Class 9 Sanskrit all chapters with Hindi translation and words meaning
हिंदी के प्रसिद्ध छायावादी कवि पं० जानकी वल्लभ शास्त्री, संस्कृत के भी श्रेष्ठ कवि हैं। इनका एक गीत संग्रह ‘काकली’ नाम से प्रसिद्ध है। प्रस्तुत पाठ इसी संग्रह से लिया गया है। सरस्वती देवी की वंदना करते हुए कवि कहता है कि हे सरस्वती! अपनी वीणा का वादन करो ताकि मधुर मंजरियों से पीत पंक्तिवाले आम के कोयल का कूजन तथा वायु का मंद-मंद चलना वसन्त ऋतु में मोहक हो जाएँ। साथ-साथ काले भँवरा का गुंजार और नदियों का जल मोहक हो उठे। यह गीत स्वाधीनता संग्राम की पृष्ठभूमि में लिखा गया है। यह गीत जन-जन के हृदय में नवीन चेतना का संचार करता है। इससे सामान्य लोगों में स्वाधीनता की भावना जागती है।
भारतीवसन्तगीतिः Word Meanings Translation in Hindi
1. निनादय नवीनामये वाणि! वीणाम्
मृदुं गाय गीति ललित-नीति-लीनाम्।
मधुर-मञ्जरी-पिञ्जरी-भूत-माला:
वसन्ते लसन्तीह सरसा रसालाः
कलापाः ललित-कोकिला-काकलीनाम्॥
निनादय… ॥
शब्दार्था: –
नवीनामये – सुंदर मुखवाली
वाणि – हे सरस्वती
वीणाम् – वाणी को
गाय – गाओ, गीतिम्-गीत को
मधुर – मीठी (मीठे)
काकलीनाम् – कोयल के स्वरों की।
अर्थ –
हे सरस्वती (वाणी) आप अपनी नवीन वीणा को बजाओ। आप सुंदर नीति से युक्त (लीन) मीठे गीत गाओ। वसंत ऋतु में मीठे आम के फूलों की पीले रंग की पंक्तियों से और कोयलों की सुंदर ध्वनिवाले यहाँ मधुर आम के पेड़ों के समूह शोभा पाते हैं।
अव्ययानां वाक्येषु प्रयोगः –
अव्ययः — वाक्येषु प्रयोगः
अये — अये बालक! त्वां कुत्र गच्छतिः
इह (यहाँ) — इह मधुरं स्वरं सर्वत्र गुञ्जति।
विशेषण-विशेष्य चयनम् –
विशेषणम् – विशेष्यः
नवीनाम् – वीणाम्
सरसाः रसाला – कलापाः
ललित-नीति-लीनाम् – नीतिम्
2. वहति मन्दमन्दं सनीरे समीरे
कलिन्दात्मजायास्सवानीरतीरे,
नतां पङ्क्तिमालोक्य मधुमाधवीनाम्॥
निनादय… ॥
शब्दार्था: –
मन्दमन्दम् – धीरे-धीरे,
वहति – बहती हुई,
कलिन्द आत्मजाया: – कलिन्द की पुत्री के (यमुना के),
पङ्क्तिम् – पंक्ति को,
अवलोक्य – देखकर।
अर्थ –
यमुना नदी के बेंत की लता से युक्त तट पर जल से पूर्ण हवा धीरे-धीरे बहती हुई (फूलों से) झुकी हुई मधुमाधव की लताओं की पंक्ति को देखकर हे वाणी (सरस्वती)! तुम नई वीणा बजाओ।
अव्ययानां वाक्येषु प्रयोगः –
अव्ययः – वाक्येषु प्रयोगः
मन्दमन्दम् – पवनः अधुना मन्दमन्दम् चलति
