सरस्वती पूजा के सभी मंत्र मूर्ति प्रतिष्ठा और हवन के साथ

Sarasvati Pooja by Atul sir 

सामान्य पूजा विधि

देव पूजन की प्रविधि सामान्यतया अतिथि सत्कार की पुरातन परंपरा के समान है। इसके अंतर्गत हम भगवान का आवाहन करते हुए विभिन्न सामग्री से उनकी सेवा सत्कार की भावना करते हैं।

इसी के समानांतर दो अन्य बिंदु भी जुड़ जाते हैं-

प्रथम- स्वयं का शुद्धीकरण या पवित्रीकरण तथा ध्यान-प्रार्थना

द्वितीय- जिस सामग्री से हम भगवान का पूजन अर्चन करते हैं, उस पूजन सामग्री का भी शुद्धीकरण या पवित्रीकरण


इसके अतिरिक्त स्वयं व वस्तु दोनों में ही दिव्य भाव के आवाहन हेतु भी उसके पूजन का विधान करते हैं।


कर्मकांड के साथ-साथ सामान्य तौर पर जो मंत्रों के पाठ की प्रक्रिया है, उसमें वैदिक एवं लौकिक दोनों तरह के मंत्र पढ़े जाते हैं। वैदिक मंत्र सामान्यतः दार्शनिक प्रकृति के मंत्र हैं, जिनका कालांतर में कर्मकांडीय उपयोग होने लगा।


कर्मकांडीय दृष्टि से पूजन की विभिन्न व विशेष परंपराएँ रही हैं, जिनमें पंचोपचार तथा षोडशोपचार पूजन सर्वाधिक प्रमुख हैं।


पूजन विधि के लिए कोई एकरूप प्रक्रिया निर्धारित नहीं की जा सकती, क्योंकि अवसर व देव के अनुसार प्रक्रिया परिवर्तित हो सकती है। विद्वानों का मतैक्य भी संभव नहीं और भक्ति के भाव का विधानीकरण भी संभव नहीं।


फिर भी जनसामान्य के पूजन-अर्चन के लिए पूजा पद्धति की सामान्य रूपरेखा निर्धारित की जा सकती है। इसके साथ ही कुछ जनसुविधार्थ सामान्य दिशानिर्देश भी बनाए जा सकते हैं, जैसे-

प्रत्येक पूजारंभ के पूर्व निम्नांकित आचार-अवश्य करने चाहिये- आत्मशुद्धि, आसन शुद्धि, पवित्री धारण, पृथ्वी पूजन, संकल्प, दीप पूजन, शंख पूजन, घंटा पूजन, स्वस्तिवाचन आदि.

भूमि, वस्त्र आसन आदि स्वच्छ व  शुद्ध हों.

आवश्यकतानुसार चौक, रंगोली, मंडप बना लिया जाये.

मान्यता अनुसार मुहूर्त आदि का विचार किया जा सकता है.

यजमान पूर्वाभिमुख बैठे, पुरोहित उत्तराभिमुख.

विवाहित यजमान की पत्नी पति के साथ ग्रंथिबन्धन कर पति की वामंगिनी के रूप में बैठे.

पूजन के समय आवश्यकतानुसार अंगन्यास, करन्यास, मुद्रा आदि का उपयोग किया जा सकता है.

औचित्यानुसार विविध देव प्रतीक भी बनाये जा सकते हैं, जैसे-

33 कोटि देवता

त्रिदेव,

नवदुर्गा

एकादश रुद्र

नवग्रह,

दश दिक्पाल,

षोडश लोकपाल

सप्तमातृका,

दश महाविद्या

बारह यम

आठ वसु

चौदह मनु

सप्त ऋषि

घृतमातृका

दश अवतार

चौबीस अवतार

आदि

ध्यातव्य है कि पूजन के इस प्रकरण के अभ्यास से संकल्प विशेष का परिवर्तन करके विविध पूजा के आयोजन सामान्य रूप से कराये जा सकते हैं।

गणेशाम्बिका पूजन

(पञ्चाङ्ग पूजा विधि)

आचमन- (आत्म शुद्धि के लिए)

 ॐ केशवाय नमः,

ॐ नारायणाय नमः,

ॐ माधवाय नमः।

तीन बार आचमन कर आगे दिये मंत्र पढ़कर हाथ धो लें।

ॐ हृषीकेशाय नमः।।

पुनः बायें हाथ में जल लेकर दाहिने हाथ से अपने ऊपर और पूजा सामग्री पर निम्न श्लोक पढ़ते हुए छिड़कें।

 ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा।

 यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः।।

ॐ पुण्डरीकाक्षः पुनातु, ॐ पुण्डरीकाक्षः पुनातु ॐ पुण्डरीकाक्षः पुनातु।

आसन शुद्धि-

नीचे लिखा मंत्र पढ़कर आसन पर जल छिड़के-

ॐ पृथ्वि! त्वया धृता लोका देवि ! त्वं विष्णुना धृता।

त्वं च धारय मां देवि ! पवित्रां कुरु चासनम्।।

शिखाबन्धन-

ॐ मानस्तोके तनये मानऽआयुषि मानो गोषु मानोऽअश्वेषुरीरिषः।

मानोव्वीरान् रुद्रभामिनो व्वधीर्हविष्मन्तः सदमित्त्वा हवामहे ॐ चिद्रूपिणि महामाये दिव्यतेजः समन्विते।

तिष्ठ देवि शिखाबद्धे तेजोवृद्धिं कुरुष्व मे।।

कुश धारण-

निम्न मंत्र से बायें हाथ में तीन कुश तथा दाहिने हाथ में दो कुश धारण करें।

ॐ पवित्रोस्थो वैष्णव्यौ सवितुर्व्वः प्रसवऽउत्पुनाम्यच्छिद्रेण पवित्रोण सूर्यस्य रश्मिभिः।

तस्य ते पवित्रपते पवित्रपूतस्य यत्कामः पुनेतच्छकेयम्।

पुनः दायें हाथ को पृथ्वी पर उलटा रखकर "ॐ पृथिव्यै नमः" इससे भूमि की पञ्चोपचार पूजा का आसन शुद्धि करें।

यजमान तिलक-

पुनः ब्राह्मण यजमान के ललाट पर कुंकुम तिलक करें।

ॐ आदित्या वसवो रुद्रा विश्वेदेवा मरुद्गणाः।

तिलकान्ते प्रयच्छन्तु धर्मकामार्थसिद्धये।

स्वत्ययन

उसके बाद यजमान आचार्य एवं अन्य ऋत्विजों के साथ हाथ में पुष्पाक्षत लेकर स्वस्त्ययन पढ़े।

ॐ आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतोऽदब्धासोऽ परीतास उद्भिदः।

देवा नो यथा सदमिद् वृधे असन्नप्रायुवो रक्षितारो दिवे दिवे।।

देवानां भद्रा सुमतिर्ऋजूयतां देवाना ँ रातिरभि नो निवर्तताम्।

देवाना ँ सख्यमुपसेदिमा व्वयं देवा न आयुः प्रतिरन्तु जीवसे।।

तान्पूर्वया निविदा हूमहे वयं भगं मित्रामदितिं दक्षमश्रिधम्।

अर्यमणं वरुण ँ सोममश्विना सरस्वती नः सुभगा मयस्करत्।।

तन्नो व्वातो मयोभु वातु भेषजं तन्माता पृथिवी तत्पिता द्यौः।

तद् ग्रावाणः सोमसुतो मयोभुवस्तदश्विना शृणुतं धिष्ण्या युवम्।।

तमीशानं जगतस्तस्थुषस्पतिं धियञ्जिन्वमवसे हूमहे वयम्।

पूषा नो यथा वेदसामसद् वृधे रक्षिता पायुरदब्धः स्वस्तये।।

स्वस्ति न: इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः।

स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु।।

पृषदश्वा मरुतः पृश्निमातरः शुभं यावानो विदथेषु जग्मयः।

अग्निर्जिह्ना मनवः सूरचक्षसो विश्वे नो देवा अवसागमन्निह।।

भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः।

स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवा ँ सस्तनुभिर्व्यशेमहि देवहितं यदायुः।।

शतमिन्नु शरदो अन्ति देवा यत्रा नश्चक्रा जरसं तनूनाम्।

पुत्रसो यत्रा पितरो भवन्ति मा नो मध्या रीरिषतायुर्गन्तोः।।

अदितिर्द्यौरदितिरन्तरिक्षमदितिर्माता स पिता स पुत्राः।

विश्वे देवा अदितिः पञ्चजना अदितिर्जातमदितिर्जनित्वम्।।

ॐ द्यौः शान्तिरन्तरिक्ष Ủ शान्तिः पृथिवी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिर्व्वनस्पतयः शान्तिर्विश्वेदेवाः शान्तिर्ब्रह्मशान्तिः सर्वं Ü शान्तिः शान्तिरेव शान्तिः सामा शान्तिरेधि।।

यतो यतः समीहसे ततो नोऽअभयं कुरू।

शं नः कुरु प्रजाभ्योऽभयं नः पशुब्भ्यः।। सुशान्तिर्भवतु।।

 

हाथ में लिए पुष्प और अक्षत गणेश एवं गौरी पर चढ़ा दें। पुनः हाथ में पुष्प अक्षत आदि लेकर मंगल श्लोक पढ़े।

श्रीमन्महागणाधिपतये नमः।

लक्ष्मीनारायणाभ्यां नमः।

उमामहेश्वराभ्यां नमः।

वाणीहिरण्यगर्भाभ्यां नमः।

शचीपुरन्दराभ्यां नमः।

मातापितृचरणकमलेभ्यो नमः।

इष्टदेवताभ्यो नमः।

कुलदेवताभ्यो नमः।

ग्रामदेवताभ्यो नमः।

वास्तुदेवताभ्यो नमः।

स्थानदेवताभ्यो नमः।

सर्वेभ्यो देवेभ्यो नमः।

सर्वेभ्यो ब्राह्मणेभ्यो नमः।

विश्वेशं माधवं ढुण्ढिं दण्डपाणिं च भैरवम् ।

वन्दे काशीं गुहां गङ्गां भवानीं मणिकर्णिकाम् ।। 1।।

वक्रतुण्ड ! महाकाय ! कोटिसूर्यसमप्रभ ! ।

निर्विघ्नं कुरु मे देव ! सर्वकार्येषु सर्वदा ।। 2।।

सुमुखश्चैकदन्तश्च कपिलो गजकर्णकः ।

लम्बोदरश्च विकटो विघ्ननाशो विनायकः ।। 3।।

धूम्रकेतुर्गणाध्यक्षो भालचन्द्रो गजाननः ।

द्वादशैतानि नामानि यः पठेच्छृणुयादपि ।। 4।।

विद्यारम्भे विवाहे च प्रवेशे निर्गमे तथा ।

सङ्ग्रामे सङ्कटे चैव विघ्नस्तस्य न जायते ।। 5।।

शुक्लाम्बरधरं देवं शशिवर्णं चतुर्भुजम् ।

प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये ।। 6।।

अभीप्सितार्थ-सिद्धîर्थं पूजितो यः सुराऽसुरैः ।

सर्वविघ्नहरस्तस्मै गणाधिपतये नमः ।। 7।।

सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके ! ।

शरण्ये त्रयम्बके गौरि नारायणि ! नमोऽस्तु ते ।। 8।।

सर्वदा सर्वकार्येषु नास्ति तेषाममङ्गलम् ।

येषां हृदिस्थो भगवान् मङ्गलायतनो हरिः ।। 9।।

तदेव लग्नं सुदिनं तदेव ताराबलं चन्द्रबलं तदेव ।

विद्यावलं दैवबलं तदेव लक्ष्मीपते तेऽङ्घ्रियुगं स्मरामि।। 10।।

लाभस्तेषां जयस्तेषां कुतस्तेषां पराजयः ।

येषामिन्दीवरश्यामो हृदयस्थो जनार्दनः ।। 11।।

यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः ।

तत्र श्रीर्विजयो भूतिध्र्रुवा नीतिर्मतिर्मम ।।12।।

अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते ।

तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ।। 13।।

स्मृतेः सकलकल्याणं भाजनं यत्र जायते ।

पुरुषं तमजं नित्यं ब्रजामि शरणं हरिम् ।। 14।।

सर्वेष्वारम्भकार्येषु त्रयस्त्रिभुवनेश्वराः ।

देवा दिशन्तु नः सिद्धिं ब्रह्मेशानजनार्दनाः ।। 15।।

हाथ में लिये अक्षत-पुष्प को गणेशाम्बिका पर चढ़ा दें।

संकल्प

दाहिने हाथ में जल, अक्षत, पुष्प और द्रव्य लेकर संकल्प करे।

ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः ॐ स्वस्ति श्रीमन्मुकन्दसच्चिदानन्दस्याज्ञया प्रवर्तमानस्याद्य ब्रह्मणो द्वितीये परार्धे एकपञ्चाशत्तमे वर्षे प्रथममासे प्रथमपक्षे प्रथमदिवसे द्वात्रिंशत्कल्पानां मध्ये अष्टमे श्रीश्वेतबाराहकल्पे स्वायम्भुवादिमन्वतराणां मध्ये सप्तमे वैवस्वतमन्वन्तरे कृत-त्रोता-द्वापर- कलिसंज्ञानां चतुर्युगानां मध्ये वर्तमाने अष्टाविंशतितमे कलियुगे तत्प्रथमचरणे तथा पञ्चाशत्कोटियोजनविस्तीर्ण-भूमण्डलान्तर्गतसप्तद्वीपमध्यवर्तिनि जम्बूद्वीपे तत्रापि श्रीगङ्गादिसरिद्भिः पाविते परम-पवित्रे भारतवर्षे आर्यावर्तान्तर्गतकाशी-कुरुक्षेत्र-पुष्कर-प्रयागादि-नाना-तीर्थयुक्त कर्मभूमौ मध्यरेखाया मध्ये अमुक दिग्भागे अमुकक्षेत्रे ब्रह्मावर्तादमुकदिग्भागा- वस्थितेऽमुकजनपदे तज्जनपदान्तर्गते अमुकग्रामे श्रीगङ्गायमुनयोरमुकदिग्भागे श्रीनर्मदाया अमुकप्रदेशे देवब्राह्माणानां सन्निधौ श्रीमन्नृपतिवीरविक्रमादित्य-समयतोऽमुक संख्यापरिमिते प्रवर्तमानवत्सरे प्रभवादिषष्ठिसम्वत्सराणां मध्ये अमुकनाम सम्वत्सरे, अमुकायने, अमुकगोले, अमुकऋतौ, अमुकमासे, अमुकपक्षे, अमुकतिथौ, अमुकवासरे, यथांशकलग्नमुहूर्तनक्षत्रायोगकरणान्वित.अमुकराशिस्थिते श्रीसूर्ये, अमुकराशिस्थिते चन्द्रे, अमुकराशिस्थे देवगुरौ, शेषेषु ग्रहेषु यथायथाराशिस्थानस्थितेषु, सत्सु एवं ग्रहगुणविशिष्टेऽस्मिन्शुभक्षणे अमुकगोत्रोऽमुकशर्म्मा वर्मा-गुप्त-दास सपत्नीकोऽहं श्रीअमुकदेवताप्रीत्यर्थम् अमुककामनया ब्राह्मणद्वारा कृतस्यामुकमन्त्रपुरश्चरणस्य सङ्गतासिद्धîर्थ- ममुकसंख्यया परिमितजपदशांश-होम-तद्दशांशतर्पण-तद्दशांश-ब्राह्मण-भोजन रूपं कर्म करिष्ये।

अथवा –

ममात्मनः श्रुतिस्मृतिपुराणोक्तफलप्राप्त्यर्थं सकुटुम्बस्य सपरिवारस्य द्विपदचतुष्पदसहितस्य सर्वारिष्टनिरसनार्थं सर्वदा शुभफलप्राप्तिमनोभि- लषितसिद्धिपूर्वकम् अमुकदेवताप्रीत्यर्थं होमकर्माहं करिष्ये।

अक्षत सहित जल भूमि पर छोड़ें।

पुनः जल आदि लेकर-

तदङ्गत्वेन निर्विध्नतासिद्धîर्थं श्रीगणपत्यादिपूजनम् आचार्यादिवरणञ्च करिष्ये।

तत्रादौ दीपशंखघण्टाद्यर्चनं च करिष्ये।

जलपात्र (कर्मपात्र) का पूजन-

इसके बाद कर्मपात्र में थोड़ा गंगाजल छोड़कर गन्धाक्षत, पुष्प से पूजा कर प्रार्थना करें।

ॐ गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि! सरस्वति!।

नर्म्मदे! सिन्धु कावेरि! जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरु।।

अस्मिन् कलशे सर्वाणि तीर्थान्यावाहयामि नमस्करोमि।

कर्मपात्र का पूजन करके उसके जल से सभी पूजा वस्तुओं पर छिड़कें.

