संध्योपासन
संध्योपासन द्विजमात्रके लिये बहुत ही आवश्यक कर्म है । इसके बिना पूजा आदि कार्य करनेकी योग्यता नही आती । अतः द्विजमात्रके लिये संध्या करना आवश्यक है ।
स्नानके बाद दो वस्त्र धारणकर पूर्व, ईशानकोण या उत्तरकि ओर मुँह कर आसनपर बैठ जाय । आसनकी ग्रन्थि उत्तर-दक्षिणकी ओर हो । तुलसी, रुद्राक्ष आदिकि माला धारण कर ले । दोनों अनामिकाओंमे पवित्री धारण कर ले । गायत्री मन्त्र पढ़्कर शिखा बाँधे तथा तिलक लगा ले और आचमन करे -
आचमन - 'ॐ केशवाय नमः, ॐ नारायणाय नमः, ॐ माधवाय नमः' -
इन तीन मन्त्रोंसे तीन बार आचमन करके 'ॐ ह्रषीकेशाय नमः' इस मन्त्रको बोलकर हाथ धो ले ।
पहले विनियोग पढ़ ले, तब मार्जन करे (जल छिड़के) ।
मार्जन-विनियोग- मन्त्र - 'ॐ अपवित्रः पवित्रो वेत्यस्य वामदेव ऋषिः, विष्णुर्देवता, गायत्रीछन्दः ह्रदि पवित्रकरणे विनियोगः ।
इस प्रकार विनियोग पढ़कर जल छोड़े तथा निम्नलिखित मन्त्रसे मार्जन करे (शरीर एवं सामग्रीपर जल छिड़के)
ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा ।
यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः ॥
तदनन्तर आगे लिखा विनियोग पढ़े-
'ॐ पृथ्वीति मन्त्रस्य मेरुपृष्ठ ऋषिः, सुतल छन्दः, कूर्मो देवता आसनपवित्रकरणे विनियोगः ।'
फिर नीचे लिखा मन्त्र पढ़कर आसनपर जल छिड़के-
ॐ पृथ्वि ! त्वया धृता लोका देवि । त्वं विष्णुना धृता ।
त्वं च धार मां देवि ! पवित्रं कुरु चासनम् ॥
अब ॐ के साथ गायत्री मंत्र या इस –
चिद्’रूपिणि महामाये! दिव्यतेजःसमन्विते।
तिष्ठ देवि! शिखामध्ये तेजोवृद्धिं कुरुष्व मे॥
मंत्र से शिखा बाँध ले, यदि शिखा पहले से बँधी हो तो उसका स्पर्श कर ले। ईशान दिशा की ओर मुख करके आचमन करे।
संध्याका संकल्प - इसके बाद हाथमें कुश और जल लेकर संध्याका संकल्प पढ़कर जल गिरा दे -
'ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः अद्य.....उपात्तदुरितक्षयपूर्वकश्रीपरमेश्वरप्रीत्यर्थं संध्योपासनं करिष्ये ।
आचमन - इसके लिये निम्नलिखित विनियोग पढ़े-
ॐ ऋतं चेति माधुच्छन्दसोऽघमर्षण ऋषुरनुष्टुप् छन्दो भाववृत्तं दैवतमपामुपस्पर्शने विनियोगः । फिर नीचे लिखा मन्त्र पढ़कर आचमन करे -
ॐ ऋतं च सत्यं चाभीद्धात्तपसोऽध्यजायत । ततो रात्र्यजायत । ततः समुद्रो अर्णवः । समुद्रादर्णवादधि संवत्सरो अजायत । अहोरात्राणि विदधद्विश्वस्य मिषतो वशी । सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत् । दिवं च पृथिवी चान्तरिक्षमथो स्वः । (ऋग्वेद १०।१९०।१)
तदनन्तर दाये हाथमे जल लेकर बाये हाथसे ढककर 'ॐ' के साथ तीन बार गायत्रीमन्त्र पढ़कर अपनी रक्षाके लिये अपने चारों ओर जलकी धारा दे । फिर प्राणायाम करे ।
प्राणायामका विनियोग - प्राणायाम करनेके पूर्व उसका विनियोग इस प्रकार पढ़े-