विशेषण-विशेष्य-चयनम् –
विशेषणम् – विशेष्यः
सनीरे – समीरे
नताम् – पङ्क्तिम्
ललित-पल्लवे पादपे पुष्पपुजे
मलयमारुतोच्चुम्बिते मञ्जुकुञ्ज,
स्वनन्तीन्ततिम्प्रेक्ष्य मलिनामलीनाम्॥
निनादय… ॥
शब्दार्थाः –
पादपे – पौधे पर
मलिनाम् – काले रंग वाले
अलीनाम् – भौरों की
ततिम् – पंक्ति को
प्रेक्ष्य – देखकर।
अर्थ-
सुन्दर पत्तोंवाले वृक्ष (पौधे), फूलों के गुच्छों तथा सुन्दर कुंजों (बगीचों पर चंदन के वृक्ष की सुगंधित हवा से स्पर्श किए गए गुंजायमान करते हुए भौरों की काले रंग की पंक्ति को देखकर (हे वाणी! तुम नई वीणा बजाओ।)
पर्यायपदानि –
पदानि – पर्यायाः
ललित पल्लवे – मनोहरपल्लवे
मञ्जुकुञ्ज – शोभनलताविताने
विशेषण – विशेष्य – चयनम् –
विशेषणम् – विशेष्यः
ललित पल्लवे – पादपे
मलयमारुतोच्चुम्बिते – मञ्जुकुञ्ज
स्वनन्तीम् – ततिम्
लतानां नितान्तं सुमं शान्तिशीलम्च
लेदुच्छलेत्कान्तसलिलं सलीलम्,
‘तवाकर्ण्य वीणामदीनां नदीनाम्॥
निनादय… ॥
शब्दार्थाः –
लतानाम् – बेलों की (के)
नितान्तम् – पूरी तरह से
सुमम् – फूल
चलेत् – हिलने लगे
तव – तुम्हारी
आकर्ण्य – सुनकर
वीणाम् – वीणा को
अदीनाम् – तेजस्विनी।
अर्थ-
हे वाणी (सरस्वती)! ऐसी वीणा बजाओ कि तुम्हारी तेजस्विनी वाणी को सुनकर लताओं (बेलों) के पूर्ण शांत रहने वाले फूल हिलने लगें, नदियों का सुंदर जल क्रीडा (खेल) करता हुआ उछलने लगे।
पर्यायपदानि –
पदानि – पर्यायाः
सलीलम् – क्रीडासहितम्
आकर्ण्य – श्रुत्वा
विशेषण – विशेष्य – चयनम् –
विशेषणम् विशेष्यः
शान्तिशीलम् – सुमम्
अदीनाम् – वीणाम्
Class 9 Sanskrit Chapter 2 स्वर्णकाकः Summary Notes
स्वर्णकाकः Summary
प्रस्तुत पाठ पद्मशास्त्री जी द्वारा रचित ‘विश्वकथाशतकम्’ नामक कथा संग्रह से लिया गया है। इस कथा में सुनहरे पंखों वाले एक कौए के माध्यम से लोभ और उसके दुष्परिणाम का वर्णन किया गया है। साथ में त्याग और उसके लाभ के बारे में बताया गया है। कथा का सार इस प्रकार है
किसी गाँव में एक बुढ़िया रहती थी। उसने एक दिन थाली में चावल रखकर अपनी पुत्री से कहा-पुत्री, पंछियों से इसकी रक्षा करना। उसी समय एक विचित्र कौआ वहाँ आकर चावल खाने लगा। उस कन्या ने कौवे को मना किया तो उसने उसे एक पीपल के वृक्ष के पास आने के लिए कहा। कौवे ने उस लड़की की ईमानदारी से प्रसन्न होकर उसे हीरे-जवाहरात दिए।