घृतदीप-(ज्योति) पूजन-

"वह्निदैवतायै दीपपात्राय नमः" से पात्र की पूजा कर ईशान दिशा में घी का दीपक जलाकर अक्षत के ऊपर रखकर

ॐ अग्निर्ज्ज्योतिज्ज्योतिरग्निः स्वाहा,

सूर्यो ज्ज्योतिज्ज्योतिः सूर्यः स्वाहा।

अग्निर्व्वर्च्चो ज्ज्योतिर्व्वर्च्चः स्वाहा,

सूर्योव्वर्चोज्ज्योतिर्व्वर्च्चः स्वाहा ।।

ज्ज्योतिः सूर्य्यः सूर्य्यो ज्ज्योतिः स्वाहा।

भो दीप देवरूपस्त्वं कर्मसाक्षी ह्यविघ्नकृत्।

यावत्पूजासमाप्तिः स्यात्तावदत्रा स्थिरो भव।।

ॐ भूर्भुवः स्वः दीपस्थदेवतायै नमः आवाहयामि सर्वोपचारार्थे गन्धाक्षतपुष्पाणि समर्पयामि नमस्करोमि।

शंखपूजन

शंख को चन्दन से लेपकर देवता के वायीं ओर पुष्प पर रखकर शंख मुद्रा करें।

ॐ शंखं चन्द्रार्कदैवत्यं वरुणं चाधिदैवतम्।

पृष्ठे प्रजापतिं विद्यादग्रे गङ्गासरस्वती।।

त्रौलोक्ये यानि तीर्थानि वासुदेवस्य चाज्ञया।

शंखे तिष्ठन्ति वै नित्यं तस्माच्छंखं प्रपूजयेत्।।

त्वं पुरा सागरोत्पन्नो विष्णुना विधृतः करे।

नमितः सर्वदेवैश्च पाझ्जन्य! नमोऽस्तुते।।

पाञ्चजन्याय विद्महे पावमानाय धीमहि तन्नः शंखः प्रचोदयात्।

ॐ भूर्भवः स्वः शंखस्थदेवतायै नमः

शंखस्थदेवतामावाहयामि सर्वोपचारार्थे गन्धपुष्पाणि समर्पयामि नमस्करोमि।

घण्टा पूजन-

ॐ सर्ववाद्यमयीघण्टायै नमः,

आगमार्थन्तु देवानां गमनार्थन्तु रक्षसाम्।

कुरु घण्टे वरं नादं देवतास्थानसन्निधौ।।

ॐ भूर्भुवः स्वः घण्टास्थाय गरुडाय नमः गरुडमावाहयामि सर्वोपचारार्थे गन्धाक्षतपुष्पाणि समर्पयामि।

गरुडमुद्रा दिखाकर घण्टा बजाएं। दीपक के दाहिनी ओर स्थापित कर दें।

धूपपात्र की पूजा-

ॐ गन्धर्वदैवत्याय धूपपात्राय नमः इस प्रकार धूपपात्र की पूजा कर 


संस्कृति


 

सामान्य पूजा विधि

देव पूजन की प्रविधि सामान्यतया अतिथि सत्कार की पुरातन परंपरा के समान है। इसके अंतर्गत हम भगवान का आवाहन करते हुए विभिन्न सामग्री से उनकी सेवा सत्कार की भावना करते हैं।
इसी के समानांतर दो अन्य बिंदु भी जुड़ जाते हैं-

प्रथम- स्वयं का शुद्धीकरण या पवित्रीकरण तथा ध्यान-प्रार्थना

द्वितीय- जिस सामग्री से हम भगवान का पूजन अर्चन करते हैं, उस पूजन सामग्री का भी शुद्धीकरण या पवित्रीकरण

इसके अतिरिक्त स्वयं व वस्तु दोनों में ही दिव्य भाव के आवाहन हेतु भी उसके पूजन का विधान करते हैं।

कर्मकांड के साथ-साथ सामान्य तौर पर जो मंत्रों के पाठ की प्रक्रिया है, उसमें वैदिक एवं लौकिक दोनों तरह के मंत्र पढ़े जाते हैं। वैदिक मंत्र सामान्यतः दार्शनिक प्रकृति के मंत्र हैं, जिनका कालांतर में कर्मकांडीय उपयोग होने लगा।

कर्मकांडीय दृष्टि से पूजन की विभिन्न व विशेष परंपराएँ रही हैं, जिनमें पंचोपचार तथा षोडशोपचार पूजन सर्वाधिक प्रमुख हैं।

पूजन विधि के लिए कोई एकरूप प्रक्रिया निर्धारित नहीं की जा सकती, क्योंकि अवसर व देव के अनुसार प्रक्रिया परिवर्तित हो सकती है। विद्वानों का मतैक्य भी संभव नहीं और भक्ति के भाव का विधानीकरण भी संभव नहीं।

फिर भी जनसामान्य के पूजन-अर्चन के लिए पूजा पद्धति की सामान्य रूपरेखा निर्धारित की जा सकती है। इसके साथ ही कुछ जनसुविधार्थ सामान्य दिशानिर्देश भी बनाए जा सकते हैं, जैसे-

  • प्रत्येक पूजारंभ के पूर्व निम्नांकित आचार-अवश्य करने चाहिये- आत्मशुद्धि, आसन शुद्धि, पवित्री धारण, पृथ्वी पूजन, संकल्प, दीप पूजन, शंख पूजन, घंटा पूजन, स्वस्तिवाचन आदि.
  • भूमि, वस्त्र आसन आदि स्वच्छ व  शुद्ध हों.
  • आवश्यकतानुसार चौक, रंगोली, मंडप बना लिया जाये.
  • मान्यता अनुसार मुहूर्त आदि का विचार किया जा सकता है.
  • यजमान पूर्वाभिमुख बैठे, पुरोहित उत्तराभिमुख.
  • विवाहित यजमान की पत्नी पति के साथ ग्रंथिबन्धन कर पति की वामंगिनी के रूप में बैठे.
  • पूजन के समय आवश्यकतानुसार अंगन्यास, करन्यास, मुद्रा आदि का उपयोग किया जा सकता है.
  • औचित्यानुसार विविध देव प्रतीक भी बनाये जा सकते हैं, जैसे-

33 कोटि देवता
त्रिदेव,
नवदुर्गा
एकादश रुद्र
नवग्रह,
दश दिक्पाल,
षोडश लोकपाल
सप्तमातृका,
दश महाविद्या
बारह यम
आठ वसु
चौदह मनु
सप्त ऋषि
घृतमातृका
दश अवतार
चौबीस अवतार
आदि

ध्यातव्य है कि पूजन के इस प्रकरण के अभ्यास से संकल्प विशेष का परिवर्तन करके विविध पूजा के आयोजन सामान्य रूप से कराये जा सकते हैं।

गणेशाम्बिका पूजन
(पञ्चाङ्ग पूजा विधि)

आचमन- (आत्म शुद्धि के लिए)

 ॐ केशवाय नमः,
ॐ नारायणाय नमः,
ॐ माधवाय नमः।
तीन बार आचमन कर आगे दिये मंत्र पढ़कर हाथ धो लें।
ॐ हृषीकेशाय नमः।।
पुनः बायें हाथ में जल लेकर दाहिने हाथ से अपने ऊपर और पूजा सामग्री पर निम्न श्लोक पढ़ते हुए छिड़कें।
 ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा।
 यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः।।
ॐ पुण्डरीकाक्षः पुनातु, ॐ पुण्डरीकाक्षः पुनातु ॐ पुण्डरीकाक्षः पुनातु।

आसन शुद्धि-

नीचे लिखा मंत्र पढ़कर आसन पर जल छिड़के-
ॐ पृथ्वि! त्वया धृता लोका देवि ! त्वं विष्णुना धृता।
त्वं च धारय मां देवि ! पवित्रां कुरु चासनम्।।

शिखाबन्धन-

ॐ मानस्तोके तनये मानऽआयुषि मानो गोषु मानोऽअश्वेषुरीरिषः।
मानोव्वीरान् रुद्रभामिनो व्वधीर्हविष्मन्तः सदमित्त्वा हवामहे ॐ चिद्रूपिणि महामाये दिव्यतेजः समन्विते।
तिष्ठ देवि शिखाबद्धे तेजोवृद्धिं कुरुष्व मे।।

कुश धारण-

निम्न मंत्र से बायें हाथ में तीन कुश तथा दाहिने हाथ में दो कुश धारण करें।
ॐ पवित्रोस्थो वैष्णव्यौ सवितुर्व्वः प्रसवऽउत्पुनाम्यच्छिद्रेण पवित्रोण सूर्यस्य रश्मिभिः।
तस्य ते पवित्रपते पवित्रपूतस्य यत्कामः पुनेतच्छकेयम्।
पुनः दायें हाथ को पृथ्वी पर उलटा रखकर "ॐ पृथिव्यै नमः" इससे भूमि की पञ्चोपचार पूजा का आसन शुद्धि करें।

यजमान तिलक-

पुनः ब्राह्मण यजमान के ललाट पर कुंकुम तिलक करें।
ॐ आदित्या वसवो रुद्रा विश्वेदेवा मरुद्गणाः।
तिलकान्ते प्रयच्छन्तु धर्मकामार्थसिद्धये।

स्वत्ययन

उसके बाद यजमान आचार्य एवं अन्य ऋत्विजों के साथ हाथ में पुष्पाक्षत लेकर स्वस्त्ययन पढ़े।
ॐ आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतोऽदब्धासोऽ परीतास उद्भिदः।
देवा नो यथा सदमिद् वृधे असन्नप्रायुवो रक्षितारो दिवे दिवे।।
देवानां भद्रा सुमतिर्ऋजूयतां देवाना ँ रातिरभि नो निवर्तताम्।
देवाना ँ सख्यमुपसेदिमा व्वयं देवा न आयुः प्रतिरन्तु जीवसे।।
तान्पूर्वया निविदा हूमहे वयं भगं मित्रामदितिं दक्षमश्रिधम्।
अर्यमणं वरुण ँ सोममश्विना सरस्वती नः सुभगा मयस्करत्।।
तन्नो व्वातो मयोभु वातु भेषजं तन्माता पृथिवी तत्पिता द्यौः।
तद् ग्रावाणः सोमसुतो मयोभुवस्तदश्विना शृणुतं धिष्ण्या युवम्।।
तमीशानं जगतस्तस्थुषस्पतिं धियञ्जिन्वमवसे हूमहे वयम्।
पूषा नो यथा वेदसामसद् वृधे रक्षिता पायुरदब्धः स्वस्तये।।
स्वस्ति न: इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः।
स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु।।
पृषदश्वा मरुतः पृश्निमातरः शुभं यावानो विदथेषु जग्मयः।
अग्निर्जिह्ना मनवः सूरचक्षसो विश्वे नो देवा अवसागमन्निह।।
भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः।
स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवा ँ सस्तनुभिर्व्यशेमहि देवहितं यदायुः।।
शतमिन्नु शरदो अन्ति देवा यत्रा नश्चक्रा जरसं तनूनाम्।
पुत्रसो यत्रा पितरो भवन्ति मा नो मध्या रीरिषतायुर्गन्तोः।।
अदितिर्द्यौरदितिरन्तरिक्षमदितिर्माता स पिता स पुत्राः।
विश्वे देवा अदितिः पञ्चजना अदितिर्जातमदितिर्जनित्वम्।।
ॐ द्यौः शान्तिरन्तरिक्ष Ủ शान्तिः पृथिवी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिर्व्वनस्पतयः शान्तिर्विश्वेदेवाः शान्तिर्ब्रह्मशान्तिः सर्वं Ü शान्तिः शान्तिरेव शान्तिः सामा शान्तिरेधि।।
यतो यतः समीहसे ततो नोऽअभयं कुरू।
शं नः कुरु प्रजाभ्योऽभयं नः पशुब्भ्यः।। सुशान्तिर्भवतु।।
 
हाथ में लिए पुष्प और अक्षत गणेश एवं गौरी पर चढ़ा दें। पुनः हाथ में पुष्प अक्षत आदि लेकर मंगल श्लोक पढ़े।
श्रीमन्महागणाधिपतये नमः।
लक्ष्मीनारायणाभ्यां नमः।
उमामहेश्वराभ्यां नमः।
वाणीहिरण्यगर्भाभ्यां नमः।
शचीपुरन्दराभ्यां नमः।
मातापितृचरणकमलेभ्यो नमः।
इष्टदेवताभ्यो नमः।
कुलदेवताभ्यो नमः।
ग्रामदेवताभ्यो नमः।
वास्तुदेवताभ्यो नमः।
स्थानदेवताभ्यो नमः।
सर्वेभ्यो देवेभ्यो नमः।
सर्वेभ्यो ब्राह्मणेभ्यो नमः।
विश्वेशं माधवं ढुण्ढिं दण्डपाणिं च भैरवम् ।
वन्दे काशीं गुहां गङ्गां भवानीं मणिकर्णिकाम् ।। 1।।
वक्रतुण्ड ! महाकाय ! कोटिसूर्यसमप्रभ ! ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव ! सर्वकार्येषु सर्वदा ।। 2।।
सुमुखश्चैकदन्तश्च कपिलो गजकर्णकः ।
लम्बोदरश्च विकटो विघ्ननाशो विनायकः ।। 3।।
धूम्रकेतुर्गणाध्यक्षो भालचन्द्रो गजाननः ।
द्वादशैतानि नामानि यः पठेच्छृणुयादपि ।। 4।।
विद्यारम्भे विवाहे च प्रवेशे निर्गमे तथा ।
सङ्ग्रामे सङ्कटे चैव विघ्नस्तस्य न जायते ।। 5।।
शुक्लाम्बरधरं देवं शशिवर्णं चतुर्भुजम् ।
प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये ।। 6।।
अभीप्सितार्थ-सिद्धîर्थं पूजितो यः सुराऽसुरैः ।
सर्वविघ्नहरस्तस्मै गणाधिपतये नमः ।। 7।।
सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके ! ।
शरण्ये त्रयम्बके गौरि नारायणि ! नमोऽस्तु ते ।। 8।।
सर्वदा सर्वकार्येषु नास्ति तेषाममङ्गलम् ।
येषां हृदिस्थो भगवान् मङ्गलायतनो हरिः ।। 9।।
तदेव लग्नं सुदिनं तदेव ताराबलं चन्द्रबलं तदेव ।
विद्यावलं दैवबलं तदेव लक्ष्मीपते तेऽङ्घ्रियुगं स्मरामि।। 10।।
लाभस्तेषां जयस्तेषां कुतस्तेषां पराजयः ।
येषामिन्दीवरश्यामो हृदयस्थो जनार्दनः ।। 11।।
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः ।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिध्र्रुवा नीतिर्मतिर्मम ।।12।।
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते ।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ।। 13।।
स्मृतेः सकलकल्याणं भाजनं यत्र जायते ।
पुरुषं तमजं नित्यं ब्रजामि शरणं हरिम् ।। 14।।
सर्वेष्वारम्भकार्येषु त्रयस्त्रिभुवनेश्वराः ।
देवा दिशन्तु नः सिद्धिं ब्रह्मेशानजनार्दनाः ।। 15।।
हाथ में लिये अक्षत-पुष्प को गणेशाम्बिका पर चढ़ा दें।

