Mantra pushpanjali

 कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारम्।

सदा वसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानी सहितं नमामि।।


इस मंत्र का अर्थ



कर्पूरगौरं- जो कर्पूर के समान गौर वर्ण वाले।


करुणावतारं- करुणा के जो साक्षात् अवतार हैं।


संसारसारं- जो समस्त सृष्टि के जो सार हैं।


भुजगेंद्रहारम्- इस शब्द का अर्थ है जो सांप को हार के रूप में धारण करते हैं।


सदा वसतं हृदयाविन्दे भवंभवानी सहितं नमामि- इसका अर्थ है कि जो शिव, पार्वती के साथ सदैव मेरे हृदय में निवास करते हैं, उनको मेरा नमन है।


मंत्र का पूरा अर्थ- जो कर्पूर जैसे गौर वर्ण वाले हैं, करुणा के अवतार हैं, संसार के सार हैं और भुजंगों का हार धारण करते हैं, वे भगवान शिव माता भवानी सहित मेरे हृदय में सदैव निवास करें और उन्हें मेरा नमन है।

धार्मिक अनुष्ठानों अर्थात हवन, पूजन, आरती, ग्रहप्रवेश, विवाह कर्म या अन्य पूजन से संबंधित कार्यों में देव शक्तियों को मंत्र पुष्पांजलि अर्पित की जाती है, मंत्र पुष्पांजलि के बाद ही धार्मिक पूजा के अनुष्ठान पूर्ण होने की मान्यता है।



प्रथम:

यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तनि धर्माणि प्रथमान्यासन्

ते नाकं महिमान: सचंत यत्र पूर्वे साध्या: संति देवा:


द्वितीय:

राजाधिराजाय प्रसह्य साहिने।

नमो वयं वैश्रवणाय कुर्महे।

मस कामान् काम कामाय मह्यं।

कामेश्र्वरो वैश्रवणो ददातु कुबेराय वैश्रवणाय।

महाराजाय नम:


तृतीय:

स्वस्ति, साम्राज्यं भौज्यं स्वाराज्यं

वैराज्यं पारमेष्ट्यं राज्यं महाराज्यमाधिपत्यमयं

समन्तपर्यायीस्यात् सार्वभौमः सार्वायुषः आन्तादापरार्धात्  

पृथीव्यै समुद्रपर्यंताया एकरा‌ळ इति


चतुर्थ:

तदप्येषः श्लोकोभिगीतो।

मरुतः परिवेष्टारो मरुतस्यावसन् गृहे।

आविक्षितस्य कामप्रेर्विश्वेदेवाः सभासद इति

मंत्रपुष्पांजली समर्पयामि


1 एकदन्ताय विद्धमहे, वक्रतुण्डाय धीमहि

तन्नो दन्ति प्रचोदयात्॥


2. श्री महालक्ष्म्यै विद्महे विष्णु पत्न्यै धीमहि तन्नो लक्ष्मी प्रचोदयात् ॐ॥


3. ओम् आंजनेयाय विद्मिहे वायुपुत्राय धीमहि |

तन्नो: हनुमान: प्रचोदयात |


4. ओम् रामदूताय विद्मिहे कपिराजाय धीमहि |

तन्नो: मारुति: प्रचोदयात ||


5. ओम् अन्जनिसुताय विद्मिहे महाबलाय धीमहि |

तन्नो: मारुति: प्रचोदयात ||


6. नव कुलाय विध्महे विषदन्ताय धी माहि

तन्नो सर्प प्रचोदयात ll


7. ओम् देवकी नन्दनाय विद्मिहे वासुदेवाय धीमहि |

कृष्णं तन्नो: प्रचोदयात ||


8. ओम्  दामोदराय  विद्मिहे रुक्मणि वल्लभाय धीमहि |

तन्नो: कृष्णं प्रचोदयात ||


9. ओम् क्लीं कृष्णाय नमः |

वृषभानुज्यै विधमहे कृष्णप्रियायै धीमहि

तन्नो राधा प्रचोदयात


10. दशरथाय विद्महे सीता वल्लभाय धीमहि तन्नो रामः प्रचोदयात्।


11. तत्पुरूषाय विद्महे महादेवाय धीमहि तन्नो रूद्रः प्रचोदयात्।


12. ऊँ आदित्याय विदमहे दिवाकराय धीमहि तन्नो सूर्य: प्रचोदयात


13. ओम भास्कराय विधमहे दिवा कराय धीमहि तन्नो सूर्य प्रचोदयात


सुजातो ज्योतिषा सह शर्मवरूथमासदत्स्वः |

वासोग्ने विश्वरूपर्ठ संव्ययस्व विभावसो ||



पहला मंत्र-
यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तनि धर्माणि प्रथमान्यासन्।
ते नाकं महिमान: सचंत यत्र पूर्वे साध्या: संति देवा:।।
भावार्थ- देवों ने यज्ञ के द्वारा यज्ञरूप प्रजापति का पूजन किया। यज्ञ और तत्सम उपासना के वे प्रारंभिक धर्मविधि थे। जहां पहले देवता निवास करते थे (स्वर्गलोक में) वह स्थान यज्ञाचरण द्वारा प्राप्त करके साधक महानता (गौरव) प्राप्त करते हैं।

दूसरा मंत्र-
राजाधिराजाय प्रसह्य साहिने। नमो वयं वैश्रवणाय कुर्महे।
मस कामान् काम कामाय मह्यं। कामेश्र्वरो वैश्रवणो ददातु कुबेराय वैश्रवणाय। महाराजाय नम:
भावार्थ- हमारे लिए सब कुछ अनुकूल करने वाले राजाधिराज वैश्रवण कुबेर को हम वंदन करते हैं। वो कामनेश्वर कुबेर मुझ कामनार्थी की सारी कामनाओं को पूरा करें।