उसी गाँव में एक लालची बुढ़िया भी रहती थी। वह सारे रहस्य जान गई। उसने ईर्ष्या वश उसी प्रकार का नाटक किया। उसकी बेटी घमंडी थी। कौवे के कहने पर उसने स्वर्णमय सोपान की माँग की। उस लड़की की हीन इच्छा को जानकर कौवे ने उसके सामने तीन पेटियाँ रख दीं। लोभ से भरी हुई उस लड़की ने सबसे बड़ी पेटी उठा ली। ज्यों ही उसने उसे खोला, त्योंही उसमें से काला साँप निकला। उस दिन से उस लड़की ने लालच का त्याग कर दिया।
स्वर्णकाकः Word Meanings Translation in Hindi
1. पुरा कस्मिंश्चिद् ग्रामे एका निर्धना वृद्धा स्त्री न्यवसत्। तस्याः च एका दुहिता विनम्रा मनोहरा चासीत्। एकदा माता स्थाल्यां तण्डुलान् निक्षिप्य पुत्रीम् आदिशत्। “सूर्यातपे तण्डुलान् खगेभ्यो रक्षा” किञ्चित् कालादनन्तरम् एको विचित्रः काकः समुड्डीय तस्याः समीपम् अगच्छत्।
शब्दार्थाः –
पुरा – प्राचीन काल में
निक्षिप्त – रखकर
कस्मिंश्चिद् – किसी (में)
आदिदेश – आदेश दिया
निर्धना – ग़रीब,
सूर्यातपे – सूरज की धूप में
न्यवसत् – रहती थी
खगेभ्यः – पक्षियों से
दुहिता – पुत्री
किञ्चिद् – कुछ
विनम्रा – नम्र स्वभाव वाली
कालात् – समय से (के)
मनोहरा – सुंदर
अनन्तरम् – बाद में
एकदा – एक बार
समुड्डीय – उड़कर
स्थाल्याम् – थाली में
तण्डुलान् – चावलों को।
अर्थ –
प्राचीन समय में किसी गाँव में एक निर्धन (ग़रीब) बुढ़िया स्त्री रहती थी। उसकी एक नम्र स्वभाव वाली और सुंदर बेटी थी। एक बार माँ ने थाली में चावलों को रखकर पुत्री को आज्ञा दी – सूर्य की गर्मी में चावलों की पक्षियों से रक्षा करो। कुछ समय बाद एक विचित्र कौआ उड़कर वहाँ आया।
अव्ययानां वाक्येषु प्रयोगः –
अव्ययः वाक्येषु प्रयोगः
पुरा – पुरा रामः अयोध्यायाः नृपः आसीत्।
च् – श्रीकृष्णः बलरामश्च च् भ्रातरौ आस्ताम्।
अनन्तरम् – स्नानात् अनन्तरं शरीराङ्गानि स्वच्छानि भवन्ति।
विशेषण – विशेष्य – चयनम् –
विशेषणम् – विशेष्यः
कस्मिंश्चित् – ग्रामे
एका, विनम्रा, मनोहरा – दुहिता
एका, निर्धना, वृद्धा – स्त्री
एकः, विचित्रः – काकः
2. नैतादृशः स्वर्णपक्षो रजतचञ्चुः स्वर्णकाकस्तया पूर्वं दृष्टः। तं तण्डुलान् खादन्तं हसन्तञ्च विलोक्य बालिका रोदितुमारब्धा। तं निवारयन्ती सा प्रार्थयत् “तण्डुलान् मा भक्षय। मदीया माता अतीव निर्धना वर्तते।” स्वर्णपक्षः काकः प्रोवाच, “मा शुचः। सूर्योदयात्प्राग् ग्रामाबहिः पिप्पलवृक्षमनु त्वया आगन्तव्यम्। अहं तुभ्यं तण्डुलमूल्यं दास्यामि।” प्रहर्षिता बालिका निद्रामपि न लेभे।