संकल्प

दाहिने हाथ में जल, अक्षत, पुष्प और द्रव्य लेकर संकल्प करे।

ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः ॐ स्वस्ति श्रीमन्मुकन्दसच्चिदानन्दस्याज्ञया प्रवर्तमानस्याद्य ब्रह्मणो द्वितीये परार्धे एकपञ्चाशत्तमे वर्षे प्रथममासे प्रथमपक्षे प्रथमदिवसे द्वात्रिंशत्कल्पानां मध्ये अष्टमे श्रीश्वेतबाराहकल्पे स्वायम्भुवादिमन्वतराणां मध्ये सप्तमे वैवस्वतमन्वन्तरे कृत-त्रोता-द्वापर- कलिसंज्ञानां चतुर्युगानां मध्ये वर्तमाने अष्टाविंशतितमे कलियुगे तत्प्रथमचरणे तथा पञ्चाशत्कोटियोजनविस्तीर्ण-भूमण्डलान्तर्गतसप्तद्वीपमध्यवर्तिनि जम्बूद्वीपे तत्रापि श्रीगङ्गादिसरिद्भिः पाविते परम-पवित्रे भारतवर्षे आर्यावर्तान्तर्गतकाशी-कुरुक्षेत्र-पुष्कर-प्रयागादि-नाना-तीर्थयुक्त कर्मभूमौ मध्यरेखाया मध्ये अमुक दिग्भागे अमुकक्षेत्रे ब्रह्मावर्तादमुकदिग्भागा- वस्थितेऽमुकजनपदे तज्जनपदान्तर्गते अमुकग्रामे श्रीगङ्गायमुनयोरमुकदिग्भागे श्रीनर्मदाया अमुकप्रदेशे देवब्राह्माणानां सन्निधौ श्रीमन्नृपतिवीरविक्रमादित्य-समयतोऽमुक संख्यापरिमिते प्रवर्तमानवत्सरे प्रभवादिषष्ठिसम्वत्सराणां मध्ये अमुकनाम सम्वत्सरे, अमुकायने, अमुकगोले, अमुकऋतौ, अमुकमासे, अमुकपक्षे, अमुकतिथौ, अमुकवासरे, यथांशकलग्नमुहूर्तनक्षत्रायोगकरणान्वित.अमुकराशिस्थिते श्रीसूर्ये, अमुकराशिस्थिते चन्द्रे, अमुकराशिस्थे देवगुरौ, शेषेषु ग्रहेषु यथायथाराशिस्थानस्थितेषु, सत्सु एवं ग्रहगुणविशिष्टेऽस्मिन्शुभक्षणे अमुकगोत्रोऽमुकशर्म्मा वर्मा-गुप्त-दास सपत्नीकोऽहं श्रीअमुकदेवताप्रीत्यर्थम् अमुककामनया ब्राह्मणद्वारा कृतस्यामुकमन्त्रपुरश्चरणस्य सङ्गतासिद्धîर्थ- ममुकसंख्यया परिमितजपदशांश-होम-तद्दशांशतर्पण-तद्दशांश-ब्राह्मण-भोजन रूपं कर्म करिष्ये।

अथवा –

ममात्मनः श्रुतिस्मृतिपुराणोक्तफलप्राप्त्यर्थं सकुटुम्बस्य सपरिवारस्य द्विपदचतुष्पदसहितस्य सर्वारिष्टनिरसनार्थं सर्वदा शुभफलप्राप्तिमनोभि- लषितसिद्धिपूर्वकम् अमुकदेवताप्रीत्यर्थं होमकर्माहं करिष्ये।

अक्षत सहित जल भूमि पर छोड़ें।

पुनः जल आदि लेकर-

तदङ्गत्वेन निर्विध्नतासिद्धîर्थं श्रीगणपत्यादिपूजनम् आचार्यादिवरणञ्च करिष्ये।
तत्रादौ दीपशंखघण्टाद्यर्चनं च करिष्ये।

जलपात्र (कर्मपात्र) का पूजन-
इसके बाद कर्मपात्र में थोड़ा गंगाजल छोड़कर गन्धाक्षत, पुष्प से पूजा कर प्रार्थना करें।
ॐ गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि! सरस्वति!।
नर्म्मदे! सिन्धु कावेरि! जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरु।।
अस्मिन् कलशे सर्वाणि तीर्थान्यावाहयामि नमस्करोमि।
कर्मपात्र का पूजन करके उसके जल से सभी पूजा वस्तुओं पर छिड़कें.

घृतदीप-(ज्योति) पूजन-

"वह्निदैवतायै दीपपात्राय नमः" से पात्र की पूजा कर ईशान दिशा में घी का दीपक जलाकर अक्षत के ऊपर रखकर
ॐ अग्निर्ज्ज्योतिज्ज्योतिरग्निः स्वाहा,
सूर्यो ज्ज्योतिज्ज्योतिः सूर्यः स्वाहा।
अग्निर्व्वर्च्चो ज्ज्योतिर्व्वर्च्चः स्वाहा,
सूर्योव्वर्चोज्ज्योतिर्व्वर्च्चः स्वाहा ।।
ज्ज्योतिः सूर्य्यः सूर्य्यो ज्ज्योतिः स्वाहा।
भो दीप देवरूपस्त्वं कर्मसाक्षी ह्यविघ्नकृत्।
यावत्पूजासमाप्तिः स्यात्तावदत्रा स्थिरो भव।।
ॐ भूर्भुवः स्वः दीपस्थदेवतायै नमः आवाहयामि सर्वोपचारार्थे गन्धाक्षतपुष्पाणि समर्पयामि नमस्करोमि।

शंखपूजन

शंख को चन्दन से लेपकर देवता के वायीं ओर पुष्प पर रखकर शंख मुद्रा करें।
ॐ शंखं चन्द्रार्कदैवत्यं वरुणं चाधिदैवतम्।
पृष्ठे प्रजापतिं विद्यादग्रे गङ्गासरस्वती।।
त्रौलोक्ये यानि तीर्थानि वासुदेवस्य चाज्ञया।
शंखे तिष्ठन्ति वै नित्यं तस्माच्छंखं प्रपूजयेत्।।
त्वं पुरा सागरोत्पन्नो विष्णुना विधृतः करे।
नमितः सर्वदेवैश्च पाझ्जन्य! नमोऽस्तुते।।
पाञ्चजन्याय विद्महे पावमानाय धीमहि तन्नः शंखः प्रचोदयात्।
ॐ भूर्भवः स्वः शंखस्थदेवतायै नमः
शंखस्थदेवतामावाहयामि सर्वोपचारार्थे गन्धपुष्पाणि समर्पयामि नमस्करोमि।

घण्टा पूजन-

ॐ सर्ववाद्यमयीघण्टायै नमः,
आगमार्थन्तु देवानां गमनार्थन्तु रक्षसाम्।
कुरु घण्टे वरं नादं देवतास्थानसन्निधौ।।
ॐ भूर्भुवः स्वः घण्टास्थाय गरुडाय नमः गरुडमावाहयामि सर्वोपचारार्थे गन्धाक्षतपुष्पाणि समर्पयामि।
गरुडमुद्रा दिखाकर घण्टा बजाएं। दीपक के दाहिनी ओर स्थापित कर दें।

धूपपात्र की पूजा-

ॐ गन्धर्वदैवत्याय धूपपात्राय नमः इस प्रकार धूपपात्र की पूजा कर स्थापना कर दें।

गणेश गौरी पूजन

हाथ में अक्षत लेकर-भगवान् गणेश का ध्यान-
गजाननं भूतगणादिसेवितं कपित्थजम्बूफलचारुभक्षणम्।
उमासुतं शोकविनाशकारकं नमामि विघ्नेश्वरपादपङ्कजम्।।

गौरी का ध्यान -

नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः।
नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणताः स्म ताम्।।
श्री गणेशाम्बिकाभ्यां नमः, ध्यानं समर्पयामि।

गणेश का आवाहन-

हाथ में अक्षत लेकर
ॐ गणानां त्वा गणपति ँ हवामहे
प्रियाणां त्वा प्रियपति ँ हवामहे
निधीनां त्वा निधिपति ँ हवामहे
वसो मम। आहमजानि गर्भधमा त्वमजासि गर्भधम्।।
एह्येहि हेरम्ब महेशपुत्र ! समस्तविघ्नौघविनाशदक्ष !।
माङ्गल्यपूजाप्रथमप्रधान गृहाण पूजां भगवन् ! नमस्ते।।
ॐ भूर्भुवः स्वः सिद्धिबुद्धिसहिताय गणपतये नमः, गणपतिमावाहयामि, स्थापयामि, पूजयामि च।
हाथ के अक्षत को गणेश जी पर चढ़ा दें।
पुनः अक्षत लेकर गणेशजी की दाहिनी ओर गौरी जी का आवाहन करें।

गौरी का आवाहन -

ॐ अम्बे अम्बिकेऽम्बालिके न मा नयति कश्चन।
 ससस्त्यश्वकः सुभद्रिकां काम्पीलवासिनीम्।।
हेमाद्रितनयां देवीं वरदां शङ्करप्रियाम्।
लम्बोदरस्य जननीं गौरीमावाहयाम्यहम्।।
ॐभूर्भुवः स्वः गौर्यै नमः, गौरीमावाहयामि, स्थापयामि, पूजयामि च।

प्रतिष्ठा-

ॐ मनो जूतिर्जुषतामाज्यस्य बृहस्पतिर्यज्ञमिमं तनोत्वरिष्टं यज्ञ ँ समिमं दधातु।
विश्वे देवास इह मादयन्तामो 3 म्प्रतिष्ठ।।
अस्यै प्राणाः प्रतिष्ठन्तु अस्यै प्राणाः क्षरन्तु च।
अस्यै देवत्वमर्चायै मामहेति च कश्चन।।
गणेशाम्बिके ! सुप्रतिष्ठिते वरदे भवेताम्।
प्रतिष्ठापूर्वकम् आसनार्थे अक्षतान् समर्पयामि गणेशाम्बिकाभ्यां नमः।
(आसन के लिए अक्षत समर्पित करे)।
पाद्य, अर्घ्य. आचमनीय, स्नानीय और पुनराचमनीय हेतु जल अर्पण करें.
ॐ देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेऽश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्याम्।।
एतानि पाद्यार्घ्याचमनीयस्नानीयपुनराचमनीयानि समर्पयामि गणेशाम्बिकाभ्यां नमः।

दुग्धस्नान-

ॐ पय: पृथिव्यां पय ओषधीषु पयो दिव्यन्तरिक्षे पयो धाः पयस्वतीः।
प्रदिशः सन्तु मह्यम्।।
कामधेनुसमुद्भूतं सर्वेषां जीवनं परम्।
पावनं यज्ञहेतुश्च पयः स्नानार्थमर्पितम्।।
ॐ भूर्भुवः स्वः गणेशाम्बिकाभ्यां नमः, पयः स्नानं समर्पयामि।

दधिस्नान -

ॐ दधिक्राव्णो अकारिषं जिष्णोरश्वस्य वाजिनः।
सुरभि नो मुखाकरत्प्रण आयू ँ षि तारिषत्।।
पयसस्तु समुद्भूतं मधुराम्लं शशिप्रभम्।
दध्यानीतं मया देव! स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम्।।
ॐ भूर्भुवः स्वः गणेशाम्बिकाभ्यां नमः, दधिस्नानं समर्पयामि।
(पुनः जल स्नान करायें।)

घृत स्नान -

ॐ घृतं मिमिक्षे घृतमस्य योनिर्घृते श्रितो घृतम्वस्य धाम।
अनुष्वधमा वह मादयस्व स्वाहाकृतं वृषभ वक्षि हव्यम्।।
नवनीतसमुत्पन्नं सर्वसंतोषकारकम्।
घृतं तुभ्यं प्रदास्यामि स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम्।।
ॐ भूर्भुवः स्वः गणेशाम्बिकाभ्यां नमः, घृतस्नानं समर्पयामि।
(पुनः जल स्नान करायें।)

मधुस्नान -

ॐ मधुव्वाताऽऋतायते मधुक्षरन्ति सिन्धवः।
माध्वीर्नः सन्त्वोषधीः मधुनक्तमुतोषसो मधुमत्पार्थिव ँ रजः।
मधुद्यौरस्तु नः पिता मधुमान्नो व्वनस्पतिर्म्मधुमाँऽ अस्तु सूर्यः माध्वीर्गावो भवन्तु नः।।
पुष्परेणुसमुद्भूतं सुस्वादु मधुरं मधु।
तेजः पुष्टिकरं दिव्यं स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम्।।
ॐ भूर्भुवः स्वः गणेशाम्बिकाभ्यां नमः, मधुस्नानं समर्पयामि।
(पुनः जल स्नान करायें।)

शर्करास्नान -

ॐ अपा ँ रसमुद्वयस Ü सूर्ये सन्त ँ समाहितम्।
अपा Ủ रसस्य यो रसस्तं वो गृह्णाम्युत्तममुपयामगृहीतोऽसीन्द्राय त्वा जुष्टं गृह्णाम्येष ते योनिरिन्द्राय त्वा जुष्टतमम्।।
इक्षुरससमुद्भूतां शर्करां पुष्टिदां शुभाम्।
मलापहारिकां दिव्यां स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम्।।
ॐ भूर्भुवः स्वः गणेशाम्बिकाभ्यां नमः, शर्करास्नानं समर्पयामि।
(पुनः जल स्नान करायें।)

पञ्चामृतस्नान -

ॐ पञ्चनद्यः सरस्वतीमपि यन्ति सश्रोतसः।
सरस्वती तु पञ्चधा सोदेशेऽभवत्सरित्।।
पञ्चामृतं मयानीतं पयो दधि घृतं मधु।
शर्करया समायुक्तं स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम्।।
ॐ भूर्भुवः स्वः गणेशाम्बिकाभ्यां नमः, पञ्चामृतस्नानं समर्पयामि।

