Ragunath Temple Prat History

 


प्राचीन श्री रघुनाथ मन्दिर पराट का इतिहास



प्राचीन ऐतिहासिक स्थल श्री रघुनाथ मंदिर जम्मू से 92 कि०मी० जम्मू पुंछ राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित सुंदर बनी शहर से 8 कि ०मी० दूर चन्नी-पराट नामक गाँव में स्थित है । यह मन्दिर अतीत की एक अमूल्य धरोहर है जिसने चारों ओर से घिरे इस गाँव में चार चाँद लगा दिए हैं । 
* चन्नी-पराट गाँव का इतिहास *
चन्नी-पराट गाँव प्राचीन कालीन एक सुव्यवस्थित एवं समृद्ध गाँव था ।यह गाँव एक नगर था जिसमें व्यापारी जन दुकानों के माध्यम से जनता की दैनिक अवश्यकताओं की पूर्ति करते थे। वर्तमान समय में भी इस नगर के अवशेष विद्यमान हैं ।इस गाँव के अधिकांश लोग हिन्दू एवं धार्मिक विचारों से ओतप्रोत थे, नगर के बीचों बीच एक चण्डी माता का मन्दिर था जो वर्तमान समय में भी है । यह मन्दिर एक विशालकाय पत्थर पर सुंदर शिल्पकला का अनुपम उदाहरण था । प्राचीन काल में मन्दिरों, वृक्षों, प्राकृतिक घटकों के नाम के आधार पर नगरों का नामकरण होता था । जैसे कोसंब से कोशांबी, रोहीत से रोहतक इत्यादि । अतः इस गाँव का नाम भी इसी परम्परा से चण्डी माता के नाम से चन्नी एवं पत्थरों का आधिक्य  होने के कारण पराट पढ़ गया । दूसरे अर्थ में स्थानीय डोगरी भाषा में चन्नी= चाँद जैसा चमकदार एवं पराट = पत्थर । अर्थात चाँद जैसे चमकदार पत्थरों का नगर, एवं चाँद की रोशनी से चमकते हुए पत्थरों का स्थल । 
*रघुनाथ मन्दिर का इतिहास *
लगभग 17वीं शताब्दी के अंतिम वर्षों की बात है
इसी नगर के पास एक सुंदर जलस्रोत (चश्मा) था। जो चमत्कारिक दृष्टिकोण से आसपास के क्षेत्रों में अति प्रसिद्ध था । कहा जाता है कि इस जलस्रोत में स्नान करने वाले के सभी शारीरिक कष्टों का निवारण हो जाता था । अति वयोवृद्ध ग्रामीण निवासियों के अनुसार पौराणिक ऋषियों में वैद्य ऋषि महर्षि च्यवन ऋषि किसी समय इस स्थान पर प्रतिष्ठित हुए थे । समयानुसार इस स्थान को ठाकुर द्वार की संज्ञा दी गई । ठाकुर द्वार अर्थात श्री कृष्ण का आगमन द्वार ।नगर के पूर्व में स्थित यह स्थान साधु महात्माओं के लिए एकांत एवं रुकने हेतु उपयुक्त था । इस स्थान पर महात्माओं एवं लाभान्वित जनता के सहयोग से एक ठाकुर द्वार के नाम से एक मन्दिर रूपी स्थान बनाया गया । जिसके अवशेष वर्तमान समय में भी विद्यमान हैं । मुगल रोड से जुडते इस गाँव में जम्मू से रियासी एवं रियासी से पुंछ जाते समय लोग यहाँ विश्रान्ति के लिए रुकते थे उस समय इस स्थान का बहुत महत्व था । कहा जाता है कि इस स्थान से उत्तर की ओर बुद्धल नामक गाँव से एक ग्रामीण ईश्वर की प्रेरणा से वाराणसी काशी को प्रस्थान कर गए चिरकालीन काशी में महात्माओं के संग से वह एक महान महात्मा चिन्मयानंद के नाम से प्रसिद्ध हो गए । कालांतर जब वह भिक्षाटन हेतु अपनी जन्म भूमि पधारे तो सर्वप्रथम मार्ग से जाते हुए इस गाँव में रुके । अपने दिव्य आकर्षण के कारण लोगों ने उनके ज्ञान रूपी तेज, ओजिस्विता का यथा संभव सत्कार किया एवं कुछ समय इसी गाँव में रहने का आग्रह किया । गाँव में महात्मा जी निरंतर श्री राम जी के गुणों का सत्संग किया करते थे जिससे अभिप्रेरित होकर गांव के लोगों ने , इस स्थान पर श्री राम जी का मन्दिर होना चाहिए ऐसी इच्छा व्यक्त की । चूँकि महात्मा जी भी यह जानते थे कि इस मार्ग पर कोई भी राम मन्दिर नहीं है अतः राम मन्दिर का विचार उन्हें भी अच्छा लगा । प्रबल इच्छा एवं दृढ़ संकल्प से उन्होंने वैदिक रीति से स्थान चयनित किया जो ठाकुर द्वार के सामने एवं वास्तु के दृष्टिकोण से भी उपयुक्त था । गाँव के लोग इस मनइच्छित कार्य में तन मन धन से सहयोग में तत्पर हो गए । शनैः शनैः सर्वप्रथम चबूतरे का काम प्रारंभ हुआ जिसमें अनपेक्षित धन व्यय हुआ अतः समस्त प्रजा असमर्थ हो गई ।  