बिम्ब विधान bimb Kay hai ||हिंदी साहित्य || काव्यशास्त्र || hindi shaitya me bimb

 दोस्तों आज की पोस्ट में हिंदी साहित्य में काव्यशास्त्र के महत्वपूर्ण विषय बिम्ब विधान (bimb) के बारे में  अच्छी तरह से समझाया गया है ,हमें आशा है कि आप इसे अच्छे से समझेंगे |

बिम्ब क्या होते है ?

बिम्ब विधान(bimb vidhan)

⇒ काव्य में कार्य के मूर्तीकरण के लिए सटीक बिम्ब योजना होती है।

⇔ ’बिम्ब’ शब्द अंग्रेजी के ’इमेज’ शब्द का हिन्दी रूपान्तर है। जिसका अर्थ है -मूर्त रूप प्रदान करना।

⇒ काव्य में बिम्ब को वह शब्द चित्र माना जाता है जो कल्पना द्वारा ऐन्द्रिय अनुभवों के आधार पर निर्मित होता है।

⇔ बिम्ब पदार्थ नहीं है, वरन् उसकी प्रतिकृति या प्रतिच्छवि है। सृष्टि नहीं पुनस्सृष्टि है।

⇒ सी.डी. लेविस – ’काव्य बिम्ब एक ऐसा भावात्मक चित्र है जो रूपक आदि का आधार ग्रहण कर भावनाओं को तीव्र करता हुआ काव्यानुभूति को सादृश्य तक पहुँचाने में समर्थ है।’

⇒ डाॅ. नगेन्द्र – ’काव्य बिम्ब शब्दार्थ के माध्यम से कल्पना द्वारा निर्मित एक ऐसी मानस छवि है जिसके मूल में भाव की प्रेरणा रहती है।’

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बिम्ब के तीन मूलभूत तत्व  हैं –

  • कल्पना
  • भाव
  • ऐन्द्रिकता

⇒ बिम्ब में भावनाओं को उत्तेजित करने की शक्ति एवं सामर्थ्य होता है, नवीनता एवं ताजगी होती है।

बिम्ब विधान में औचित्य अर्थात् प्रसंग के प्रति अनुकूलता एवं सार्थकता होनी चाहिए तथा बिम्ब स्पष्ट या सजीव होना चाहिए

ताकि प्रमाता(पाठक) तुरन्त ऐन्द्रिक साक्षात्कार कर सके।

 डाॅ. केदारनाथ सिंह – ’बिम्ब यथार्थ का एक सार्थक टुकङा होता है। वह अपनी ध्वनियों और संकेतों से भाषा को अधिक संवेदनशील

और पारदर्शी बनाता है। वह अभिधा की अपेक्षा लक्षणा और व्यंजना पर आधारित होता है।’

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बिम्बों के भेद (bimb ke bhed)

1. ऐन्द्रिय बिम्ब 

  • चाक्षुष बिम्ब
  • श्रव्य या नादात्मक बिम्ब
  • स्पर्श्य बिम्ब
  • घ्रातव्य बिम्ब
  • आस्वाद्य बिम्ब

2. काल्पनिक बिम्ब –

  • स्मृति बिम्ब
  • कल्पित बिम्ब

3. प्रेरक अनुभूति के आधार पर –

  • सरल बिम्ब
  • मिश्रित बिम्ब
  • तात्कालिक बिम्ब
  • संकुल बिम्ब
  • भावातीत बिम्ब
  • विकीर्ण बिम्ब

⇒ डाॅ. देवीशरण रस्तोगी – ’बिम्ब प्रायः अलंकारों की सहायता लेते और इसी प्रकार अलंकार अन्ततः बिम्ब को ही लक्ष्य करते हैं।’


Bimb vidhan

बिम्ब विधान के उदाहरण (bimb ke udaharan)

⇒ प्रातः का नभ था, नीला शंख जैसे (चाक्षुष बिम्ब)

⇒ खरगोश की आँखों जैसा लाल सवेरा
शरद आया पुलों को पार करते हुए
अपनी नयी चमकीली साइकिल तेज चलाते हुए
घंटी बजाते हुए जोर-जोर से (श्रव्य बिम्ब)

⇒ जैसे बहन ’दा’ कहती है
ऐसे किसी बँगले के
किसी तरु (अशोक) पर कोई चिङिया कुऊकी
चलता सङक के किनारे लाल बजरी पर
चुरमुराए पाँव तले
ऊँचे तरुवर से गिरे
बङे-बङे पियराए पत्ते

प्रतीक एवं बिम्ब में क्या अंतर है ?