शब्दार्थाः –
एतादृशः – ऐसा (इस तरह का)
स्वर्णपक्षः – सोने, के पंख वाला
रजतचञ्चुः-चाँदी की चोंच वाला
पूर्वम् – पहले
खादन्तम् – खाते हुए को
प्रोवाच – बोला/बोली
हसन्तम् – हँसते हुए को
शुचः – शोक करो,
दितम् – रोना
प्राग – पहले
आरब्धा – शुरू कर दिया
पिप्पलक्षमन – पीपल के वृक्ष के, पीछे
निवारयन्ती – हटाती हुई
आगन्तव्यम् – आना
प्रार्थयत् – प्रार्थना की
तुभ्यम् – तुम्हें
भक्षय – खाओ
प्रहर्षिता – प्रसन्न
मदीया – मेरी
निद्राम् – नींद को
अतीव – बहुत अधिक
लेभे – ले पाई
अर्थ –
उसके द्वारा ऐसा सोने के पंखों वाला और चाँदी की चोंच वाला सोने का कौआ पहले नहीं देखा गया था। उसको चावलों को खाते और हँसते हुए देखकर लड़की ने रोना शुरू कर दिया। उसको हटाती हुई उसने प्रार्थना की-चावलों को मत खाओ। मेरी माँ बहुत गरीब है। सोने के पंख वाला कौआ बोला, शोक मत करो। सूर्योदय से पहले गाँव के बाहर पीपल के वृक्ष के पीछे तुम आना। मैं तुम्हें चावलों का मूल्य (कीमत) दे दूँगा। प्रसन्नता से भरी लड़की नींद भी नहीं ले पाई।
विशेषण – विशेष्य – चयनम् –
विशेषणम् – विशेष्यः
एतादृशः, स्वर्णपक्षः, रजतचञ्चुः – स्वर्णकाकः
निवारयन्ती – सा
स्वर्णपक्षः – काकः
खादन्तम्, हसन्तम् – तम्
मदीया, निर्धना – माता
प्रहर्षिता – बालिका
अव्ययानां वाक्येषु प्रयोगः –
पूर्वम् – सः बालकः पूर्वम् अत्र नागच्छत्।
विलोक्य – पितरम् विलोक्य पुत्रः प्रसन्नः अभवत्।
अतीव – अधुना अहम् अतीव श्रान्तः अस्मि।
मा – त्वं तत्र मा गच्छ।
बहिः – सः ग्रामात् बहिः निरगच्छत्।
अनु – विद्यालयम् अनु छात्राः तिष्ठन्ति।
अपि – ते अपि गुणिनः सन्ति।
3. सूर्योदयात्पूर्वमेव सा तत्रोपस्थिता। वृक्षस्योपरि विलोक्य सा च आश्चर्यचकिता सञ्जाता यत् तत्र स्वर्णमयः प्रासादो वर्तते। यदा काकः शयित्वा प्रबुद्धस्तदा तेन. स्वर्णगवाक्षात्कथितं “हंहो बाले! त्वमागता, तिष्ठ, अहं त्वत्कृते सोपानमवतारयामि, तत्कथय स्वर्णमयं रजतमयम् ताम्रमयं वा?” कन्या अवदत्”अहं निर्धनमातुः दुहिता अस्मि। ताम्रसोपानेनैव आगमिष्यामि।” परं स्वर्णसोपानेन सा स्वर्ण-भवनम् आरोहत।
शब्दार्थाः –
पूर्वमेव – पहले से ही
हहो – अरे/हे
उपस्थिता – उपस्थित थी
आगता – आ गई।
वृक्षस्योपरि – वृक्ष के ऊपर
त्वत्कते – तम्हारे लिए.
आश्चर्यचकिता – हैरान,
अवतारयामि – उतारता हूँ.
सजाता – हो गई.