शुद्धोदकस्नान-

ॐ शुद्धवालः सर्वशुद्धवालो मणिवालस्तऽआश्विनाः श्येतः श्येताक्षोऽरुणस्ते रुद्राय पशुपतये कर्णायामा अवलिप्तारौद्रा नभोरूपाः पार्जन्याः।।
गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति।
नर्मदे सिन्धुकावेरि स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम्।।
ॐ भूर्भुवः स्वः गणेशाम्बिकाभ्यां नमः, शुद्धोकस्नानं समर्पयामि।

आचमन -

शुद्धोकदकस्नानान्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि।
(आचमन के लिए जल दें।)

वस्त्र-

ॐ युवा सुवासाः परिवीत आगात् स उ श्रेयान् भवति जायमानः।
तं धीरासः कवय उन्नयन्ति स्वाध्यो3 मनसा देवयन्तः।।
शीतवातोष्णसंत्राणं लज्जाया रक्षणं परम्।
देहालङ्करणं वस्त्रामतः शान्तिं प्रयच्छ मे।।
ॐ भूर्भुवः स्वः गणेशाम्बिकाभ्यां नमः, वस्त्रां समर्पयामि।
वस्त्रान्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि।
वस्त्र के बाद आचमन के लिए जल दे।

उपवस्त्र-

ॐ सुजातो ज्योतिषा सह शर्म वरूथमाऽसदत्स्वः।
वासो अग्ने विश्वरूप ँ सं व्ययस्व विभावसो।।
यस्याभावेन शास्त्रोक्तं कर्म किञ्चिन्न सिध्यति।
उपवस्त्रं प्रयच्छामि सर्वकर्मापकारकम्।।
ॐ भूर्भुवः स्वः गणेशाम्बिकाभ्यां नमः, उपवस्त्रं समर्पयामि।
उपवस्त्र न हो तो रक्त सूत्र अर्पित करे।

आचमन - उपवस्त्र के बाद आचमन के लिये जल दें।

यज्ञोपवीत -

ॐ यज्ञोपवीतं परमं पवित्रां प्रजापतेर्यत्सहजं पुरस्तात्।
आयुष्यमग्र्यं प्रतिमुञ्च शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः।।
यज्ञोपवीतमसि यज्ञस्य त्वा यज्ञोपवीततेनोपनह्यामि।
नवभिस्तन्तुभिर्युक्तं त्रिगुणं देवतामयम्।
उपवीतं मया दत्तं गृहाण परमेश्वर !।।
ॐ भूर्भुवः स्वः गणेशाम्बिकाभ्यां नमः, यज्ञोपवीतं समर्पयामि।

आचमन -

यज्ञोपवीत के बाद आचमन के लिये जल दें।

चन्दन -

ॐ त्वां गन्धर्वा अखनँस्त्वामिन्द्रस्त्वां बृहस्पतिः।
त्वामोषधे सोमो राजा विद्वान् यक्ष्मादमुच्यत।।
श्रीखण्डं चन्दनं दिव्यं गंधाढ्यं सुमनोहरम्।
विलेपनं सुरश्रेष्ठ ! चन्दनं प्रतिगृह्यताम्।।
ॐ भूर्भुवः स्वः गणेशाम्बिकाभ्यां नमः, चन्दनानुलेपनं समर्पयामि।

अक्षत -

ॐ अक्षन्नमीमदन्त ह्यव प्रिया अधूषत।
अस्तोषत स्वभानवो विप्रा नविष्ठया मती योजान्विन्द्र ते हरी।।
अक्षताश्च सुरश्रेष्ठ कुङ्कुमाक्ताः सुशोभिताः।
मया निवेदिता भक्त्या गृहाण परमेश्वर।।
ॐ भूर्भुवः स्वः गणेशाम्बिकाभ्यां नमः, अक्षतान् समर्पयामि।

पुष्पमाला -

ॐ ओषधीः प्रति मोदध्वं पुष्पवतीः प्रसूवरीः।
अश्वा इव सजित्वरीर्वीरुधः पारयिष्णवः।।
माल्यादीनि सुगन्धीनि मालत्यादीनि वै प्रभो।
मयाहृतानि पुष्पाणि पूजार्थं प्रतिगृह्यताम्।।
ॐ भूर्भुवः स्वः गणेशाम्बिकाभ्यां नमः, पुष्पमालां समर्पयामि।

दूर्वा -

ॐ काण्डात्काण्डात्प्ररोहन्ती परुषः परुषस्परि।
एवा नो दूर्वे प्रतनुसहश्रेण शतेन च।।
दूर्वाङ्कुरान् सुहरितानमृतान् मङ्गलप्रदान्।
आनीतांस्तव पूजार्थं गृहाण गणनायक !।।
ॐ भूर्भुवः स्वः गणेशाम्बिकाभ्यां नमः, दूर्वाङ्कुरान् समर्पयामि।

सिन्दूर-

ॐ सिन्धोरिव प्राध्वने शूघनासो वातप्रमियः पतयन्ति यह्वाः।
घृतस्य धारा अरुषो न वाजी काष्ठा भिन्दन्नूर्मिभिः पिन्वमानः।।
सिन्दूरं शोभनं रक्तं सौभाग्यं सुखवर्धनम्।
शुभदं कामदं चैव सिन्दूरं प्रतिगृह्यताम्।।
ॐ भूर्भुवः स्वः गणेशाम्बिकाभ्यां नमः, सिन्दूरं समर्पयामि।

अबीर गुलाल आदि नाना परिमल द्रव्य-

ॐ अहिरिव भोगैः पर्येति बाहुं ज्याया हेतिं परिबाधमानः।
हस्तघ्नो विश्वा वयुनानि विद्वान् पुमान् पुमा ँ सं परि पातु विश्वतः।।
अबीरं च गुलालं च हरिद्रादिसमन्वितम्।
नाना परिमलं द्रव्यं गृहाण परमेश्वर!।।
ॐ भूर्भुवः स्वः गणेशाम्बिकाभ्यां नमः, नानापरिमलद्रव्याणि समर्पयामि।

सुगन्धिद्रव्य-

ॐ अहिरिव0 इस पूर्वोक्त मंत्र से चढ़ाये
ॐ अहिरिव भोगैः पर्येति बाहुं ज्याया हेतिं परिबाधमानः।
हस्तघ्नो विश्वा वयुनानि विद्वान् पुमान् पुमा ँ सं परि पातु विश्वतः।।
दिव्यगन्धसमायुक्तं महापरिमलाद्भुतम्।
गन्धद्रव्यमिदं भक्त्या दत्तं वै परिगृह्यताम्।।
ॐ भूर्भुवः स्वः गणेशाम्बिकाभ्यां नमः, सुगन्धिद्रव्यं समर्पयामि।

धूप-

ॐ धूरसि धूर्व्व धूर्व्वन्तं धूर्व्वतं योऽस्मान् धूर्व्वति तं धूर्व्वयं वयं धूर्व्वामः।
देवानामसि वद्दितम ँ सस्नितमं पप्रितमं जुष्टतमं देवहूतमम्।।
वनस्पतिरसोद्भूतो गन्धाढ्यो गन्ध उत्तमः।
आघ्रेयः सर्वदेवानां धूपोऽयं प्रतिगृह्यताम्।।
ॐ भूर्भुवः स्वः गणेशाम्बिकाभ्यां नमः, धूपमाघ्रापयामि।

दीप-
ॐ अग्निर्ज्योतिज्योतिरग्निः स्वाहा सूर्यो ज्योतिर्ज्योतिः सूर्यः स्वाहा।
अग्निर्वर्चो ज्योतिर्वर्चः स्वाहा सूर्यो वर्चो ज्योतिर्वर्च स्वाहा।।
ज्योर्ति सूर्यः सूर्यो ज्योतिः स्वाहा।।
साज्यं च वर्तिसंयुक्तं वद्दिना योजितं मया।
दीपं गृहाण देवेश त्रौलौक्यतिमिरापहम्।।
भक्त्या दीपं प्रयच्छामि देवाय परमात्मने।
त्राहि मां निरयाद् घोराद् दीपज्योतिर्नमोऽस्तु ते।।
ॐ भूर्भुवः स्वः गणेशाम्बिकाभ्यां नमः, दीपं दर्शयामि।

हस्तप्रक्षालन -

‘ॐ हृषीकेशाय नमः’ कहकर हाथ धो ले।

नैवेद्य-

पुष्प चढ़ाकर बायीं हाथ से पूजित घण्टा बजाते हुए।
ॐ नाभ्या आसीदन्तरिक्ष Ủ शीर्ष्णो द्यौः समवर्तत।
पद्भ्यां भूमिर्दिशः श्रोत्राँत्तथा लोकाँ2 अकल्पयन्।।
ॐ प्राणाय स्वाहा। ॐ अपानाय स्वाहा। ॐ समानाय स्वाहा।
ॐ उदानाय स्वाहा। ॐ व्यानाय स्वाहा।
शर्कराखण्डखाद्यानि दधिक्षीरघृतानि च।
आहारं भक्ष्यभोज्यं च नैवेद्यं प्रतिगृह्यताम्।।
ॐ भूर्भुवः स्वः गणेशाम्बिकाभ्यां नमः, नैवेद्यं निवेदयामि।
नैवेद्यान्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि।

ऋतुफल -

ॐ याः फलिनीर्या अफला अपुष्पा याश्च पुष्पिणीः।
बृहस्पतिप्रसूतास्ता नो मुञ्चन्त्व ँ हसः।।
इदं फलं मया देव स्थापितं पुरतस्तव।
तेन मे सफलावाप्तिर्भवेज्जन्मनि जन्मनि।।
ॐ भूर्भुवः स्वः गणेशाम्बिकाभ्यां नमः, ऋतुफलानि समर्पयामि।

जल-

फलान्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि।
जल अर्पित करे।
ॐ मध्ये-मध्ये पानीयं समर्पयामि। उत्तरापोशनं समर्पयामि हस्तप्रक्षालनं समर्पयामि मुखप्रक्षालनं समर्पयामि।

करोद्वर्तन-

ॐ अ ँ शुना ते अ ँ शुः पृच्यतां परुषा परुः।
गन्धस्ते सोममवतु मदाय रसो अच्युतः।।
चन्दनं मलयोद्भुतं कस्तूर्यादिसमन्वितम्।
करोद्वर्तनकं देव गृहाण परमेश्वर।।
ॐ भूर्भुवः स्वः गणेशाम्बिकाभ्यां नमः, करोद्वर्तनकं चन्दनं समर्पयामि।

ताम्बूल -

ॐ यत्पुरुषेण हविषा देवा यज्ञमतन्वत।
वसन्तोऽस्यासीदाज्यं ग्रीष्म इध्मः शरद्धविः।।
पूगीफलं महद्दिव्यं नागवल्लीदलैर्युतम्।
एलादिचूर्णसंयुक्तं ताम्बूलं प्रतिगृह्यताम्।।
ॐ भूर्भुवः स्वः गणेशाम्बिकाभ्यां नमः, मुखवासार्थम् एलालवंगपूगीफलसहितं ताम्बूलं समर्पयामि।
(इलायची, लौंग-सुपारी के साथ ताम्बूल अर्पित करे।)

दक्षिणा-

ॐ हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत्।
स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम।।
हिरण्यगर्भगर्भस्थं हेमबीजं विभावसोः।
अनन्तपुण्यफलदमतः शान्तिं प्रयच्छ मे।।
ॐ भूर्भुवः स्वः गणेशाम्बिकाभ्यां नमः, कृतायाः पूजायाः साद्गुण्यार्थे द्रव्यदक्षिणां समर्पयामि। (द्रव्य दक्षिणा समर्पित करे।)

विशेषार्घ्य-


‘इसी प्रकार से अष्टदलकमल बनाकर कलश का और पुनः नवग्रह की पूजा करें।


कलश प्रार्थना मंत्र:-

भूमि स्पर्श करें-

ॐ भूरसि भूमिरस्यदितिसि विश्वधाया विश्वस्य भुवनस्य धर्त्री । पृथिवीं यच्छ पृथिवींदृ र्ठ ह पृथिवीं माहि र्ठ सीः ॥१॥
ॐ महीद्यौः पृथिवी च न इमं यज्ञं मिमिक्षताम् पिपृतान्नो भरीमभिः।

सप्तधान्य कलश के नीचे डालें- कलश के नीचे धान्य के हाथ लगावें ।

ॐ धान्यमसि धिनुहि देवान् प्राणायत्वो दानायत्वा व्यानात्वा ।
दीर्घामनु प्रसितिमायुषे धान देवो वः सविता हिरण्यपाणिः प्रतिगृहभ्णा त्वच्छिद्रेण पाणिना चक्षुषेत्वा महीनाम्पयोऽसि ॥

कलश के नीचे धान्य के हाथ लगावें ।

ओषधयः समवदन्त सोमेन सहराज्ञा ।
यस्मै कृणोति ब्राह्मणस्त र्ठ राजन् पारयामसि ॥

फिर कलश स्थापना करें या कलश के हाथ लगाये।

ॐ आजिघ्र कलशंमह्या त्वा विशन्त्विन्दवः।
पुनर्जा निवर्त्तस्वसानः सहस्रं धुक्ष्वोरुघारा पयस्वती पुनर्माविशताद्रयिः॥ 

कलश में जल भरें - ॐ वरुणस्योत्तम्भनमसि वरुणस्य स्कम्भ सर्जनीस्थो वरुणस्य ऋत सदन्यसि वरुणस्य ऋत सदनमसि वरुणस्य ऋतसदनमासीद ॥ 

कलश को हाथ लगाकर मंत्र पढ़ें - ॐ आकलेशु धावति पवित्रे परिषिच्यते उक्थैर्यज्ञेषु वर्धते

तीर्थजल- इमंमे यमुने सरस्वति शुतुद्रिस्तोमं सचतापरुष्णया ।
असिकन्या मरुद्वृथे वितस्तयार्जीकीये शृणुह्यासुषो मया॥ 

सर्वोषधि डालें- या: ओषधी : पूर्वाजाता देवभ्यस्त्रियुगं पुरा।
मनैनु बभ्रूणामह र्ठ शतं धामानि सप्त च॥

चंदनं लगाए - ॐ गंधद्वारां दुराधर्षां नित्यपुष्टां करीषिणीम्
ईश्वरी सर्वभूतानां तामिहोपह्वये श्रियम् ॥

पंचपल्लव- ॐ अश्वत्थेवो निषदनं पर्णे वो वसतिष्कृता। गोभाज इत्किलासथ यत्सनवथ पूरुषम् ॥

दूर्वा (दुब)-

ॐ दूर्वेह्यमृत संपन्ने शतमूले शतांकुरे । शत पातक सहन्त्री शतमायुष्य वर्धिनी॥
ॐ काण्डात् काण्डात् प्ररोहन्ती परुषः परुषपरि । एवानो दूर्वे प्रतनु सहस्रेण शतेन च ॥२॥

कुशा अर्पित करें-

ॐ पवित्रस्थो वैष्णव्यौ सवितुर्व: प्रसव उत्पुनाम्यच्छिद्रेण पवित्रेण सूर्यस्य रश्मिभिः। तस्यते पवित्रपते पवित्रपूतस्य यत्कामः पुनेतच्छकेयम्।