'ॐकारस्य ब्रह्मा ऋषिर्दैवी गायत्री छन्दः अग्निः परमात्मा देवता शुक्लो वर्णः सर्वकर्मारम्भे विनियोगः ।'
ॐ सप्तव्याह्रतीनां विश्वामित्रजमदग्निभरद्वाजगौतमात्रिवसिष्ठ-कश्यपा ऋषयो गायत्र्युष्णिगनुष्टुब्बृहतीपङिक्तत्रिष्टुब्जगत्यश्छ्न्दांस्य-ग्निवाय्वादित्यबृहस्पतिवरुणेन्द्रविष्णवो देवता अनादिश्टप्रायश्चित्ते प्राणायामे विनियोगः ।
ॐ तत्सवितुरिति विश्वामित्रऋषिर्गायत्री छन्दः सविता देवता प्राणायामे विनियोगः ।
ॐ आपो ज्योतिरिति शिरसः प्रजापतिऋषिर्यजुश्छन्दो ब्रह्माग्निवायुसूर्या देवताः प्राणायामे विनियोगः ।
(क) प्राणायामके मन्त्र - फिर आँखे बंद कर नीचे लिए मन्त्रोंका प्रत्येक प्राणायाममे तीन-तीन बार (अथवा पहले एक बारसे ही प्रारम्भ करे, धीरे-धीरे तीन-तीन बारका अभ्यास बढ़ावे) पाठ करे ।
ॐ भूः ॐ भुवः ॐ स्वः ॐ महः ॐ जनः ॐ तपः ॐ सत्यम् । ॐ तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि ।धियो यो नः प्रचोदयात् । ॐ आपो ज्योती रसोऽमृतं ब्रह्म भुर्भुवः स्वः स्वरोम् । (तै० आ० प्र० १० अ० २७)
(ख) प्राणायामकी विधि - प्राणायामके तीन भेद होते है - १. पूरक, २.कुम्भक और ३. रेचक ।
१. - अँगूठेसे नाकके दाहिने छिद्रको दबाकर बायें छिद्रसे श्वासको धीरे-धीरे खींचनेको 'पूरक प्राणायाम' कहते है । पूरक प्राणायाम करते समय उपर्युक्त मन्त्रोंका मनसे उच्चारण करते हुए नाभिदेशमें नीलकमलके दलके समान नीलवर्ण चतुर्भुज भगवान विष्णुका ध्यान करे ।
२- जब साँस खींचना रुक जाय, तब अनामिका और कनिष्ठिका अँगुलीसे नाकके बाये छिद्रको भी दबा दे । मन्त्र जपता रहे । यह 'कुम्भक प्राणायाम' हुआ । इस अवसरपर ह्रदयमें कमलपर विराजमान लाल वर्णवाले चतुर्मुख ब्रह्माका ध्यान करे ।
३- अँगूठेको हटाकर दाहिने छिद्रसे श्वासको धीरे-धीरे छोड़नेको 'रेचक प्राणायाम' कहते है । इस समय ललाटमे श्वेतवर्ण शंकरका ध्यान करना चाहिये । मनसे मन्त्र जपता रहे । (दे० भा० ११।१६।२८-३६) ।
(ग) प्राणायामके बाद आचमन - (प्रातःकालका विनियोग और मन्त्र) प्रातःकाल नीचे लिखा विनियोग पढ़कर पृथ्वीपर जल छोड़ दे -
सूर्यश्च नेति नारायण ऋषिः अनुष्टुपछन्दः सूर्यो देवता अपामुपस्पर्शेन विनियोगः ।
पश्चात नीचे लिखे मन्त्रको पढ़कर आचमन करे -
ॐ सूर्य्श्च मा मन्युश्च मन्युपतयश्च मन्युकृतेभ्यः पापेभ्यो रक्षन्ताम् । यद्रात्र्या पापमकार्षं मनसा वाचा हस्ताभ्यां पद्भ्यामुदरेण शिश्न अरात्रिस्तदवलुम्पतु । यत्किञ्च दुरितं मयि इदमहपापोऽमृतयोनौ सूर्ये ज्योतिषि जुहोमि स्वाहा ॥ (तै० आ० प्र० १०, अ० २५)
मार्जन - इसके बाद मार्जनका निम्नलिखित विनियोग पढ़कर बाये हाथमे जल लेकर कुशोंसे या दाहिने हाथकी तीन अँगुलियोंसे १ से ७ तक मन्त्रोंको बोलकर सिरपर जल छिड़के । ८वे मन्त्रसे पृथ्वीपर तथा ९ वेसे फिर सिरपर जल छिड़के ।