⇒ प्रतीक किसी सूक्ष्म भाव या अगोचर तत्त्व को साकार करने के लिए प्रयुक्त होता है, जबकि बिम्ब किसी पदार्थ की प्रतिकृति या प्रतिच्छवि के लिए प्रयुक्त होता है।

⇔ प्रतीक से तुरन्त मन में कोई भावना जाग्रत होती है किन्तु बिम्ब से मस्तिष्क में किसी सादृश्य का चित्र उभरता है।


व्यक्तित्व उपमान जब रूढ़ हो जाते हैं तो वे प्रतीक बन जाते हैं जबकि बिम्ब में नवीनता व ताजगी होती है।

⇔ प्रतीक कल्पना द्वारा किसी भावना को जाग्रत करते हैं, जबकि सटीक बिम्ब विधान से प्रमाता को तुरन्त ऐन्द्रिक साक्षात्कार होता है।

⇒ प्रतीक में किसी भावना को साकार होने की कल्पना की जाती है जबकि बिम्ब में कार्य का मूर्तिकरण होता है।

⇔ प्रतीक में भावना को उत्पन्न या जाग्रत करने की शक्ति होती है जबकि बिम्ब विधान में भावनाओं की उत्तेजित करने की शक्ति होती है।

⇒ प्रतीक पर युग, देश, संस्कृति, मान्यताओं की छाप रहती है।




बिम्ब विधान के उदाहरण (bimb ke udaharan)

⇒ प्रातः का नभ था, नीला शंख जैसे (चाक्षुष बिम्ब)

⇒ खरगोश की आँखों जैसा लाल सवेरा
शरद आया पुलों को पार करते हुए
अपनी नयी चमकीली साइकिल तेज चलाते हुए
घंटी बजाते हुए जोर-जोर से (श्रव्य बिम्ब)

⇒ जैसे बहन ’दा’ कहती है
ऐसे किसी बँगले के
किसी तरु (अशोक) पर कोई चिङिया कुऊकी
चलता सङक के किनारे लाल बजरी पर
चुरमुराए पाँव तले
ऊँचे तरुवर से गिरे
बङे-बङे पियराए पत्ते

प्रतीक एवं बिम्ब में क्या अंतर है ?

⇒ प्रतीक किसी सूक्ष्म भाव या अगोचर तत्त्व को साकार करने के लिए प्रयुक्त होता है, जबकि बिम्ब किसी पदार्थ की प्रतिकृति या प्रतिच्छवि के लिए प्रयुक्त होता है।

⇔ प्रतीक से तुरन्त मन में कोई भावना जाग्रत होती है किन्तु बिम्ब से मस्तिष्क में किसी सादृश्य का चित्र उभरता है।


गर्ग

शब्दों के माध्यम से निर्मित चित्र ही बिम्ब कहलाता है. काव्य-बिम्ब फोटो की तरह यथार्थ बिम्ब न होकर कवि की मानसिकता और भावना के अनुरूप कल्पना द्वारा निर्मित होते हैं. इसमें किसी वस्तु का आभास मात्र होता है. बिम्ब में इन्द्रियों का विशेष स्थान है, इन्द्रियों के द्वारा ही कवि किसी भाव की अनुभूति ग्रहण करता है और उस अनुभूति को कल्पना के माध्यम से शब्दों द्वारा चित्रित करता है. शब्द चित्रों की अनुभूति पाठक या श्रोता पढ़कर या सुनकर ग्रहण करते हैं, साथ ही कवि की अनुभूति से तादात्म्य स्थापित करते हैं. बिम्ब की प्रभावात्मकता उसकी ऐन्द्रियता पर ही निर्भर करती है. इंद्रियों के आधार पर ही बिम्ब के पाँच प्रसुख भेद होते है-