सप्तमृतिका प्रदान करें-

ॐ स्योना पृथिवी नो भवानृक्षरा निवेशनी। यच्छा नः शर्म सप्रथाः ॥

पूगीफल (सुपारी)- 

ॐ या फलिनीर्या अफला अपुष्पा याश्च पुष्पिणी। बृहस्पतिः प्रसूतास्तानो मुञ्चत्व र्ठ हसः॥
ॐ उतस्मास्यद्रवतस्तुरण्यत्तः पर्णन्नवेरनुवाति प्रगर्द्धिनः । श्येनस्ये वजतोऽ अंक संपरिदधि क्राव्णः सहोर्जातरित्रतः स्वाहा ॥2॥

पंचरत्न -

ॐ सहिररण्यनानि दाशुषेसुवातिसविता भगः। तं भागं चित्रमीमहे ॥
ॐ परिवाजपतिः कविरग्नि हव्यान्य क्रमीत । हिरण्यप्रेक्षण-दधद्रनानि दाशुषे ॥

हिरण्य (द्रव्य दक्षिणा) 

ॐ हिरण्य गर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत् ।
सदाधार पृथिवीन्द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषाविधेम॥ ॐ हिरण्य रूपः सहिरण्य सहगयान्नयात्सेदु हिरण्यवर्णः। हिरण्य यात्परियोने निषद्या हिरण्यदा ददत्यन्तमस्मै । 

लाल वस्त्र सूत्र (मांगलिक सूत्र) बांधे- 

युवा सुवासाः परिवीतऽआगात्स ऽउश्रेयान् भवति जायमानः।
तं धीरा सः कवय ऽउन्नयन्ति स्वाध्योमनसा देवयन्तः ॥
ॐ सुजातो ज्योतिषा सह शर्म वरूथमादत्स्वः।
वासो अग्ने विश्वरूप र्ठ सव्ययस्वः विभावसो॥

पूर्णपात्र चावल से भरकर पूर्णपात्र कलश पर रखें।

ॐ पूर्णादर्विपरापत सुपूर्णा पुनरापत।
वस्नेव विक्रीणाबहा ऽइषमूर्ज र्ठ शतक्रतो॥

इसके बाद नारियल पर मोली या लाल वस्त्र लपेट कर  पूर्णपात्र पर रखें।

ॐ श्रीश्चते लक्ष्मीश्च पल्यावहोरात्रे पार्श्वे नक्षत्राणि रूपमश्विनौ व्यात्तम्। इष्णन्निषाणा मुम्मइषाण सर्वलोकम्मइषाण॥

कलश पर वरुण का ध्यान कर आवाहन और पूजन करें।

ॐ अस्य तत्वायामीत्यस्य शुनः शेष ऋषि त्रिष्टुप्छन्दः वरुणो देवतावाहने विनियोगः।

ॐ तत्वायामि ब्रह्मणा वन्दमानस्तदाशास्ते यजमानो हविर्भिः ।
अहेडमानो वरुणे हवोद्धयुरुश र्ठ समान आयुः प्रमोषीः॥

अस्मिन् कलशे वरुणं साङ्गं सपरिवारं सायुधं सशक्तिकमावाहयामि। ॐ भूर्भुवः स्वः भो वरुण ! इहागच्छ, इह तिष्ठ, स्थापयामि, पूजयामि, मम पूजां गृहाण । ॐ अपां पतये वरुणाय नमः। (कहकर अक्षत- पुष्प कलशपर छोड़ दे।)

फिर हाथमें अक्षत-पुष्प लेकर चारों वेद एवं अन्य देवी-देवताओंका आवाहन करे- 

कलशस्य मुखे विष्णुः कण्ठे रुद्रः समाश्रितः ।
मूले त्वस्य स्थितो ब्रह्मा मध्ये मातृगणाः स्मृताः॥
कुक्षौ तु सागराः सर्वे सप्तद्वीपा वसुन्धरा ।
ऋग्वेदोऽथ यजुर्वेदः सामवेदो थर्वणः॥
अङ्गैश्च सहिताः सर्वे कलशं तु समाश्रिताः।
अत्र गायत्री सावित्री शान्तिः पुष्टिकरी तथा॥
आयान्तु देवपूजार्थं दुरितक्षयकारकाः।
गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति।
नर्मदे सिन्धुकावेरि जलेऽस्मिन् संनिधिं कुरु॥
सर्वे समुद्राः सरितस्तीर्थानि जलदा नदाः।
आयान्तु मम शान्त्यर्थं दुरितक्षयकारकाः॥

जलाधिपति वरुणदेव तथा वेदों, तीर्थो, नदों, नदियों देवी देवताओं के आवाहनके बाद हाथ में अक्षत पुष्प लेकर निम्नलिखित मन्त्रसे कलशकी प्रतिष्ठा करे- 

ॐ मनोजूतिर्जुषता माज्यस्य बृहस्पतिर्यज्ञमिमं तन्नोत्वरिष्टं यज्ञॅं$ , समिमं दधातु । विश्वे देवास इह मादयन्तामो३ प्रतिष्ठ :॥ ऊँभूर्भुवः स्वः कलश गणेश वरुण सहित आवाहित देवानांभ्यो नमो नमः।


ईशान्यां चतुस्त्रिंशदगुलोञ्चसमचतुरस्रस्य ग्रहपीठस्य समीपे सपत्नीको यजमानः उपविश्य आचमनं प्राणायामञ्च कुर्यात् ।

(संकल्प:) ततो हस्ते जलं गृहीत्वा मया प्रारब्धस्य अमुककर्मणःसाङ्गता सिद्धयर्थम् अस्मिन् नवग्रहपीठे अधिदेवता प्रत्यधिदेवता पञ्चलोकपाल वास्तुक्षेत्रपाल दशदिक्पालदेवता सहितानाम् आदित्यादि नवग्रहाणाम् तत्तन्मण्डले स्थापनप्रतिष्ठा पूजनानि करिष्ये । 

संकल्प

यजमान अक्षत जल लेकर मंत्र से पूजन का संकल्प ले- ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः श्रीमद्भगवतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य ब्रह्मणोऽह्नि द्वितीयपरार्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वंतरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे कलिप्रथमचरणे जंबुद्वीपे भारतवर्षे आर्यावर्तैकदेशे .... नगरे / ग्रामे मासे... शुक्ल / कृष्णपक्षे... तिथौ .... वासरे प्रातः / सायंकाले ... गोत्र..... नाम अहं ममोपात्तदुरितक्षयद्वारा श्रीपरमेश्वरप्रीत्यर्थं ममसम्पूर्ण मनोकामना सिध्यर्थ आदित्यादि नवग्रह देवता प्रसाद सिद्ध्यर्तं आदित्यादि नवग्रह पूजनं/ नवग्रह शांति पूजनं करिष्ये ।

हाथ में अक्षत और पुष्प लेकर नव ग्रह का आवाहन करें।

सूर्य पूजन विधि : Surya Puja Vidhi

लाल अक्षत और लाल पुष्प लेकर निम्नलिखित मंत्र से सूर्य का आवाहन करें :-

ॐ आकृष्णेन रजमा वर्तमानो निवेशयन्नमृतं मर्त्यञ्च । हिरण्ययेन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन् ॥


ॐ भूर्भुवः स्वः कलिङ्गदेशोद्भव कश्यपगोत्र रक्तवर्ण भो सूर्य: इहागच्छ इह तिष्ठ, सूर्यमावाहयामि, स्थापयामि, पूजयामि । ॐ सूर्याय नमः

चंदमा (सोम) पूजन विधि : Chandrama Puja Vidhi

श्वेता (उजला) अक्षत-पुष्प लेकर दाएं हाथ से छोड़ते हुए इस मंत्र से चंद्र (सोम) देवता का आहवान करें :-

ॐ इमं देवा असपत्न$ सुवध्वं महते क्षत्राय महते ज्यैष्ठ्याय महते जानराज्याय इन्द्रस्येन्द्रियाय । इमममुष्य पुत्रममुष्यै पुत्रमस्यै विश एष वोमी राजा सोमोस्माकं ब्राह्मणाना$ राजा ॥

ॐ भूर्भुवः स्वः यमुनातीरोद्भव आत्रेयगोत्र शुक्लवर्ण भो सोम! इहा गच्छ इह तिष्ठ, सोममावाहयामि, स्थापयामि, पूजयामि । ॐ सोमाय नमः चन्द्रमसे नमः

भौम(मङ्गल) पूजन विधि : Mangal Puja Vidhi

रक्त(लाल) पुष्प-अक्षत लेकर मंडल पर छोड़ते हुए इस मंत्र से भौम मंगल देव का आवाहना करें :-

ॐ अग्निर्मूर्द्धा दिवः ककुत्पतिः पृथिव्याऽ अयम् । अपा$रेता$सि जिन्वति।।

ॐ भूर्भुवः स्वः अवन्तिकापुरोद्भव भरद्वाजगोत्र रक्तवर्ण भो भौम! इहागच्छ इह तिष्ठ, भौममावाहयामि, स्थापयामि, पूजयामि । ॐ भौमाय नमः

बुध पूजन विधि | Budh Puja Vidhi

हरा अक्षत-फूल दाएं हाथ में लेकर मंडल पर छोड़ते हुए इस मंत्र से बुध देव का आवाहन करें:-

ॐ उद्बुध्यस्वाग्ने प्रति जागृहि त्वमिष्टापूर्ते स$ सृजेथामयं च । अस्मिन्त्सधस्थे अध्युत्तरस्मिन् विश्वे देवा यजमानश्च सीदत ॥

ॐ भूर्भुवः स्वः मगधदेशोद्भव आत्रेयगोत्र हरितवर्ण भो बुध! इहागच्छ, इहतिष्ठ, बुधमावाहयामि, स्थापयामि, पूजयामि । ॐ बुधाय नमः

गुरु (बृहस्पति) पूजन विधि : Guru Puja Vidhi

पीले(पित) अक्षत-फूल लेकर मंडल पर छोड़ते हुए इस मंत्र से गुरु(बृहस्पति) देव का आवाहन करें:-

ॐ बृहस्पते अति यदर्यो अर्हाद्युमद्विभाति क्रतुमज्जनेषु । यद्दीदयच्छवस$ऋतप्रजात तदस्मासु द्रविणं धेहि चित्रम् । उपयामगृहीतोसि बृहस्पतये त्वैष ते योनिर्बृहस्पतये त्वा ।।

ॐ भूर्भुवः स्वः सिन्धुदेशोद्भव आङ्गिरसगोत्र पीतवर्ण भो बृहस्पते । इहागच्छ इहतिष्ठ, बृहस्पतिमावाहयामि, स्थापयामि, पूजयामि । ॐ गुरुवे नमः

भार्गव (शुक्र) पूजन विधि : Shukra(Bhargav) Puja Vidhi

श्वेता पुष्प-अक्षत लेकर मंडल पर भार्गव(शुक्र) देव का आवाह्न करें:-

ॐ अन्नात्परिस्रुतो रसं ब्रह्मणा व्यपिबत् क्षत्रं पयः सोमं प्रजापतिः। ऋतेन सत्यमिन्द्रियं विपान शुक्रमन्धसइन्द्रस्येन्द्रियमिदं पयो$मृतं मधु ॥

ॐ भूर्भुवः स्वःभोजकटदेशोद्भव भार्गवसगोत्र शुक्लवर्ण भो शुक्र इहागच्छ इह तिष्ठ, शुक्रमावाहयामि, स्थापयामि, पूजयामि । ॐ शुक्राय नमः

शनि पूजन विधि : Shani Puja Vidhi

शनि देव का आह्वान करने के लिए काले रंगे अक्षत-काले फूल मंडल छोड़ते हुए मंत्र उच्चारण करें:-

ॐ शं नो देवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये । शय्योरभिस्रवन्तु नः ॥

ॐ भूर्भुवः स्वः सौराष्ट्रदेशोद्भव काश्यप गोत्र कृष्णवर्ण भो शनैश्चर! इहागच्छ इहतिष्ठ, ॐ शनैश्चरमावाहयामि, स्थापयामि, पूजयामि । शनैश्चराय नमः

राहु पूजन विधि | Rahu Puja Vidhi

नीले रंगे अक्षत-फूल लेकर दाएं हाथ से मंडल पर छोड़ते हुए का आह्वान करें:-

ॐ कयानश्श्चित्रऽआभुवदूती सदावृधः सखा । कयाशचिष्ठ्या वृता ॥

ॐ भूर्भुवः स्वः राठिनपुरोद्भव पैठिनसगोत्र कृष्णवर्ण भो राहो! इहा गच्छ इह तिष्ठ, राहुमावाहयामि, स्थापयामि, पूजयामि । राहवे नमः

केतु पूजन विधि : Ketu Puja Vidhi

धूम्र वर्ण का अक्षत-फूल लेकर दाएं हाथ से मंडल पर छोड़ते हुए धूम्रकेतु का आह्वान करें:-

ॐ केतुं कृण्वन्नकेतवे पेशो मर्या$ अपेशसे । समुषद्भिरजायथाः ॥

ॐ भूर्भुवः स्वः अन्तर्वेदिसमुद्भव जैमिनिगोत्र कृष्णवर्ण भो केतो! इहागच्छ इह तिष्ठ, केतुमावाहयामि, स्थापयामि, पूजयामि । ॐ केतवे नमः।

नवग्रह मंडल प्राण प्रतिष्ठा मंत्र

ॐ मनोजूतिर्जुषता माज्यस्य बृहस्पतिर्यज्ञमिमं तन्नोत्वरिष्टं यज्ञॅं$ , समिमं दधातु । विश्वे देवास इह मादयन्तामो३ प्रतिष्ठ : ॥ ऊँ भूर्भुवः स्वः सुर्यादि नवग्रह मण्डलस्थ देवताभ्यो नमः।

नवग्रह ध्यान:-

आयुश्च वित्तं च तथा सुखं च धर्मार्थलाभौ बहुपुत्रतांच । शत्रुक्षयं राजसु पूजितां च तुष्टा ग्रहाः क्षेमकरा भवन्तु ॥

ब्रह्मामुरारिस्त्रिपुरान्तकारी भानुः शशी भूमि-सुतो बुधश्च गुरुश्च शुक्रः शनिराहुकेतवः सर्वे ग्रहाः शान्तिकरा भवन्तु।

सम्पुर्ण नवग्रह पूजन मंत्र

हाथों में त्रिकुश और जल लेकर मंत्र के साथ अर्घ पाद्य आचमण करें।

एतानि पाद्य- अर्घ्य- आचमनीय- स्नानीय- पुनराचमनीयानि ॐ श्री सूर्यादि नवग्रह मण्डलस्थ देवताभ्यो नमः। (पांच वार)

चन्दन

इदमनुलेपनम् ॐ श्री सूर्यादि नवग्रह मण्डलस्थ देवताभ्यो नमः । (तीन बार)

अक्षत

इदमक्षतम् ॐ श्री सूर्यादि नवग्रह मण्डलस्थ देवताभ्यो नमः । (तीन बार)

पुष्पम्

इदमपुष्पम् ॐ श्री सूर्यादि नवग्रह मण्डलस्थ देवताभ्यो नमः । (तीन बार)

जल से नैवेद्य आदि का उत्सर्ग कर अर्पित करे

एतानि गंध- पुष्प- धुप- दीप- ताम्बूल- यथाभाग नानाविध नैवेद्यादनि ॐ श्री सूर्यादि नवग्रह मण्डलस्थ देवताभ्यो नमः । (तीन बार)

नैवेद्य उपरांत जल से आचमन

इदमाचमनीयम् ॐ श्री सूर्यादि नवग्रह मण्डलस्थ देवताभ्यो नमः । (तीन बार)