तीसरा मंत्र-
स्वस्ति, साम्राज्यं भौज्यं स्वाराज्यं वैराज्यं पारमेष्ट्यं राज्यं महाराज्यमाधिपत्यमयं।
समन्तपर्यायीस्यात् सार्वभौमः सार्वायुषः आन्तादापरार्धात्। पृथीव्यै समुद्रपर्यंताया एकरा‌ळ इति।।
भावार्थ- हमारा राज्य सर्व कल्याणकारी राज्य हो। हमारा राज्य सर्व उपभोग्य वस्तुओं से परिपूर्ण हो। यहां लोकराज्य हो। हमारा राज्य आसक्तिरहित, लोभरहित हो। ऐसे परमश्रेष्ठ महाराज्य पर हमारी अधिसत्ता हो। हमारा राज्य क्षितिज की सीमा तक सुरक्षित रहें। समुद्र तक फैली पृथ्वी पर हमारा दीर्घायु अखंड राज्य हो। हमारा राज्य सृष्टि के अंत तक सुरक्षित रहें।

चौथा मंत्र-
तदप्येषः श्लोकोभिगीतो। मरुतः परिवेष्टारो मरुतस्यावसन् गृहे।
आविक्षितस्य कामप्रेर्विश्वेदेवाः सभासद इति।।
भावार्थ- राज्य के लिए और राज्य की कीर्ति गाने के लिए यह श्लोक गाया गया है। अविक्षित के पुत्र मरुती, जो राज्यसभा के सर्व सभासद है ऐसे मरुतगणों द्वारा परिवेष्टित किया गया यह राज्य हमें प्राप्त हो यहीं कामना।


धर्म की जय हो।
अधर्म का विनाश हो।
प्राणियों में सद्भावना हो।
विश्व का कल्याण हो।

सत्य सनातन धर्म की जय हो।
गौमाता की जय हो।
गौ हत्या बंद हो।
अपने-अपने माता पिता की जय।
अपने-अपने गुरुजनों की जय हो।

भारत माता की जय हो।
हिन्दू राष्ट्र की जय हो।
अखंड भारत की जय हो।
धरती माता की जय हो।
सभी संतों की जय हो।
सब देवतन की जय हो।
सब भक्तजनों की जय हो।
आज के आनंद की जय हो।




प्रथम पुष्पांजली मंत्र

जयन्ती, मङ्गला, काली, भद्रकाली, कपालिनी

दुर्गा, शिवा, क्षमा, धात्री, स्वाहा, स्वधा नमोऽस्तु ते॥ 

एष सचन्दन गन्ध पुष्प बिल्व पत्राञ्जली ह्रीं दुर्गायै नमः॥


द्वितीय पुष्पांजली मंत्र

महिषघ्नी महामाये चामुण्डे मुण्डमालिनी  

आयुरारोग्यविजयं देहि देवि! नमोऽस्तु ते

एष सचन्दन गन्ध पुष्प बिल्व पत्राञ्जली ह्रीं दुर्गायै नमः


तृतीया पुष्पांजली मंत्र

सर्व मङ्गल माङ्गल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके

शरण्ये त्र्यम्बके गौरी नारायणि नमोऽस्तु ते ॥१॥


सृष्टि स्थिति विनाशानां शक्तिभूते सनातनि  

गुणाश्रये गुणमये नारायणि! नमोऽस्तु ते ॥२॥


शरणागत दीनार्त परित्राण परायणे

सर्वस्यार्तिहरे देवि! नारायणि! नमोऽस्तु ते ॥३॥


कर्पूर गौरमं कारुणावतारं, संसार सारम भुजगेंद्र हारम |

सदा वसंतां हृदयारविंदे, भवम भवानी साहितम् नमामि ||

मंगलम भगवान शंभू , मंगलम रिषीबध्वजा

मंगलम पार्वती नाथो, मंगलाय तनो हर ।।

सर्व मंगल मङ्गल्ये, शिवे सर्वार्थ साधिके

शरण्ये त्रंबके गौरी, नारायणी नमोस्तुते ।।


शिव मंत्र पुष्पांजलि 


।। अथ मंत्र पुष्पांजली ।।

यज्ञेन यज्ञमयजंत देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन्, ते हं नाकं महिमान: सचंत यत्र पूर्वे साध्या: संति देवा:

राजाधिराजाय प्रसह्ये साहिने |नमो वयं वैश्रवणाय कुर्महे, मे कामान्कामकामाय मह्यम्|

कामेश्वरो वैश्रवणो ददातु, कुबेराय वैश्रवणाय | महाराजाय नम:

स्वस्ति साम्राज्यं भौज्यं स्वाराज्यं वैराज्यं, पारमेष्ठ्यं राज्यं माहाराज्यमाधिपत्यमयं समंतपर्यायी

सार्वायुष आंतादापरार्धात्पृथिव्यै समुद्रपर्यंता या एकराळिति, तदप्येष श्लोकोऽभिगीतो मरुत: परिवेष्टारो मरुत्तस्यावसन्गृहे

आविक्षितस्य कामप्रेर्विश्वेदेवा: सभासद इति।

विश्व दकचक्षुरुत विश्वतो मुखो विश्वतोबाहुरुत, विश्वतस्पात संबाहू ध्यानधव धिसम्भत त्रैत्याव भूमी जनयंदेव एकः।

तत्पुरुषाय विदमहे, महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्र: प्रचोदयात्।

नाना सुगंध पुष्पांनी यथापादो भवानीच, पुष्पांजलीर्मयादत्तो रुहाण परमेश्वर

भूर्भुव: स्व: भगवते श्री सांबसदाशिवाय नमः।

।। मंत्र पुष्पांजली समर्पयामि।।


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