धारण कर ले । गायत्री मन्त्र पढ़्कर शिखा बाँधे तथा तिलक लगा ले और आचमन करे - आचमन - 'ॐ केशवाय नमः, ॐ नारायणाय नमः, ॐ माधवाय नमः'  -  इन तीन मन्त्रोंसे तीन बार आचमन करके  'ॐ ह्रषीकेशाय नमः'  इस मन्त्रको बोलकर हाथ धो ले । पहले विनियोग पढ़ ले, तब मार्जन करे (जल छिड़के) । मार्जन-विनियोग- मन्त्र -   'ॐ अपवित्रः पवित्रो वेत्यस्य वामदेव ऋषिः, विष्णुर्देवता, गायत्रीछन्दः ह्रदि पवित्रकरणे विनियोगः । इस प्रकार विनियोग पढ़कर जल छोड़े तथा निम्नलिखित मन्त्रसे मार्जन करे (शरीर एवं सामग्रीपर जल छिड़के) ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा । यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः ॥ तदनन्तर आगे लिखा विनियोग पढ़े- ' ॐ पृथ्वीति मन्त्रस्...