पान-सुपाड़ी और द्रव्य दक्षिणा

मुखवासार्थे ताम्बूल पुंगिफलम द्रव्य दक्षिणाम ॐ श्री सूर्यादि नवग्रह मण्डलस्थ देवताभ्यो नमः । (तीन बार)

हाथ मे पुष्प लेकर पुष्पाञ्जलि दें।

सूर्य हरें तम कष्ट करें कम चन्द्र बड़े मुद मंगलकारी ।
बुद्धि पवित्र करे बुध नित्य बढ़ावत ज्ञान गुरु सुखकारी ।।
शुचि जीवन शुक्र सदैव करे शनि शोक हरें रवि दृष्टिनिहारी ।
राहु रहें गति केतु करें मति दिव्य नवग्रह सोहत भारी ।।

रवि राज प्रदान सदैव करें शशि शीतलता नित देत रहें।
क्षिति नंदन नंदज का सुख दें बुद्ध बुद्धि विवेक बढ़ाते रहें॥
गुरु गौरवशाली बनावें सदा भृगु भाग्य सुदिव्य दिलाते रहें।
शनि राहु सुखों से भरे घर को और केतु ध्वजा फहराते रहें॥

आदित्योग्नियुतः शशि स वरूणो भौमः कुबेरान्वितः।
सौम्यः विश्वयुतो गुरूः स माधवो देव्यायुतो भार्गवः॥
सौरिविश्व युतो सदा सुखरो राहू भुजंगेश्वरो।
मांगल्यं सुख-दुःख दान निरता कुर्वन्तु सर्वे ग्रहाः॥


इसके बाद यदि संभव हो तो अधिदेवता तथा प्रत्यधिदेवता, पञ्चलोकपाल, दश दिक्पाल, षोडशमातृका, सप्तघृतमातृका, चौसठ योगनी तथा सर्वतोभद्र मंडल अथवा केवल सर्वतोभद्र मंडल का पूजन करें।


अब सरस्वती पूजन प्रारंभ करें ।


सरस्वती पूजा पद्धति


पीठ पूजन


सबसे पहले पीठदेवताओं का अक्षत पुष्प से पूजन करें।


मण्डूकादि पीठदेवताओं का अक्षत पुष्प छिड़कते हुए पूजन करें-


ॐ मं मंण्डुकाय नमः । ॐ कालाग्निरुद्राय नमः । ॐ मूलप्रकृत्यै नमः ।


ॐ आधारशक्तये नमः । ॐ कूर्माय नमः । ॐ अनन्ताय नमः ।


ॐ वराहाय नमः । ॐ पृथिव्यै नमः। ॐ सुधासमुद्राय नमः।


ॐ रत्नद्वीपाय नमः । ॐ सुवर्णद्वीपाय नमः । ॐ नन्दनोद्यानाय नमः ।


ॐ मणिमण्डपाय नमः । ॐ सुवर्णमण्डपाय नमः। ॐ सुवर्णवेदिकायै नमः ।



ॐ रत्नसिंहासनाय नमः । ॐ धर्माय नमः । ॐ ज्ञानाय नमः ।


ॐ वैराग्याय नमः । ॐ ऐश्वर्याय नमः ।


अब पूर्वादिदिशाओं में नवपीठशक्ती पीठदेवताओं का अक्षत पुष्प छिड़कते हुए पूजन करें-


ॐ अधर्माय नमः । ॐ अज्ञानाय नमः । ॐ अवैराग्याय नमः ।


ॐ अनैश्वर्याय नमः । ॐ अनन्ताय नमः। ॐ पद्माय नमः ।


ॐ अँ अर्कमण्डलाय नमः । ॐ उँ सोममण्डलाय नमः ।


ॐ मঁ वह्निमण्डालाय नमः। ॐ सं सत्त्वाय नमः । ॐ रजसे नमः।


ॐ तं तमसे नमः । ॐ आं आत्मने नमः । ॐ अं अन्तरात्मने नमः।



ॐ पं परमात्मने नमः। ॐ ह्रीं ज्ञानात्मने नमः । ॐ मायातत्त्वाय नमः ।



ॐ कालतत्त्वाय नमः । ॐ विद्यातत्त्वाय नमः । ॐ परतत्त्वाय नमः।


पुनः पूर्वादिक्रम से नवपीठशक्ती का अक्षत पुष्प छिड़कते हुए पूजन करें-


ॐ मेधायै नमः । ॐ प्रज्ञायै नमः । ॐ प्रभायै नमः ।


ॐ विद्यायै नमः । ॐ ज्ञानायै नमः । ॐ धृत्यै नमः ।


ॐ स्मृत्यै नमः । ॐ बुद्ध्यै नमः ।


मध्य में – ॐ विद्येश्वर्यै नमः ।


सरस्वती पूजन विधि


अब सबसे पहले माता सरस्वती का ध्यान करें-


रत्नकान्तिनिभां देवी ज्योत्स्नाजालविकाशिनीम् ।


मुक्ताहारयुतां शुभ्रां शशिखण्डविभूषिताम् ॥१॥


बिभ्रतीं दशहस्तैश्च व्याख्यां वर्णस्य मालिकाम् ॥


अमृतेन तथा पूर्ण घटं च दिव्यपुस्तकम् ॥ २॥


दधतीं वामहस्तेन पीनस्तनभरान्विताम् ॥


मध्ये क्षीणां तथा स्वच्छां नानारत्नविभूषिताम् ॥ ३ ॥


प्राणप्रतिष्ठा


इसके बाद सरस्वती देवी की प्रतिमा को प्राण-प्रतिष्ठित करें।


यजमान हाथ में अक्षत,पुष्प लेकर मूर्ति पर छिड़कते हुए अथवा मूर्ति पर हाथ रखकर निम्न मन्त्र से प्राणप्रतिष्ठा १६ आवृत्ति करें –



ॐ आं ह्रीं क्रौं यं रं लं वं षं षं सं हं सः सोऽहं अस्या सरस्वती प्रतिमायाः प्राणा इह प्राणाः ।



ॐ आं ह्रीं क्रौं यं रं लं वं षं षं सं हं सः सोऽहं अस्या सरस्वती प्रतिमायाः जीव इह स्थितः ।


ॐ आं ह्रीं क्रौं यं रं लं वं षं षं सं हं सः सोऽहं अस्या सरस्वती प्रतिमायाः सर्वेन्द्रियाणि वाङ्मन्स्त्वक्चक्षुः श्रोत्राजिह्वाघ्राणपाणिपादपायूपस्थानि इहैवागत्य सुखं चिरं तिष्ठन्तु स्वाहा ।


पुनः यजमान हाथ में पुष्प को लेकर निम्न मंत्र द्वारा मूर्ति प्रतिष्ठापित करे-


ॐ मनो जूतिर्जुषतामाज्यस्य बृहस्पतिर्यज्ञमिमं तनोत्वरिष्टं यज्ञ ঌसमिमं दधातु ।


विश्वे देवास इह मादयन्तामो३ प्रतिष्ठ ॥


एष वै प्रतिष्ठानाम यज्ञो यत्रौतेन यज्ञेन यजन्ते सर्व मे प्रतिष्ठितम्भवति ।।


इस प्रकार फूल समर्पित करें ।


अब सोने या चांदी का शलाका लेकर अथवा आमपत्ता से नेत्रों में शहद लगाते हुए निम्न मंत्र से माता सरस्वती के नेत्र जागरण करें :


ॐ तत्त चक्षुर्देहवहितम् छुक्र-मुच्चरतः हुं फट् ।।


इसके बाद यदि किसी मंदिर में प्रतिमा का अचल प्रतिष्ठा कर रहे हों तो ध्रुव सूक्त का पाठ करें ।


अब हाथ में अक्षत लेकर बोलें-


“ॐ भूर्भुवः स्वः महासरस्वती, इहागच्छ इह तिष्ठ । इस मंत्र को बोलकर अक्षर छोड़ें।


सरस्वती पूजन सम्पूर्ण विधि


अथ सरस्वती पूजा


आवाहन :


सर्वलोकस्य जननीं सर्वविद्यां प्रदायिनीम् ।


ॐ महासरस्वत्यै नमः, महासरस्वतीमावाहयामि,


इदं आवाहनार्थे पुष्पाणि समर्पयामि ।। (आह्वान के लिए पुष्प अर्पित करें।)


आसन :


तप्तकांचनवर्णाभं मुक्तामणिविराजितम् ।


अमलं कमलं दिव्यमासनं प्रतिगृह्यताम् ॥


ॐ महासरस्वत्यै नमः , इदं आसनं समर्पयामि । (पुष्प अर्पित करें।)


पाद्य :


गंगादितीर्थसम्भूतं गन्धपुष्पादिभिर्युतम् ।


पाद्यं ददाम्यहं देवि गृहाणाशु नमोऽस्तु ते ॥


ॐ महासरस्वत्यै नमः , इदं पादयोः पाद्यं समर्पयामि । (पाद्य अर्पित करें।)


अर्घ्य :


अष्टगन्धसमायुक्तं स्वर्णपात्रप्रपूरितम् ।


अर्घ्यं गृहाणमद्यतं महादेवि नमोऽस्तु ते ॥


ॐ महासरस्वत्यै नमः, इदं हस्तयोरर्घ्य समर्पयामि ।


(चन्दन मिश्रित जल अर्घ्यपात्र से देवी के हाथों में दें।)


आचमन :


सर्वलोकस्य या विद्या ब्रह्मविष्ण्वादिभिः स्तुता ।


ॐ महासरस्वत्यै नमः, इदं आचमनीयं जलं समर्पयामि । (जल चढ़ाएँ।)


स्नान :


मन्दाकिन्याः समानीतैर्हेमाम्भोरुहवासितैः ।


स्नानं कुरुष्व देवेशि सलिलैश्च सुगन्धिभिः ॥


इदं स्नानीय जलं समर्पयामि ।(स्नानीय जल अर्पित करें।)


स्नानान्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि ।


(ॐ महासरस्वत्यै नमः’ बोलकर आचमन हेतु जल दें।)


दुग्ध स्नान :


कामधेनुसमुत्पन्नां सर्वेषां जीवनं परम् ।


पावनं यज्ञहेतुश्च पयः स्नानार्थमर्पितम् ॥


ॐ महासरस्वत्यै नमः, इदं पयः स्नानं समर्पयामि ।


पयः स्नानान्ते शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि । (कच्चे दूध से स्नान कराएँ, पुनः शुद्ध जल से स्नान कराएँ ।)


दधिस्नान :


पयसस्तु समुद्भूतं मधुराम्लं शशिप्रभम् ।


दध्यानीतं मया देवि स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम् ॥


ॐ दधिक्राव्णो अकारिषं जिष्णोरश्वस्य वाजिनः


सुरभि नो मुखा करत्प्र ण आयू ঌ षि तारिषत् ।


ॐ महासरस्वत्यै नमः, इदं दधिस्नानं समर्पयामि ।


दधिस्नानान्ते शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि । (दधि से स्नान कराएँ, फिर शुद्ध जल से स्नान कराएँ ।)


घृतस्नान :


नवनीतसमुत्पन्नं सर्वसंतोषकारकम् ।


घृतं तुभ्यं प्रदास्यामि स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम् ॥


ॐ घृतं घृतपावनः पिबत वसां वसापावनः


पिबतान्तरिक्षस्य हविरसि स्वाहा ।


दिशः प्रदिश आदिशो विदिश उद्दिशो दिग्भ्यः स्वाहा ॥


ॐ महासरस्वत्यै नमः , इदं घृतस्नानं समर्पयामि ।


घृतस्नानान्ते शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि । (घृत स्नान कराकर शुद्ध जल से स्नान कराएँ ।)


मधुस्नान :


तरुपुष्पसमुद्भूतं सुस्वादु मधुरं मधु ।


तेजः पुष्टिकरं दिव्यं स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम् ॥


ॐ मधु वाता ऋतायते मधु क्षरन्ति सिन्धवः ।


माध्वीर्नः सन्त्वोषधीः ॥


मधु नक्तमुतोषसो मधुमत्पार्थिवঌ रजः ।


मधु द्यौरस्तु नः पिता ॥


मधुमान्ना वनस्पतिर्मधुमाँ ঌ अस्तु सूर्यः ।


माध्वीर्गावो भवंतु नः ॥


ॐ महासरस्वत्यै नमः , इदं मधुस्नानं समर्पयामि ।


मधुस्नानन्ते शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि ।


(शहद स्नान कराकर शुद्ध जल से स्नान कराएँ ।)


शर्करास्नान :


इक्षुसारसमुद्भूता शर्करा पुष्टिकारिका ।


मलापहारिका दिव्या स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम् ॥


ॐ अपा ঌ रसमुद्वयस ঌ सूर्ये सन्त ঌ समाहित्म ।


अपा ঌ रसस्य यो रसस्तं वो


गृह्याम्युत्तममुपयामगृहीतोसीन्द्राय त्वा जुष्टं


गुढाम्येष ते योनिरिन्द्राय त्वा जुष्टतमम् ॥


ॐ महासरस्वत्यै नमः, इदं शर्करास्नानं समर्पयामि,


शर्करा स्नानान्ते पुनः शुद्धोदक स्नानं समर्पयामि । (शर्करा स्नान कराकर जल से स्नान कराएँ ।)


पञ्चामृत स्नान : (दूध, दही, घी, शकर एवं शहद मिलाकर पंचामृत बनाएँ व निम्न मंत्र से स्नान कराएँ


पयो दधि घृतं चैव मधुशर्करयान्वितम् ।


पंचामृतं मयानीतं स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम् ॥


ॐ पंच नद्यः सरस्वतीमपि यन्ति सस्त्रोतसः ।


सरवस्ती तु पञ्चधा सो देशेऽभवत् सरित् ॥


ॐ महासरस्वत्यै नमः , इदं पंचामृतस्नानं समर्पयामि,


पंचामृतस्नानान्ते शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि ।


(पंचामृत स्नान व जल से स्नान कराएँ ।)


गन्धोदक स्नान :


मलयाचलसम्भूतं चन्दनागरुसम्भवम् ।


चन्दनं देवदेवेशि स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम् ॥


ॐ महासरस्वत्यै नमः, इदं गन्धोदकस्नानं समर्पयामि । (चंदनयुक्त जल से स्नान कराएँ ।)


अब श्री सूक्त, देवी अथर्वशीर्ष अथवा पुरुष सूक्त आदि से पुष्पार्चन अथवा जल अभिषेक करें।


शुद्धोदक स्नान :


मन्दाकिन्यास्तु यद्वारि सर्वपापहरं शुभम् ।।


तदिदं कल्पितं तुभ्यं स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम् ॥


ॐ महासरस्वत्यै नमः, इदं शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि । (गंगाजल अथवा शुद्ध जल से स्नान कराएँ ।)


आचमन:


पश्चात ‘ॐ महासरस्वत्यै नमः’ से आचमन कराएँ ।


वस्त्र:


दिव्याम्बरं नूतनं हि क्षौमं त्वतिमनोहरम् ।


दीयमानं मया देवि गृहाण जगदम्बिके ॥


ॐ उपैतु मां देवसखः कीर्तिश्च मणिना सह ।


प्रादुर्भूतोऽस्मि राष्ट्रेऽस्मिन् कीर्तिमृद्धिं ददातु मे ॥


ॐ महासरस्वत्यै नमः, इदं वस्त्रं समर्पयामि,


आचमनीयं जलं च समर्पयामि । (वस्त्र अर्पित करें, आचमनीय जल दें।)


