जन्मदिन/जन्म दिन मनाने की भारतीय विधि

 वर्तमान युग में अधिकतर लोग पाश्चात्य सभ्यता से प्रभावित होकर अपना जन्म दिन रात में धूम धड़ाका करके मानते है । लोग रात्रि में पहले केक पर मोमबत्ती जलाकर उसे फूंक मार कर बुझा देते है, फिर उस केक को जिस पर उनका नाम लिखा होता है उसे काटकर सब लोगो को खिलाते है , उस रात्रि में लोग मौज-मस्ती करके माँस मदिरा का सेवन करते है जो कि सर्वथा गलत है । 


इस संसार में प्रत्येक जातक का जन्म किसी ना किसी उद्देश्य से ही हुआ है , ईश्वर ने हम सभी पर बहुत बड़ी कृपा की है कि हमें 84 लाख योनियों में मनुष्य योनि में जन्म दिया है। 
हमें इस बात का अवश्य ही ध्यान देना चाहिए की ईश्वर ने हमें जितनी आयु दे रखी है , उसकी अवधि शने: शने: समाप्त हो रही है, इसलिए इस दिन हम ईश्वर से अपनी सभी पिछली जाने अनजाने में की गयी गलतियों के लिए क्षमा माँगते हुए उन्हें अब तक के जीवन के लिए धन्यवाद दें । उनसे प्रार्थना करें कि हमारा आने वाला जीवन और भी अधिक सार्थक और उद्देश्य पूर्ण साबित हो । 

 हम जन्मदिन दिनांक के आधार पर मानते है लेकिन हमें अपना जन्मदिन तिथि के अनुसार मनाना चाहिए । तिथि नुसार जन्मदिन मनाने से हमें देवताओं का आशीर्वाद मिलता है । हम जिस दिन पैदा हुए थे उस दिन की तिथि, वार, नक्षत्र का स्मरण करते हुए वर्तमान तिथि , वार, नक्षत्र से अपने सफल जीवन के लिए प्रार्थना करें। इससे हमें परम पिता परमेश्वर का आशीर्वाद प्राप्त होता है । इसलिए हमें जन्म दिन तिथि के अनुसार ही मनाना चाहिए । 

हमें यदि अपना जन्म दिन याद है तो किसी भी पंडित से मिलकर पंचाग के माध्यम से बहुत आसानी से हम अपनी जन्मतिथि और माह को ज्ञात कर सकते है । 

लोग जन्मदिवस कहते है और इसे रात्रि में मनाते है ऐसा क्यों ? हमें जन्म दिवस मनाना है या जन्म रात्रि ?जन्मदिन को देर रात्रि में नहीं मनाना चाहिए यह जातक के लिए शुभ नहीं होता है। रात्रि का सम्बन्ध अंधेरे से है और दिन का रोशनी से तो आखिर क्यों हम अपना जन्म दिन को रात्रि में मनाकर अपने जीवन में खुद ही अंधेरा करते है, इसलिए जन्मदिन दिन के समय में ही मनाना उचित है । 

जन्मदिवस पर बच्चे बडे-बुजुर्गों को प्रणाम करें, उनका आशीर्वाद पायें । बच्चे संकल्प करें कि आनेवाले वर्षों में पढाई, साधना, सत्कर्म आदि में सच्चाई और ईमानदारी से आगे बढकर अपने माता-पिता व देश का गौरव बढायेंगे ।


जन्म दिन मनाने की भारतीय विधि


अपना जन्म दिन दिनांक के आधार पर न मनाकर भारतीय वैदिक तिथि के अनुसार मनाना श्रेष्ठ माना गया है
यदि हम भगवान् का जन्मदिन जैसे – रामनवमी, जन्माष्टमी आदि तिथि के अनुसार मना सकते है तो अपना जन्मदिन तिथि के अनुसार क्यों नहीं ?

हमारे सब संस्कार, उत्सव, शुभ कार्य दीप प्रज्ज्वलित कर आरंभ होते हैं। जलते दीप को बुझाना तो अति अशुभ कार्य हैं। बच्चे हमारे कुलदीप हैं, उनके यशकीर्ति तथा उज्ज्वल भविष्य की कामना दीपक जला कर करनी चाहिए, मोमबत्तियाँ  बुझाकर तो कभी नहीं। आयु और श्री वृद्घि के लिए प्रति वर्ष जन्म दिन (वर्धापन) मनाने की विधि शास्त्रों में बताई गई है। इस तरह के संस्कारों की जानकारी के अभाव में युवा पीढ़ी पश्चिमी अधकचरे आचरण अपनाए तो दोष किसका?