ॐ आपो हि ष्ठेत्यादित्र्यृचस्य सिन्धुद्वीप ऋषिर्गायत्री छन्दः आपो देवता मार्जने विनियोगः ।
१. ॐ आपो हि ष्ठा मयोभुवः ।
२. ॐ ता न ऊर्जे दधातन ।
३. ॐ महे रणाय चक्षसे ।
४. ॐ यो वः शिवतमो रसः ।
५. ॐ तस्य भाजयतेह नः ।
६. ॐ उशतीरिव मातरः ।
७. ॐ तस्मा अरं गमम वः ।
८. ॐ यस्य क्षयाय जिन्वथ ।
९. ॐ आपो जनयथा च नः । (यजु० ११।५० - ५२)
मस्तकपर जल छिड़कनेके विनियोग और मन्त्र -
निम्नलिखित विनियोग पढ़कर बाये हाथमे जल लेकर दाहिने हाथसे ढक ले और निम्नलिखित मन्त्र पढ़कर सिरपर छिड़के ।
विनियोग - द्रुपदादिवेत्यस्य कोकिलो राजपुत्र ऋषिरनुष्टुप छन्दः आपो देवताः शिरस्सेके विनियोगः ।
मन्त्र - ॐ द्रुपदादिव मुमुचानः स्विन्नः स्नातो मलादिव ।
पूतं पवित्रेणेवाज्यमापः शुन्धन्तु मैनश ॥
(यजु० २०।२०)
अघमर्षण और आचमनके विनियोग और मन्त्र - नीचे लिखा विनियोग पढ़कर दाहिने हाथमे जल लेकर उसे नाकसे लगाकर मन्त्र पढ़े और ध्यान करे कि 'समस्त पाप दाहिने नाकसे निकलकर हाथके जलमें आ गये है । फिर उस जलको बिना देखे बायी ओर फेंक दे ।
अघमर्षणसूक्तस्याघमर्षण ऋषिरनुष्टप् छन्दो भाववृत्तो देवता अघमर्षणे विनियोगः ।
मन्त्र - ॐ ऋतञ्च सत्यं चाभीद्धात्तपसोऽध्यजायत । ततो रात्र्यजायत । ततः समुद्रो अर्णवः । समुद्रादर्णवादधि संवत्सरो अजायत । अहोरात्राणि विदधद्विश्वस्य मिषतो वशी । सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापुर्वमकल्पयत् । दिवं च पृथिवीं चान्तरिक्षमथो स्वः ॥
(ऋ० अ० ८ अ० ८ व० ४८)
पुनः निम्नलिखित विनियोग करे -
अन्तश्चरसीति तिरश्चीन ऋषिरनुष्टुप् छन्दः आपो देवता अपामुपस्पर्शने विनियोगः ।
फिर इस मन्त्रसे आचमन करे -
ॐ अन्तश्चरसि भूतेषु गुहायां विश्वतोमुखः ।
त्वं यज्ञस्त्वं वषट्कार आपो ज्योती रसोऽमृतम् ॥
(कात्यायन, परिशिष्ट सूत्र)
नीचे लिखा विनियोग केवल पढ़े जल न छोड़े –
ॐकारस्य ब्रह्म ऋषिः देवी गायत्री छन्दः परमात्मा देवता, तिसृणां महाव्याहृतीनां प्रजापतिर्ऋषिः गायत्र्युष्णिगनुष्टुभश्छन्दांस्यग्निवायुसूर्या देवताः, तत्सवितुरिति विश्वामित्र ऋषिर्गायत्री छन्दः सविता देवता सूर्यार्घ्यदाने विनियोगः॥
अब प्रातःकाल की संध्या में सूर्य के सामने खड़ा हो जाए। एक पैर की एड़ी उठाकर तीन बार गायत्री मंत्र का जप करके पुष्प मिले हुए जल से सूर्य को तीन अंजलि जल दे। प्रातःकाल का अर्घ्य जल में देना चाहिए यदि जल न हो तो स्थल को अच्छी तरह जल से धो कर उस पर अर्घ्य का जल गिराए।
गायत्री मन्त्र –
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो नः प्रचोदयात्।
इस मंत्र को पढ़कर ब्रह्मस्वरूपिणे सूर्यनारायणाय इदमर्घ्यं दत्तं न मम कह कर प्रातःकाल अर्घ्य समर्पण करे।