दुविधा के इन क्षणों में महात्मा जी तत्कालीन जम्मू के राजा महाराज गुलाब सिंह जी से मिले एवं उन्हें सम्पूर्ण वृतांत सुनाया , राजा महात्मा  श्री चिन्मयानंद जी के तेज एवं उनके मन्दिर विषयक विचारों से प्रभावित हुए एवं तत्काल सहायक बने । शीघ्र ही राजा ने कुशल कारीगर एवं धन , वस्तुओं को मन्दिर के निर्माण हेतु प्रेषित किया । उस समय गजधर (मिस्त्री) को चार पैसे एवं सहायक को एक तैला पारिश्रमिक मिलता था  । मन्दिर का भौगोलिक ढाँचा महात्मा श्री चिन्मयानंद जी की दिव्य दृष्टि से काशी के तुलसीनारायण मन्दिर जैसा तैयार किया गया । दो मंजिला मंदिर उस समय की कुशल कारीगरी का एक अद्भुत उदाहरण है जो पत्थर एवं चूने से निर्मित है । मन्दिर सम्पूर्ण धार्मिक भावनाओं के अनुरूप बना है जिसमें नीचे वाले कक्ष में षोडषस्तम्भ हैं जिनकी पूजा का विधिवत विधान वेदों में भी है । मन्दिर की नींव अतीव मजबूत है जो पाँच फुट गहरी पत्थर को खोद कर निकाली गई है एवं इसकी चौड़ाई भी पाँच फुट ही है । दीवारों की चौड़ाई ३ फुट एवं मन्दिर की उंचाई 55 फुट है । मन्दिर के निचले कक्ष में प्रभु श्री राम परिवार की मूर्तियाँ  एवं उपर वाले कक्ष में शालिग्राम जी प्रतिष्ठित थे । जो वर्तमान समय में नूतन परिवेश में स्थित हैं ।
मन्दिर की प्रतिष्ठा स्वयं महाराज गुलाब सिंह जी के करकमलों से काशी के विद्वान पण्डितों की अध्यक्षता में सन् 1865 ई० में हुई थी । मन्दिर की चित्र कला मुगल कालीन चित्र कला को व्यक्त करने का एक माध्यम आज भी बनी हुई है जिसे देखकर लोगआज भी मंत्र मुग्ध हो जाते हैं ।
महाराज ने मन्दिर की देखभाल के लिए महात्मा जी को प्रबंधक बनाया, एवं चन्नी-पराट तथा मरचौला को मन्दिर की दैनिक अवश्यकताओं को पूर्ण करने हेतु कहा , तदुपरांत लोग समय समय पर  छः महीने में एक बार यथा शक्ति दान राशि कर्तव्य के रूप में यहाँ चढाते थे एवं प्रभु प्रसाद से लाभान्वित भी होते थे । मन्दिर की 90 कणाल जमीन मन्दिर की देखभाल करने वाले पुजारी को मन्दिर की सम्पत्ति के रूप में समर्पित थी जिसमें फलदार वृक्षों एवं विभिन्न औषधियों की पराकाष्ठा थी । अति वृद्धावस्था को प्राप्त मन्दिर के निर्माण कर्ता  महात्मा श्री चिन्मयानंद जी भी 5 जून 1869 को दिवंगत हो गए जिनकी समाधि आज भी ठाकुर द्वार के पास है । बाद में मन्दिर की देखभाल की चिंता सम्पूर्ण गाँव वासियों को सताने लगी अतः पुन: एक योगी महात्मा श्री परमानंद जी मन्दिर के पुजारी के रूप में पधारे । 1947 ई० में चन्नी-पराट गाँव कबाईली लड़ाकुओं के हमले से पूरी तरह बर्बाद हो गया । और सम्पूर्ण गाँव अपनी प्राण रक्षा हेतु इस स्थान को छोड़ अन्यत्र चला गया। मन्दिर के पुजारी परमानंद जी अपने हठ के कारण मन्दिर से नहीं गए जिसके चलते वह भी उग्रकारियों के हमले में दिवंगत हो गए । हमलों के कारण मन्दिर की दीवारें कमजोर हो गई थी एवं चित्रकला भी अभद्र हो गई जो देखने में भी अपमान जनक लगती थी । मन्दिर के इर्द-गिर्द जानवरों की हड्डियां एवं पिंजर ही दिखाई देते थे । शनैः शनैः आजादी के बाद पुनः मन्दिर की ओर लोगों का ध्यान आकर्षित हुआ अनेक महात्मा इस स्थान पर आए जिसमें कईं महात्माओं की अकाल मृत्यु हो गई , अतः स्वाभाविक है कि लोगों का मन्दिर के प्रति श्रद्धा भाव कमजोर हो गया । गाँव के पुराने लोग गाँव छोड़ कर अन्यत्र चले गए थे जिसके चलते मन्दिर पर घास फूस एवं वृक्षों का साम्राज्य हो गया । अंततोगत्वा 1972 में एक महात्मा जी यहाँ पधारे जिन्होंने मन्दिर के नव निर्माण की इच्छा व्यक्त की किंतु ग्रामीण लोगों ने सहयोग नहीं दिया तथा वह इस स्थान से चले गए । अंततः मन्दिर के भक्तों मे परम भक्त महात्मा श्री रामदास जी 14 फरवरी 1980 को  इस मन्दिर में पधारे जिन्होंने अपने अतुलनीय तप एवं घोर परिश्रम से मन्दिर का पुनर्निर्माण किया । वर्तमान समय में भी महात्मा श्री रामदास जी मन्दिर की देखभाल में संलग्न हैं ।

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