जन्मदिन के दिन सुबह जल्दी जागना चाहिए। सुबह 4 से 6 के बीच ब्रह्म मुहूर्त होता है। इस समय में जागने से आयु में वृद्धि होती है। मन में गणेश जी का ध्यान करें व आंखे खोलें। सबसे पहले अपनी दोनो हथेलियों का दर्शन करें। मन ही मन अपने इष्टदेव तथा गुरु को प्रणाम करे पुनः माता-पिता ( मातृदेवो भव। पितृदेवो भव ) का चरण स्पर्श कर उनसे आशीर्वाद लेना चाहिए। नए दिन अच्छे से गुजरे। ये प्रार्थना अपने ईष्ट से करें। धरती माता को प्रणाम करें। तिल के उबटन से नहाएं। नहाकर के साफ व स्वच्छ वस्त्र पहनें।

अपने जन्मदिन के शुभावसर पर भगवान के चरणों में दीपक अवश्य जलाना चाहिएं तथा ईश्वर की आराधन पूजा और उनके चरणों में फल फूल, मिठाई, वस्त्र, दक्षिणा अर्पण कर सुख शांति और कष्टों से मुक्ति के लिए आशीर्वाद लेना चाहिए।
जन्मदिन के दिन तिल के तेल का मालिश करके जल में तिल एवं गंगाजल डालकर  — ॐ गंगे च यमुने सरस्वती नर्मदे सिंधु कावेरी अस्मिन् जले सन्निधिं कुरु।  इस मन्त्र को बोलकर स्नान करना चाहिए। स्नान केवल ठन्डे पानी से करना चाहिए।
जातक के जितने वर्ष पूर्ण हुए हैं उतने दीप रात्रि में जलाकर घर में सब जगह रखनी चाहिए इससे जातक में बल बुद्धि तथा तेज तत्त्व की वृद्धि होती है।

ईश्वर की पूजन करें। प्रथम पूजनीय देवता भगवान गणेश का गंध,पुष्प,अक्षत, धूप, दीप से पूजन करें।  लड्डु और दूर्वा समर्पित करें।

पूर्णिमा को चंद्रमा २७ नक्षत्रों में से जिस नक्षत्र के आसपास आता है उस नक्षत्र के नाम से उस महीने को संबोधित किया जाता है - पहला चित्रा से चैत्र, फिर विशाखा, ज्येष्ठा, पूर्वाषाढ़ा,श्रवण, पूर्वाभाद्रपदा, अश्विनी, कृत्तिका, मृर्गशिरा, पुष्य, मघा और अंत में उत्तरा फाल्गुनी से फागुन। सूर्य से प्रकाशित होने के कारण और प्रतिदिन पृथ्वी से दूरी घटनेबढ़ने के कारण चंद्रमा पृथ्वी के हर प्राणी को, जिनमें मनुष्य प्रमुख है, प्रभावित करता है। चंद्रमा मन का द्योतक है। साथ ही, चंद्र नक्षत्रों का भी मनुष्य जीवन पर बहुत प्रभाव पड़ता है। इसलिए सही चंद्र कला और चंद्र नक्षत्र के समय उदयतिथि के हिसाब से जन्मदिन मनाना ही शुभ तथा कल्याणकारी हो सकता है, जिसकी शास्त्रोक्त विधि ‘वर्धापन’ कहलाती है।

वर्धापन (संक्षिप्त) विधिः उस दिन, प्रथम उबटन आदि से जातक को स्नान कराएँ। इस अवसर पर नए वस्त्र धारण करें तो पुराने वस्त्र किसी जरूरतमंद को दे देने चाहिए। पूर्व दिशा की  ओर मुँह करके जातक आसन पर या अपने मातापिता के साथ (या एक की गोद) में बैठ कर, जल से भरे एक कलश को चंदन-रोली से स्वस्तिक अंकित कर रंगोली से चित्रित जगह पर स्थापित करें। इस पर एक कटोरी (शिकोरे) में गेहूँ या चावल रखकर उस पर शुद्घ गोघृत का दीपक जलाएँ। उपस्थित लोगों के मस्तक पर कुंकुम से तिलक लगाएँ। पंडित न हो तो परिवार का एक सदस्य ही निम्नानुसार इस कलश का पूजन करा सकता है।