उपवस्त्र:


कंचुकीमुपवस्त्रं च नानारत्नैः समन्वितम् ।


गृहाण त्वं मया दत्तं मंगले जगदीर्श्वरि ॥


ॐ महासरस्वत्यै नमः, इदं उपवस्त्रं समर्पयामि,


आचमनीयं जलं च समर्पयामि । (उपवस्त्र चढ़ाएँ, आचमन के लिए जल दें।)


यज्ञोपवीत :


ॐ तस्मादअकूवा अजायंत ये के चोभयादतः ।


गावोह यज्ञिरे तस्मात्तस्माज्जाता अजावयः ॥


ॐ यज्ञोपवीतं परमं वस्त्रं प्रजापतयेः त्सहजं पुरस्तात ॥


आयुष्यम अग्रयं प्रतिमुञ्च शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तुतेजः ।


ॐ महासरस्वत्यै नमः । इदं यज्ञोपवीतं समर्पयामि ।


आभूषण :


रत्नकंकणवैदूर्यमुक्ताहारादिकानि च ।


सुप्रसन्नेन मनसा दत्तानि स्वीकुरुष्व भोः ॥


ॐ महासरस्वत्यै नमः ,


इदं नानाविधानि कुंडलकटकादीनि आभूषणानि समर्पयामि । (आभूषण समर्पित करें।)


गन्ध :


श्रीखण्डं चन्दनं दिव्यं गन्धाढ्यं सुमनोहरम् ।


विलेपनं सुरश्रेष्ठे चन्दनं प्रतिगृह्यताम् ॥


ॐ महासरस्वत्यै नमः, इदं गन्धं समर्पयामि । (केसर मिश्रित चन्दन अर्पित करें।)


रक्त चन्दन :


रक्तचन्दनसम्मिश्रं पारिजातसमुद्भवम् ।


मया दत्तं महादेवि चन्दनं प्रतिगृह्यताम ॥


ॐ महासरस्वत्यै नमः, इदं रक्तचन्दनं समर्पयामि । (रक्त चंदन चढ़ाएँ।)


सिन्दूर :


सिन्दूरं रक्तवर्णं च सिन्दूरतिलकप्रिये ।


भक्तया दत्तं मया देवि सिन्दूरं प्रतिगृह्यताम् ॥


ॐ सिन्धोरिव प्राध्वने शूघनासो वात प्रमियः पतयन्ति यह्वाः ।


घृतस्य धारा अरुषो न वाजी काष्ठा भिन्दन्नूर्मिभिः पिन्वमानः ॥


ॐ महासरस्वत्यै नमः, इदं सिन्दूरं समर्पयामि । (सिन्दूर चढ़ाएँ ।)


कुंकुम :


कुंकुम कामदं दिव्यं कुंकुम कामरूपिणम् ।


अखण्डकामसौभाग्यं कुंकुमं प्रतिगृह्यताम् ॥


ॐ महासरस्वत्यै नमः, इदं कुंकुमं समर्पयामि । (कुंकुम अर्पित करें ।)


पुष्पसार (इत्र) :


तैलानि च सुगन्धीनि द्रव्याणि विविधानि च ।


मया दत्तानि लेपार्थं गृहाण परमेश्वरि ॥


ॐ महासरस्वत्यै नमः, इदं पुष्पसारं च समर्पयामि । (इत्र चढ़ाएँ ।)


अक्षत :


अक्षताश्च सुरश्रेष्ठे कुंकुमाक्ताः सुशोभिताः ।


मया निवेदिता भक्त्या गृहाण परमेश्वरि ॥


ॐ महासरस्वत्यै नमः, इदं अक्षतान् समर्पयामि । (कुंकुमाक्त अक्षत चढ़ाएँ ।)


पुष्पमाला :


माल्यादीनि सुगन्धीनि माल्यादीनि वै प्रभो ।


मयानीतानि पुष्पाणि पूजार्थं प्रतिगृह्यताम् ॥


ॐ महासरस्वत्यै नमः, इदं पुष्पं पुष्पमालां च समर्पयामि ।


(श्वेत या लाल कमल के पुष्प तथा पुष्पमालाओं से अलंकृत करें ।)


दूर्वा :


विष्ण्वादिसर्वदेवानां प्रियां सर्वसुशोभनाम् ।


क्षीरसागरसम्भूते दूर्वां स्वीकुरू सर्वदा ॥


ॐ महासरस्वत्यै नमः, इदं दूर्वांकुरान् समर्पयामि । (दूर्वांकुर अर्पित करें।)


सरस्वती पूजन सम्पूर्ण विधि


अङ्ग पूजनम् :


हाथों में अक्षत,पुष्प,अष्टगंध लेकर माता सरस्वति के समस्त अंग पूजन का पूजन करें-


ॐ ऐं भारत्यै नमः, शिरःपूजयामि ।


ॐ भुवनेश्वर्यै नमः नेत्रे पूजयामि।


ॐ सरस्वत्यै नमः, मुखं पूजयामि ।


ॐ शारदायै नमः, ग्रीवा पूजयामि ।


ॐ हंसवाहिन्यै नमः, स्कन्धौ पूजयामि ।


ॐ जगतिख्यातायै नमः, हस्तौ पूजयामि ।


ॐ वाणीश्वर्यै नमः, हृदयं पूजयामि ।


ॐ कौमार्यै नमः, उदरं पूजयामि ।


ॐ ब्रह्मचारिण्यै नमः, कटि पूजयामि।


ॐ बुद्धिदात्र्यै नमः, जानुद्वय पूजयामि ।


ॐ वरदायिन्यै नमः, गुल्फौ पूजयामि।


ॐ क्षुद्रघण्टायै नमः, पाद्मं पूजयामि ।


ॐ महासरस्वत्यै नमः, सर्वाङ्ग पूजयामि ।


आवरणपूजा


अब षट्कोण में प्रथम आवरणपूजा करें –


अग्निकोण में – ॐ आँ हृदयाय नमः ।


निर्ऋतिकोण में – ॐ आँ शिरसे स्वाहा ।


वायव्यकोण में – ॐ आँ शिखायै वषट् ।


ईशान में – ॐ आँ कवचाय हुम् ।


प्रतिमा और यजमान के मध्य में – ॐ आँ नेत्रत्रायाय वौषट् ।


देवी के पश्चिमे में – ॐ आँ अस्त्राय फट् ।


अब पुष्प लेकर-


ॐ अभीष्ठसिद्धिं मे देहि शरणागतवत्सले ॥


भक्त्या समर्पये तुभ्यं प्रथमावरणार्चनम् ॥


पुष्पाञ्जलि अर्पित करते हुए –


विद्याधिष्ठातृदेवताः साङ्गाः सपरिवाराः सम्पूजितास्तर्पिताः सन्तु । इति प्रथमावरणम्। …


अब अष्टदल में प्रतिमा और यजमान के मध्य पूर्वादिक्रम से द्वितीय आवरण में शक्ति पूजन करें –


ॐ भोगायै नमः, ॐ सत्यायै नमः । ॐ विमलायै नमः ।


ॐ ज्ञानायै नमः । ॐ बुद्धयै नमः । ॐ स्मृत्यै नमः ।


ॐ मेधायै नमः । ॐ प्रज्ञायै नमः ।


अब पुष्प लेकर –


ॐ अभीष्ठसिद्धिं मे देहि शरणागतवत्सले ॥


भक्त्या समर्पये तुभ्यं द्वितीयावरणार्चनम् ॥


पुष्पाञ्जलि अर्पित करते हुए –


विद्याधिष्ठातृदेवताः साङ्गाः सपरिवाराः सम्पूजितास्तर्पिताः सन्तु । इति द्वितीयावरणार्चनम् ।


पुनः अष्टदल में प्रतिमा और यजमान के मध्य पूर्वादिक्रम वामावर्त से तृतीय आवरण में मातृकाओं का पूजन करें–


ॐ ब्राह्मयै नमः। ॐ महेश्वर्यै नमः । ॐ कौमार्यै नमः ।


ॐ वैष्णव्यै नमः । ॐ वाराह्यै नमः। ॐ इन्द्राण्यै नमः।


ॐ चामुण्डायै नमः। ॐ महालक्ष्म्यै नमः ।


अब पुष्प लेकर-


ॐ अभीष्ठसिद्धिं मे देहि शरणागतवत्सले ॥


भक्त्या समर्पये तुभ्यं तृतीयावरणार्चनम् ॥ .


पुष्पाञ्जलि अर्पित करते हुए –


विद्याधिष्ठातृदेवताः साङ्गा: सपरिवाराः सम्पूजितास्तर्पिताः सन्तु । इति तृतीयावरणार्चनम् ।


अब भूपुर में पूर्वादिक्रम से चतुर्थ आवरण में दशदिक्पालों का पूजन करें–


ॐ लं इन्द्राय नमः । ॐ रं अग्नये नमः। ॐ मं यमाय नमः।


ॐ क्षं निर्ऋतये नमः। ॐ वं वरुणाय नमः। ॐ यं वायवे नमः।


ॐ कं कुबेराय नमः। ॐ हं ईशानाय नमः।


‘ईशान पूर्व के मध्य


ॐ आं ब्रह्मणे नमः।


निर्ऋत्य पश्चिम के मध्य


ॐ ह्रीं अनन्ताय नमः।


अब पुष्प लेकर-


ॐ अभीष्टसिद्धिं मे देहि शरणागतवत्सले ॥


भक्त्या समर्पये तुभ्यं चतुर्थावरणार्चनम् ॥


पुष्पाञ्जलि अर्पित करते हुए –


विद्याधिष्ठातृदेवताः साङ्गाः सपरिवाराः. सम्पूजितास्तर्पिताः सन्तु । इति चतुर्थावरणार्चनम् ।


इसके बाद भूपुर में इन्द्रादि के समीप पञ्चम आवरण में वज्रादि आयुधाओं का पूजन करें–


ॐ वं वज्राय नमः । ॐ शं शक्तये नमः । ॐ दं दण्डाय नमः।


ॐ खं खङ्गाय नमः । ॐ पां पाशाय नमः। ॐ अं अङ्कुशाय नमः ।


ॐ गं गदायै नमः। ॐ त्रिं त्रिशूलाय नमः।


ॐ पं पद्माय नमः । ॐ चं चक्राय नमः ।


अब पुष्प लेकर-


ॐ अभीष्टसिद्धिं मे देहि शरणागतवत्सले ॥


भक्त्या समर्पये तुभ्यं पञ्चमावरणार्चनम् ॥


पुष्पाञ्जलि अर्पित करते हुए –


विद्याधिष्ठातृदेवताः साङ्गाः सपरिवाराः सम्पूजितास्तर्पिताः सन्तु । इति पञ्चमावरणार्चनम्।


सरस्वती पूजन सम्पूर्ण विधि


आवरणपूजा के पश्चात्


धूप :


वनस्पतिरसोद्भूतो गन्धाढ्यः सुमनोहरः ।


आप्रेयः सर्वदेवानां धूपोऽयं प्रतिगृह्यताम् ॥


ॐ महासरस्वत्यै नमः , इदं धूपमाघ्रापयामि । (धूप आघ्रापित करें।


दीप:


कार्पास वर्तिसंयुक्त घृतयुक्त मनोहरम् ।


तमो नाशकरं दीपं गृहाण परमेश्वरि ॥


ॐ महासरस्वत्यै नमः, इदं दीपं दर्शयामि । (दीपक दिखाकर हाथ धो लें।)


नैवेद्य : (मालपुए सहित पंचमिष्ठान्न व सूखे मेवे ।।


नैवेद्यं गृह्यतां देवि भक्ष्यभोज्य समन्वितम् ।


षड्रसैन्वितं दिव्यं लक्ष्मी देवि नमोऽस्तु ते ॥


ॐ महासरस्वत्यै नमः, इदं नैवेद्यं निवेदयामि ।।


आचमनी में जल छोड़ते हुए निम्न मंत्र बोलें :


१. ॐ प्राणाय स्वाहा २. ॐ अपानाय स्वाहा . ३ ॐ समानाय स्वाहा


४. ॐ उदानाय स्वाहा ५. ॐ व्यानाय स्वाहा ।


मध्ये पानीयम्, उत्तरापोशनार्थं हस्तप्रक्षालनार्थं मुखप्रक्षालनार्थं च जलं समर्पयामि ।।


नैवेद्य निवेदित कर पुनः हस्तप्रक्षालन के लिए जल अर्पित करें।)


“इदं नानाविधि नैवेद्यानि ऊं सरस्वतयै समर्पयामि” मंत्र से नैवैद्य अर्पित करें।


मिष्टान अर्पित करने के लिए मंत्र: “इदं शर्करा घृत समायुक्तं नैवेद्यं ऊं सरस्वतयै समर्पयामि” बालें।


प्रसाद अर्पित करने के बाद आचमन करायें।


करोद्वर्तन :


ॐ महासरस्वत्यै नमः ‘ यह कहकर करोद्वर्तन के लिए हाथों में चन्दन उपलेपित करें।


आचमन :


शीतलं निर्मलं तोयं कर्पूरण सुवासितम् ।


आचम्यतां जलं ह्येतत् प्रसीद परमेश्वरि ॥


ॐ महासरस्वत्यै नमः, इदं आचमनीयं जलं समर्पयामि । (आचमन के लिए जल दें।)


ऋतुफल : (केला,सेब,सीताफल, गन्ना, सिंघाड़े व अन्य फल नारियल आदि ।)


फलेन फलितं सर्वं त्रैलोक्यं सचराचरम् ।


तस्मात् फलप्रदादेन पूर्णाः सन्तु मनोरथाः ॥


ॐ महासरस्वत्यै नमः, इदं अखण्डऋतुफलं समर्पयामि,


आचमनीयं जलं च समर्पयामि । (ऋतुफल अर्पित करें तथा आचमन के लिए जल दें।)


ताम्बूल :


पूगीफलं महादिव्यं नागवल्लीदलैर्युतम् ।


एलादिचूर्णसंयुक्त ताम्बूलं प्रतिगृह्यताम् ॥


ॐ महासरस्वत्यै नमः, इदं मुखवासार्थे ताम्बूलं समर्पयामि । (लवंग, इलायची एवं ताम्बूल अर्पित करें।)


दक्षिणा :


हिरण्यगर्भगर्भस्थं हेमबीजं विभावसोः ।


अनन्तपुण्यफलदमतः शान्तिं प्रयच्छ मे ॥


ॐ महासरस्वत्यै नमः, इदं दक्षिणां समर्पयामि । (दक्षिणा चढ़ाएँ।)


लेखनी पुस्तक पूजन :


लेखनी (कलम) पर नाड़ा(मौली) बाँधकर सामने की ओर रखें । निम्न मंत्र बोलकर पूजन करें :


लेखनी निर्मिता पूर्वं ब्रह्मणा परमेष्ठिना ।


लोकानां च हितार्थाय तस्मात्तां पूजयाम्यहम् ॥


ॐ लेखनीस्थायै देव्यै नमः गंध, पुष्प, पूजन कर इस प्रकार प्रार्थना करें :