अब नीचे लिखा विनियोग पढ़कर पृथ्वी पर जल छोड़े –
उद्वयमित्यस्य प्रस्कण्व ऋषिः अनुष्टुप् छन्दः सूर्यो देवता सूर्योपस्थाने विनियोगः॥
नीचे लिखा विनियोग पढ़कर पृथ्वी पर जल छोड़े –
उदुत्यमिति प्रस्कण्व ऋषिर्निचृद्गायत्री छन्दः सूर्यो देवता सूर्योपस्थाने विनियोगः॥
नीचे लिखा विनियोग पढ़कर पृथ्वी पर जल छोड़े –
चित्रमिति कुत्साङ्गिरस ऋषिस्त्रिष्टुप् छन्दः सूर्यो देवता सूर्योपस्थाने विनियोगः॥
नीचे लिखा विनियोग पढ़कर पृथ्वी पर जल छोड़े।
तच्चक्षुरिति दध्यङ्ङाथर्वण ऋषिरेकाधिका ब्राह्मी त्रिष्टुप् छन्दः सूर्यो देवता सूर्योपस्थाने विनियोगः॥
प्रातःकाल की संध्या में अंजलि बाँधकर यदि संभव हो तो सूर्य को खड़े होकर देखते हुए प्रणाम करे –
ॐ उद्वयं तमसस्परि स्वः पश्यन्त उत्तरम्। देवं देवत्रा सूर्यमगन्म ज्योतिरुत्तमम्॥
ॐ उदुत्यं जातवेदसं देवं वहन्ति केतवः। दृशे विश्वाय सूर्यम्॥
ॐ चित्रं देवानामुदगादनीकं चक्षुर्मित्रस्य वरुणस्याग्नेः। आप्रा द्यावापृथिवी अन्तरिक्ष ग्वँग् सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च॥
ॐ तच्चक्षुर्देवहितं पुरस्ताच्छुक्रमुच्चरत्। पश्येम शरदः शतं जीवेम शरदः शतं ग्वँग् शृणुयाम शरदः शतं प्रब्रवाम शरदः शतमदीनाः स्याम शरदः शतं भूयश्च शरदः शतात्॥
अब बैठ कर अंगन्यास करे, दाहिने हाथ की पाँचों अंगुलियों से “हृदय” आदि का स्पर्श करे –
ॐ हृदयाय नमः। (हृदय का स्पर्श)
ॐ भूः शिरसे स्वाहा। (मस्तक का स्पर्श)
ॐ भुवः शिखायै वषट्। (शिखा का स्पर्श)
ॐ स्वः कवचाय हुम्। (दाहिने हाथ की उँगलियों से बायें कंधे का और बायें हाथ की उँगलियों से दायें कंधे एक साथ स्पर्श करे)
ॐ भूर्भुवः नेत्राभ्यां वौषट्। (दोनों नेत्रों और ललाट के मध्य भाग का स्पर्श)
ॐ भूर्भुवः स्वः अस्त्राय फट्। (यह मंत्र पढ़कर दाहिने हाथ को सिर के ऊपर से बायीं ओर से पीछे की ओर ले जाकर दाहिनी ओर से आगे की ओर ले आये और तर्जनी तथा मध्यमा उँगलियों से बायें हाथ की हथेली पर ताली बजाये।)
नीचे लिखा विनियोग पढ़कर पृथ्वी पर जल छोड़े –
ॐकारस्य ब्रह्मा ऋषिः गायत्री छन्दो अग्निर्देवता शुक्लो वर्णो जपे विनियोगः॥
नीचे लिखा विनियोग पढ़कर पृथ्वी पर जल छोड़े –
त्रिव्याहृतीनां प्रजापति ऋषिः गायत्र्युष्णिगनुष्टुभश्छन्दांस्यग्निवाय्वादित्या देवता जपे विनियोगः॥
नीचे लिखा विनियोग पढ़कर पृथ्वी पर जल छोड़े –
गायत्र्या विश्वामित्र ऋषिः गायत्री छन्दः सविता देवता जपे विनियोगः॥
नीचे लिखे मंत्र को पढ़कर इसके अनुसार गायत्री देवी का ध्यान करे –
ॐ श्वेतवर्णा समुद्दिष्टा कौशेयवसना तथा।
श्वेतैर्तिलेपनैः पुष्पैरलंकारैश्च भूषिता॥
आदित्यमण्डलस्था च ब्रह्मलोकगताथवा।
अक्षसूत्रधरा देवी पद्मासनगता शुभा॥
नीचे लिखा विनियोग पढ़कर पृथ्वी पर जल छोड़े –