क.  दृश्य बिम्ब
ख.  श्रव्य बिम्ब
ग.   स्पर्श बिम्ब
घ.   घ्राण बिम्ब
ङ.    स्वाद बिम्ब

क.दृश्य बिम्ब-

दृश्य बिम्ब का सम्बन्ध नेत्रों से है. जब किसी काव्य को पढ़कर या सुनकर आँखों के सामने किसी घटना या वस्तु का चित्र सा उभर आता है तब वहाँ दृश्य बिम्ब होता है.
 उदाहरण-
     रश्मियों की सूक्ष्म सुइयों में रजत के तार भर,                           शशिकला ने भू-वसन पर की कढ़ाई रात में।

उपर्युक्त पंक्तियों में कवि ने चाँदनी रात में प्रकट हुये पृथ्वी के सौन्दर्य का दृश्य उभारकर प्रक्रति के मनोरम दृश्य का दृश्य बिम्ब प्रस्तुत किया है.

ख.श्रव्य बिम्ब-

श्रव्य बिम्ब का सम्बन्ध कर्णेन्द्रिय से है. जब किसी काव्य को पढ़कर या सुनकर किसी वाद्य या अन्य प्रकार की ध्वनि का आभास होता है तब वहाँ श्रव्य बिम्ब होता है.
उदाहरण-

खूब झम-झम कर बरस काली घटा.

उपर्युक्त पंक्ति को पढ़कर तेजी से बरसती हुई बारिश का शोर कानों में गूँजता सा महसूस होता है. इसलिये यहाँ श्रव्य बिम्ब है.

ग.स्पर्श बिम्ब-

स्पर्श बिम्ब का सम्बन्ध त्वचा से होता है. जब किसी काव्य को पढ़कर या सुनकर ऐसा आभास होता है कि किसी वस्तु की कोमलता या खुरदुरेपन ने हमें स्पर्श सा किया है, तब वहाँ काव्य में स्पर्श बिम्ब होता है.
 उदाहरण-

     जले जो रेत में तलुवे तो हमने ये देखा
     बहुत से लोग वहीं छटपटा के बैठ गये.

उपर्युक्त पंक्तियों में कवि ने प्रखर धूप में तपी रेत से स्पर्श होते तलुवे का स्पर्श बिम्ब प्रस्तुत किया है.

घ.घ्राण बिम्ब-

घ्राण बिम्ब का सम्बन्ध घ्राणेन्द्रिय से है. जब किसी काव्य को पढ़कर या सुनकर किसी वस्तु की सुगन्ध या दुर्गन्ध का आभास होता है, तब वहाँ घ्राण बिम्ब होता है.
उदाहरण-

     सोंधी-सोंधी महक है मिट्टी की,
     पहली-पहली फुहार में शामिल।

उपर्युक्त पंक्तियों में गर्मी के मौसम के बाद जब वर्षा ऋतु के प्रारम्भ में पहली फुहार पड़ने से जो मिट्टी से सोंधी महक उठती है, उसी का घ्राण बिम्ब प्रस्तुत किया गया है.

ङ.स्वाद बिम्ब-

स्वाद बिम्ब का सम्बन्ध स्वादेन्द्रिय से है. जब किसी काव्य को पढ़कर या सुनकर किसी वस्तु के खट्टे, मीठे, नमकीन या कसैले होने का आभास होता है, तब वहाँ स्वाद बिम्ब होता है.

उदाहरण-

     कुकुरमुत्ते की कहानी
     सुनी जब बहार से
     नबाब के मुँह में आया पानी.

उपर्युक्त पंक्तियों में कुकुरमुत्ते के स्वाद के बिम्ब को उभारा गया है, इसलिये यहाँ स्वाद बिम्ब है.










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