शास्त्राणां व्यवहाराणां विद्यानामाप्नुयाद्यतः ।


अतस्त्वां पूजयिष्यामि मम हस्ते स्थिरा भव ॥


या कुन्देन्दुतुषारहार धवला या शुभ्रवस्त्रावृता ।


या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्यासना ॥


या ब्रह्माच्युतशंकरप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता ।


सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा ॥


ध्यान बोलकर प्रणाम करें।


ॐ वीणापुस्तकधारिण्यै श्री सरस्वत्यै नमः’


आरती : निम्न लिखित मन्त्र पढ़ते हुए आरती करें :


चक्षुर्दै सर्वलोकानां तिमिरस्य निवारणम् ।


आर्तिक्यं कल्पितं भक्तया गृहाण परमेश्वरि ॥


या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता


या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना ।


या ब्रह्माच्युतशंकरप्रभृतिभिर्देवैः सदा पूजिता ।


सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा ॥

सरस्वती पूजन सम्पूर्ण विधि


हवन प्रारंभ


पूजन के पश्चात् भूमि को स्वच्छ करके एक हवन कुण्ड बनाएं। आम की अग्नि प्रज्वलित करें। हवन में सर्वप्रथम गौरी-गणपति, नवग्रह, सर्व आवाहित देवों का तत्पश्चात् सर्वतोभद्र मंडल देवताओं के मन्त्र में क्रम से स्वाहा लगाकर हवन करें, तत्पश्चात् सरस्वती माता के मंत्र ‘ॐ सरस्वतयै नमः स्वहा’ से १०८ बार हवन करें।


अथवा


ॐ गौरी-गणपत्ये नमः स्वाहा ।


ॐ नवग्रहमंडलदेवताभ्यो नमः स्वाहा ।


ॐ सर्व आवाहित देवताभ्यो नमः स्वाहा ।


ॐ सर्वतोभद्रमंडलदेवताभ्यो नमः स्वाहा ।


तत्पश्चात् माता सरस्वती के निम्न मंत्रों से हवन करें-


ॐ सरस्वत्यै नमः स्वाहा । ॐ महाभद्रायै नमः स्वाहा । ॐ महामायायै नमः स्वाहा ।


ॐ वरप्रदायै नमः स्वाहा । ॐ श्रीप्रदायै नमः स्वाहा । ॐ पद्मनिलयायै नमः स्वाहा ।


ॐ पद्माक्ष्यै नमः स्वाहा । ॐ पद्मवक्त्रायै नमः स्वाहा । ॐ शिवानुजायै नमः स्वाहा ।


ॐ पुस्तकभृते नमः स्वाहा । ॐ ज्ञानमुद्रायै नमः स्वाहा । ॐ रमायै नमः स्वाहा ।


ॐ परायै नमः स्वाहा । ॐ कामरूपायै नमः स्वाहा । ॐ महाविद्यायै नमः स्वाहा ।


ॐ महापातक नाशिन्यै नमः स्वाहा । ॐ महाश्रयायै नमः स्वाहा । ॐ मालिन्यै नमः स्वाहा ।


ॐ महाभोगायै नमः स्वाहा । ॐ महाभुजायै नमः स्वाहा । ॐ महाभागायै नमः स्वाहा ।


ॐ महोत्साहायै नमः स्वाहा । ॐ दिव्याङ्गायै नमः स्वाहा । ॐ सुरवन्दितायै नमः स्वाहा ।


ॐ महाकाल्यै नमः स्वाहा । ॐ महापाशायै नमः स्वाहा । ॐ महाकारायै नमः स्वाहा ।


ॐ महाङ्कुशायै नमः स्वाहा । ॐ पीतायै नमः स्वाहा । ॐ विमलायै नमः स्वाहा ।


ॐ विश्वायै नमः स्वाहा । ॐ विद्युन्मालायै नमः स्वाहा । ॐ वैष्णव्यै नमः स्वाहा ।


ॐ चन्द्रिकायै नमः स्वाहा । ॐ चन्द्रवदनायै नमः स्वाहा । ॐ चन्द्रलेखाविभूषितायै नमः स्वाहा ।


ॐ सावित्र्यै नमः स्वाहा । ॐ सुरसायै नमः स्वाहा । ॐ देव्यै नमः स्वाहा ।


ॐ दिव्यालङ्कारभूषितायै नमः स्वाहा । ॐ वाग्देव्यै नमः स्वाहा । ॐ वसुधायै नमः स्वाहा ।


ॐ तीव्रायै नमः स्वाहा । ॐ महाभद्रायै नमः स्वाहा । ॐ महाबलायै नमः स्वाहा ।


ॐ भोगदायै नमः स्वाहा । ॐ भारत्यै नमः स्वाहा । ॐ भामायै नमः स्वाहा ।


ॐ गोविन्दायै नमः स्वाहा । ॐ गोमत्यै नमः स्वाहा । ॐ शिवायै नमः स्वाहा ।


ॐ जटिलायै नमः स्वाहा । ॐ विन्ध्यावासायै नमः स्वाहा । ॐ विन्ध्याचलविराजितायै नमः स्वाहा ।


ॐ चण्डिकायै नमः स्वाहा । ॐ वैष्णव्यै नमः स्वाहा । ॐ ब्राह्मयै नमः स्वाहा ।


ॐ ब्रह्मज्ञानैकसाधनायै नमः स्वाहा । ॐ सौदामिन्यै नमः स्वाहा । ॐ सुधामूर्त्यै नमः स्वाहा ।


ॐ सुभद्रायै नमः स्वाहा । ॐ सुरपूजितायै नमः स्वाहा । ॐ सुवासिन्यै नमः स्वाहा ।


ॐ सुनासायै नमः स्वाहा । ॐ विनिद्रायै नमः स्वाहा । ॐ पद्मलोचनायै नमः स्वाहा ।


ॐ विद्यारूपायै नमः स्वाहा । ॐ विशालाक्ष्यै नमः स्वाहा । ॐ ब्रह्मजायायै नमः स्वाहा ।


ॐ महाफलायै नमः स्वाहा । ॐ त्रयीमूर्त्यै नमः स्वाहा । ॐ त्रिकालज्ञायै नमः स्वाहा ।


ॐ त्रिगुणायै नमः स्वाहा । ॐ शास्त्ररूपिण्यै नमः स्वाहा । ॐ शुम्भासुरप्रमथिन्यै नमः स्वाहा ।


ॐ शुभदायै नमः स्वाहा । ॐ स्वरात्मिकायै नमः स्वाहा । ॐ रक्तबीजनिहन्त्र्यै नमः स्वाहा ।


ॐ चामुण्डायै नमः स्वाहा । ॐ अम्बिकायै नमः स्वाहा । ॐ मुण्डकायप्रहरणायै नमः स्वाहा ।


ॐ धूम्रलोचनमर्दनायै नमः स्वाहा । ॐ सर्वदेवस्तुतायै नमः स्वाहा । ॐ सौम्यायै नमः स्वाहा ।


ॐ सुरासुर नमस्कृतायै नमः स्वाहा । ॐ कालरात्र्यै नमः स्वाहा । ॐ कलाधारायै नमः स्वाहा ।


ॐ रूपसौभाग्यदायिन्यै नमः स्वाहा । ॐ वाग्देव्यै नमः स्वाहा । ॐ वरारोहायै नमः स्वाहा ।


ॐ वाराह्यै नमः स्वाहा । ॐ वारिजासनायै नमः स्वाहा । ॐ चित्राम्बरायै नमः स्वाहा ।


ॐ चित्रगन्धायै नमः स्वाहा । ॐ चित्रमाल्यविभूषितायै नमः स्वाहा । ॐ कान्तायै नमः स्वाहा ।


ॐ कामप्रदायै नमः स्वाहा । ॐ वन्द्यायै नमः स्वाहा । ॐ विद्याधरसुपूजितायै नमः स्वाहा ।


ॐ श्वेताननायै नमः स्वाहा । ॐ नीलभुजायै नमः स्वाहा । ॐ चतुर्वर्गफलप्रदायै नमः स्वाहा ।


ॐ चतुरानन साम्राज्यायै नमः स्वाहा । ॐ रक्तमध्यायै नमः स्वाहा । ॐ निरञ्जनायै नमः स्वाहा ।


ॐ हंसासनायै नमः स्वाहा । ॐ नीलजङ्घायै नमः स्वाहा । ॐ ब्रह्मविष्णुशिवान्मिकायै नमः स्वाहा ।


हवन के पश्चात् बलिदान करें और उसके उपरांत पूर्णाहुति का संकल्प कर शेष बचे हवनीय सामग्री,नारियल गिरी व घृत लेकर पूर्णाहुति करें हवन का भभूत माथे पर लगाएं।


सरस्वती पूजन सम्पूर्ण विधि


आरती


हवन के पश्चात् सरस्वती माता की मुख्य आरती संपन्न करें-


माँ सरस्वती की आरती


आरती जय सरस्वती माता की


ॐ जय सरस्वती माता, जय जय सरस्वती माता ।


सद्‍गुण वैभव शालिनी, त्रिभुवन विख्याता ॥


चंद्रवदनि पद्मासिनी, ध्रुति मंगलकारी ।


सोहें शुभ हंस सवारी, अतुल तेजधारी ॥ जय…..


बाएं कर में वीणा, दाएं कर में माला ।


शीश मुकुट मणी सोहें, गल मोतियन माला ॥ जय…..


देवी शरण जो आएं, उनका उद्धार किया ।


पैठी मंथरा दासी, रावण संहार किया ॥ जय…..


विद्या ज्ञान प्रदायिनी, ज्ञान प्रकाश भरो ।


मोह, अज्ञान, तिमिर का जग से नाश करो ॥ जय…..


धूप, दीप, फल, मेवा मां स्वीकार करो ।


ज्ञानचक्षु दे माता, जग निस्तार करो ॥ जय…..


मां सरस्वती की आरती जो कोई जन गावें ।


हितकारी, सुखकारी, ज्ञान भक्ती पावें ॥ जय…..


जय सरस्वती माता, जय जय सरस्वती माता ।


सद्‍गुण वैभव शालिनी, त्रिभुवन विख्याता ॥ जय…..


ॐ जय सरस्वती माता, जय जय सरस्वती माता ।


सद्‍गुण वैभव शालिनी, त्रिभुवन विख्याता ॥ जय…..


ॐ महासरस्वत्यै नमः , नीराजनं समर्पयामि । (जल छोड़ें व हाथ धोएँ।)


प्रदक्षिणा :


यानि कानि च पापानि जन्मान्तरकृतानि च ।


तानि तानि विनश्यन्ति प्रदक्षिणपदे पदे ॥(प्रदक्षिणा करें।)


मंत्र -पुष्पांजलि : ( अपने हाथों में पुष्प लेकर निम्न मंत्रों को बोलें) : –


ॐ यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन् ।


तेह नाकं महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः ॥


ॐ राजाधिराजाय प्रसह्य साहिने नमो वयं वैश्रवणाय कुर्महे ।


स मे कामान् कामकामाय मह्यं कामेश्वरो वैश्रवणो ददातु ॥


कुबेराय वैश्रवणाय महाराजाय नमः ।


ॐ स्वस्ति साम्राज्यं भौज्यं स्वाराज्यं वैराज्यं पारमेष्ठ्यं राज्यं


महाराज्यमपित्यमयं समन्तपर्यायी स्यात् सार्वभौमः सार्वायुषान्तादापरार्धात् ।


पृथिव्यै समुद्रपर्यन्ताया एकराडिति


तदप्येष श्लोकोऽभिगीतो मरुतः परिवेष्टारो मरुत्तस्यावसन् गृहे ।


आविक्षितस्य कामप्रेर्विश्वेदेवाः सभासद इति ।


ॐ विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतोमुखो विश्वतोबाहुरुत विश्वतस्पात् ।


सं बाहुभ्यां धमति सं पतवैद्यावाभूमी जनयन् देव एकः ॥


या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता


या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना ।


ब्रह्माच्युतशंकरप्रभृतिभिर्देवैः सदा पूजिता


सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा ॥


ॐ महासरस्वत्यै नमः , मंत्रपुष्पांजलिं समर्पयामि॥(पुष्पांजलि अर्पित करें।)


क्षमा प्रार्थना


साष्टांग प्रणाम करें, अब हाथ जोड़कर निम्न क्षमा प्रार्थना बोलें : –


आवाहनं न जानामि न जानामि तवार्चनम् ॥ अथवा विसर्जनम् कहें


पूजां चैव न जानामि क्षमस्व परमेश्वरि ॥


मन्त्रहीन क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वरि ।


यत्पूजितं मया देवि परिपूर्ण तदस्तु मे ॥


त्वमेव माता च पिता त्वमेव


त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव ।


त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव त्वमेव सर्वम् मम देवदेव ।


पापोऽहं पापकर्माहं पापात्मा पापसम्भवः ।


त्राहि माम् परमेशानि सर्वपापहरा भव ॥


अपराधसहस्राणि क्रियन्तेऽहर्निशं मया ।


दासोऽयमिति मां मत्वा क्षमस्व परमेश्वरि ॥


पूजन समर्पण : हाथ में जल लेकर निम्न मंत्र बोलें : –


यस्य स्मृत्या च नाम्नोक्त्या तपः पूजा क्रियादिशु ।


न्यूनं सम्पूर्णतां याति सद्यो वन्दे तं अच्युतम् ।


कायेन वाचा मनसेन्द्रियैर्वा बुद्ध्यात्मना वा प्रकृतेः स्वभावात्।


करोमि यद्यत् सकलं परस्मै नारायणायेति समर्पयामि ।


‘ॐ अनेन यथाशक्ति अर्चनेन श्री महासरस्वती प्रसीदतुः ॥’ (जल छोड़ दें, प्रणाम करें)


विसर्जन : अब हाथ में अक्षत लें प्रतिष्ठित देवताओं को अक्षत छोड़ते हुए निम्न मंत्र से विसर्जन कर्म करें :


यान्तु देवगणाः सर्वे पूजामादाय मामकीम् ।


इष्टकामसमृद्धयर्थं पुनर्भपि पुनरागमनाय च ॥


प्रसाद ग्रहणं सर्व मंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके ।


शरण्ये य॑म्बिके गौरी नारायणी नमोस्तुते ।


ॐ सरस्वत्यै नमः । सरस्वती देवी प्रसादं शिरसा गृणामि ।


तीर्थ ग्रहणं अकाल मृत्यु हरणं सर्व व्याधी विनाशनम् ।


सर्व दद्रितोप शमनं देवी पादोदकं शुभं ।


ॐ सरस्वत्यै नमः। सरस्वती देवी तीर्थं शिरसा गृह्णामि ।


विद्यारम्भ : नए छात्रो के लिए ये निम्न लिखित श्लोक उच्चारण करके विद्यारम्भ करे


सरस्वति नमस्तुभ्यं वरदे कामरूपिणि ।


विद्यारम्भं करिष्यामि सिद्धिर्भवतु मे सदा ॥


नमो भगवति ! हे सरस्वति ! वन्दे तव पदयुगलम् ॥


विद्या बुद्धिं वितनु भारति चित्तं कारय मम विमलम् ॥


वीणावादिनि शुभमतिदायिनि पुस्तकहस्ते देवनुते ।


वर्णज्ञानं सकलनिदानं सन्निहितं कुरु मम चित्ते ॥ नमो ॥


हंसवाहिनि ब्रह्मवादिनि करुणापूर्णा भव वरदे ।


नि नाटयविलासिनि लास्यं कुरु मम रसनाग्रे ॥ नमो ॥


॥ इति सरस्वती पूजनं विधि: सम्पूर्ण॥




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