ॐ तेजोऽसीति धामनामासीत्यस्य च परमेष्ठी प्रजापतिर्ऋषिर्यजुस्त्रिष्टुबृगुष्णिहौ छन्दसी सविता देवता गायत्र्यावाहने विनियोगः॥
नीचे लिखे मंत्र से विनयपूर्वक गायत्री देवी का आवाहन करे –
ॐ तेजोऽसि शुक्रमस्यमृतमसि। धामनामासि प्रियं देवानामनाधृष्टं देवयजनमसि॥
नीचे लिखा विनियोग पढ़कर पृथ्वी पर जल छोड़े –
ॐ गायत्र्यसीति विवस्वान् ऋषिः स्वराण्महापङ्क्तिश्छन्दः परमात्मा देवता गायत्र्युपस्थाने विनियोगः॥
अब नीचे लिखे मंत्र से गायत्री देवी को प्रणाम करे –
ॐ गायत्र्यस्येकपदी द्विपदी त्रिपदी चतुष्पद्यपदसि। न हि पद्यसे नमस्ते तुरीयाय दर्शताय पदाय परोरजसेऽसावदो मा प्रापत्॥
नीचे लिखा विनियोग पढ़कर पृथ्वी पर जल छोड़े –
ॐकारस्य ब्रह्म ऋषिः देवी गायत्री छन्दः परमात्मा देवता, तिसृणां महाव्याहृतीनां प्रजापतिर्ऋषिः गायत्र्युष्णिगनुष्टुभश्छन्दांस्यग्निवायुसूर्या देवताः, तत्सवितुरिति विश्वामित्र ऋषिर्गायत्री छन्दः सविता देवता जपे विनियोगः॥
फिर सूर्य की ओर मुख करके, कम-से-कम १०८ बार गायत्री-मंत्र का जप करे –
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो नः प्रचोदयात् ॐ।
नीचे लिखा विनियोग पढ़कर पृथ्वी पर जल छोड़े –
विश्वतश्चक्षुरिति भौवन ऋषिस्त्रिष्टुप् छन्दो विश्वकर्मा देवता सूर्यप्रदक्षिणायां विनियागः।
अब नीचे लिखे मन्त्र से अपने स्थान पर खड़े होकर सूर्य देव की एक प्रदक्षिणा करे –
ॐ विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतोमुखो विश्वतोबाहुरुत विश्वतस्पात्।
सम्बाहुभ्यां धमति सम्पतत्रैर्द्यावाभूसी जनयन् देव एकः॥
नीचे लिखा विनियोग पढ़कर पृथ्वी पर जल छोड़े –
ॐ देवा गातुविद इति मनसस्पतिर्ऋषिर्विराडनुष्टुप् छन्दो वातो देवता जपनिवेदन विनियोगः।
अब नमस्कार करे –
ॐ देवा गातुविदो गातुं वित्त्वा गातुमित मनसस्पत इमं देव यज्ञ ग्वँग् स्वाहा व्वाते धाः।
अब नीचे लिखा मंत्र पढ़े –
अनेन यथाशक्तिकृतेन गायत्रीजपाख्येन कर्मणा भगवान् सूर्यनारायणः प्रीयतां न मम।
अब विसर्जन के विनियोग का मंत्र पढ़े –
उत्तमे शिखरे इति वामदेव ऋषिः अनुष्टुप् छन्दः गायत्री देवता गायत्रीविसर्जने विनियोगः।
विसर्जन मंत्र –
ॐ उत्तमे शिखरे देवी भूम्यां पर्वतमूर्धनि।
ब्रह्मणेभ्योऽभ्यनुज्ञाता गच्छ देवि यथासुखम॥
अब नीचे लिखा वाक्य पढ़कर संध्योपासन कर्म परमेश्वर को समर्पित करे।
अनेन संध्योपासनाख्येन कर्मणा श्रीपरमेश्वरः प्रीयतां न मम। ॐ तत्सत् श्रीब्रह्मार्पणमस्तु।
अब भगवान् का स्मरण करे।
यस्य स्मृत्या च नामोक्त्या तपोयज्ञक्रियादिषु।
न्यूनं सम्पूर्णतां याति सद्यो वन्दे तमच्युतम्॥
ॐ श्रीविष्णवे नमः॥ ॐ श्रीविष्णवे नमः॥ ॐ श्रीविष्णवे नमः॥
॥ श्रीविष्णुस्मरणात् परिपूर्णतास्तु॥
॥इति॥
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