आचमन

 आचमन के समय हाथ धुटनो के भीतर हों। ब्राह्मण इतना जल पीये कि हृदय तक पहुँच सके, क्षत्रिय इतना जल पीये कि कण्ठ तक पहुँच सके और वैश्य इतना जल पीये कि तालु तक पहुँच सके। आचमन का जल पीते समय ओठ बहुत न खोले। अंगुलियाँ आपस में सटी हुई हों। जल मणिबंध की ओर से पीये। आचमन सदैव बैठ कर ही करना चाहिए, इसलिए द्वार पर आचमन में केवल कान स्पर्श करते हैं, जल नहीं पीते।

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