हाथ में जल, चावल, पुष्प, चंदन, द्रव्य (सिक्का) लेकर संकल्प करें। स्थान, तिथि, गोत्र, नाम (जातक का नाम) का उल्लेख कर के कहें –

‘अस्य जातकस्य आयुरारोग्याभिवृद्घेये विष्णु प्रीतये वर्धापन कर्म करिष्ये, तदंगत्वेन च गणेशादि पूजनमहं करिष्ये’।

 कलश पर गणेश, गौरी और अन्य देवों का निम्न मंत्रों से पूजन करें। पूजन में चंदन, अक्षत, पुष्पमाला, धूपदीप, नैवेद्य, दक्षिणा चढ़ावे।

श्री गणेशाय नमः, श्री गणेश पूज्यामि। श्री गौर्य नमः, श्री गौरी पूज्यामि। ... इसी प्रकार वरूणायवरूणं, जन्म नक्षत्राधिपायजन्म नक्षत्राधिपं, पित्रेपितरं, प्रजापत्यैप्रजापति,भानवेभानु, ... श्री मार्कण्डेयाय नमः, मार्कण्डेयाय पूज्यामि।

विद्वान पंडित के परामर्श से इस विधि में सामर्थ्य अनुसार विस्तार या परिवर्तन किया जा सकता है।

इस दिन जन्मनक्षत्र का पूजन किया जाता है। जन्मदिन पर अष्टचिरंजीवी का पूजन व स्मरण करना चाहिए। यह पूजन आयु में वृद्धि करता है।

अष्टचिरंजीवी
अश्वथामा, दैत्यराज बलि, वेद व्यास, हनुमान, विभीषण, कृपाचार्य, परशुराम और मार्कण्डेय ऋषि ये आठ चिरंजीवी हैं जिन्हें अमरत्व प्राप्त है। अष्टचिरंजीवी को प्रणाम करें। इनके लिए तिल से होम करें। कहा जाता है कि इनके नित्य स्मरण मात्र से व्यक्ति निरोगी तथा दीर्घजीवी हो जाता है।

अष्टचिरंजीवी मंत्र
ॐ मार्कण्डेय महाभाग सप्तकरूपान्तजीवन।
चिरंजीवी यथा त्वं भो भविष्यामि तथा मुने।।
अश्वत्थामा बलिव्र्यासो हनूमांश्च विभीषणः।
कृपः परशुरामश्च सप्तएतै चिरजीविनः।।
सप्तैतान् संस्मरेन्नित्यं मार्कण्डेयमथाष्टमम्।
जीवेद्वर्षशतं सोपि सर्वव्याधिविवर्जित।।

अर्थात् अश्वथामा, दैत्यराज बलि, वेद व्यास, हनुमान, विभीषण, कृपाचार्य, परशुराम और मार्कण्डेय ऋषि को प्रणाम है। इन नामों के स्मरण रोज सुबह करने से सारी बीमारियां समाप्त दूर  होती हैं और मनुष्य 100 वर्ष की आयु को प्राप्त करता है।

ऊँ कुलदेवताभ्यौ नमः मंत्र से कुलदेवता का पूजन करें। अब जन्म नक्षत्र, भगवान गणेश, सूर्यदेव, अष्टचिरंजीवी, षष्ठी देवी की स्थापना चावल की ढेरियों पर करें। नाम मंत्र से पूजन करें। भगवान मार्कण्डेय से दीर्घायु की प्रार्थना करें। तिल और गुड़ के लड्डु तथा दूध अर्पित करें। षष्ठी देवी को दही भात का नैवेद्य अर्पित करें।

 ॥ मार्कण्डेयस्तुति।।
 मार्कण्डेयजीको श्वेत तिल मिश्रित गुड़ दूध अर्पित करें तथा निम्न स्तुति करें 
द्विभुजं जटिलं सौम्यं सुवृद्धं चिरजीविनम् । 
मार्कण्डेयं नरो भक्त्या पूजयेत् प्रयतः सदा ॥ 
आयुष्प्रद    महाभाग    सोमवंशसमुद्भव ।
महातपो मुनिश्रेष्ठ मार्कण्डेय नमोऽस्तु ते ॥
मार्कण्डेय महाभाग सप्तकल्पान्तजीवन ।
आयुरा रोग्य सिध्यर्थ मस्माकं वरदो भव।।
चिरजीवी यथा त्वं भो भविष्यामि तथा मुने ।
रूपवान् वित्तवांश्चैव श्रिया युक्तश्च सर्वदा ॥
मार्कण्डेय नमस्तेऽस्तु सप्तकल्पान्तजीवन ।
आयुरारोग्यसिद्ध्यर्थं प्रसीद भगवन्मुने ।।
चिरजीवी यथा त्वं तु मुनीनां प्रवरद्विज ।
कुरुष्व मुनिशार्दूल तथा मां चिरजीविनम् ॥
।।षष्ठीदेवी पूजनमन्त्र ।।
षष्ठीदेवीको दही भात अर्पित करें तथा निम्न प्रार्थना करें।
जय देवि जगन्मातर्जगदानन्दकारिणि । 
प्रसीद मम कल्याणि महाषष्ठि नमोऽस्तु ते ॥
रूपं देहि यशो देहि भगं भगवति देहि मे । 
पुत्रान् देहि धनं देहि सर्वान्कामांश्च देहि मे ॥
।।रक्षामन्त्र ।।
त्रैलोक्ये यानि भूतानि स्थावराणि चराणि च । 
ब्रह्म विष्णु शिवैः सार्धं रक्षां  कुर्वन्तु तानि मे ॥
भूलकर भी दीपक या मोमबत्ती न बुझायें । जन्मदिवस के समय बालक , युवक या प्रौढ व्यक्ति रुग्ण हो तो अपमृत्युनाशहेतु मृत्युंजयमन्त्र जप करे हवन में विशेष आहुति देनी चाहिये ।


जन्मदिवस के शुभ अवसर पर शिव की आराधना करनी चाहिए साथ ही आयु वृद्धि करने वाला

मन्त्र  महामृत्युंजय मंत्र का जप करना चाहिए।
‘ॐ त्रयंबकं यजामहे, सुगंधिम् पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बंधनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्॥’

इस मंत्र का जाप जातक के पूर्ण हुए वर्षों की संख्या के बराबर अवश्य करनी चाहिए। ऐसा करने से आपके जीवन में  आने वाली कठिनाइयाँ शीघ्र ही समाप्त हो जाएगी। यही नहीं यदि किसी अशुभ ग्रह से आप पीड़ित है तो उसमे भी आपको लाभ मिलेगा।

अंत में यह “मंत्र, 

मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं महामुने। यदर्चितं मया देवाः परिपूर्ण तदस्तु मे॥' 

पढ़कर प्रार्थना करें कि हे प्रजापति  इस जातक को चिरायु (जीवेम् शरद: शतं),आरोग्य, ऐश्वर्य, यश और आनंदमय जीवन प्रदान करें। तत्पश्चात, जातक का रोली से तिलक करें, उसकी अंजलि में मिठाई, फल, आदि रख कर उसे गौदुग्ध में काले तिल और गुड़ डालकर पिलाएँ - सतिलं गुड़ सम्मिश्रं अंजल्यर्धमितं पयः। केक की जगह भी कोई अन्य पौष्टिक व्यंजन बनाया जा सकता हैं, पर केक ही मँगानी हो तो विश्वसनीय शाकाहारी स्थान से केक मँगाने का आग्रह रखना चाहिए।

पूजन के बाद माता-पिता को प्रणाम करें। सभी आदरणीय लोगों को और अपने गुरुजनों को प्रणाम करें। उनसे आर्शीवाद लें। माता-पिता बच्चों को उपहार में सिक्का व रूपया दें।
ब्राह्मण भोजन करवाएं। इस दिन जन्मपत्रिका में एक मोली यानी कि लाल रंग का धागा बांधे। और हर साल एक-एक गांठ बांधते जाएं।

अब स्वयं तिल-गुड़ के लड्डु तथा दूध का सेवन करें।

समारोह को गरिमामय बनाने के लिए सुंदर काण्ड, भगवती जागरण, सत्यनारायण कथा आदि  का आयोजन करना श्रेयस्कर रहेगा। जातक के जितने वर्ष पूर्ण हुए हैं उतने दीप रात्रि में जलाकर घर में सब जगह रखे। इति।

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