उत – और
स्वर्णमयः – सोने से बना,
प्रावोचत् – बोली,
प्रासादः – महल,
मातः – माँ की,
वर्तते – है,
दुहिता – बेटी
शयित्वा – सोकर,
ताम्रसोपानेन – ताँबे की सीढ़ी से,
प्रबुद्धः – जागा,
स्वर्णभवनम् – सोने के महल में,
स्वर्णगवाक्षात् – सोने की खिड़की से
आससाद – पहुँची।
अर्थ –
सूर्योदय से पहले ही वह (लड़की) वहाँ पहुँच गई। वृक्ष के ऊपर देखकर वह आश्चर्यचकित हो गई कि वहाँ सोने का महल है। जब कौआ सोकर उठा तब उसने सोने की खिड़की से झाँककर कहा–अरे बालिका! तुम आ गई, ठहरो, मैं तुम्हारे लिए सीढ़ी को उतारता हूँ, तो कहो सोने की, चाँदी की अथवा ताँबे की, किसकी उतारूँ? कन्या बोली-मैं निर्धन (ग़रीब) माँ की बेटी हूँ। ताँबे की सीढ़ी से ही आऊँगी। परंतु सोने की सीढ़ी से वह स्वर्णभवन में पहुँची।
अव्ययानां वाक्येषु प्रयोगः –
पूर्वम् – खगाः सायं कालात् पूर्वमे व स्वनीडमागच्छन्ति
तत्र – सः तत्र गच्छति तत्र तस्य माता अस्ति।
उपरि – गृहस्य उपरि खगाः तिष्ठन्ति।
यत् – अहं कथयामि यत् त्वं तत्र तिष्ठ।
यदा – यदा श्रीकृष्णः उपदिशति।
तदा – तदा अर्जुनः युद्धम् अकरोत्।
वा – सुखे वा दु:खे वा सदैव शान्तः भवेत्।
एव – माता एव पुत्रस्य हितं करोति।
यद्यपि सः खञ्जोऽस्ति परम् अतीव तत्परो प्रतीयते।
विशेषण – विशेष्य – चयनम् –
विशेषणम् – विशेष्यः
आश्चर्यचकिता – सा
प्रबुद्धः – काकः
स्वर्णमयः – प्रासादः
स्वर्णमयम् – भवनम्
4. चिरकालं भवने चित्रविचित्रवस्तूनि सज्जितानि दृष्ट्वा सा विस्मयं गता। श्रान्तां तां विलोक्य काकः अवदत् “पूर्वं लघुप्रातराशः क्रियताम्-वद त्वं स्वर्णस्थाल्यां भोजनं करिष्यसि किं वा रजतस्थाल्याम् उत ताम्रस्थाल्याम्”? बालिका अवदत्-ताम्रस्थाल्याम् एव अहं-“निर्धना भोजनं करिष्यामि।” तदा सा आश्चर्यचकिता सजाता यदा स्वर्णकाकेन स्वर्णस्थाल्यां भोजनं पर्यवेषितम्। न एतादृशम् स्वादु भोजनमद्यावधि बालिका खादितवती। काकोऽवदत्-बालिके! अहमिच्छामि यत् त्वम् सर्वदा अत्रैव तिष्ठ परं तव माता तु एकाकिनी वर्तते। अतः “त्वं शीघ्रमेव स्वगृहं गच्छ।”
शब्दार्थाः –
चिरकालम – बहुत देर तक
स्वर्णस्थाल्याम – सोने की थाली में
सज्जितानि – सजी हुई
रजतस्थाल्याम् – चाँदी की थाली में
विस्मयम् – हैरानी को
उत – या/अथवा
गता – प्राप्त हुई
व्याजहार – बोली/बोला
श्रान्ताम् – थकी हुई को
निर्धना – ग़रीब
विलोक्य – देखकर
आश्चर्यचकिता – हैरान
प्राह – बोला
सज्जाता – हो गई
पूर्वम् – पहले
पर्यवेषितम – परोसा (दिया)
लघप्रातराश: – थोडा नाश्ता (जलपान)
एतादक – ऐसा
क्रियताम – करो
स्वादु – स्वादिष्ट
अद्यावधि – आजतक
सर्वदा – सदा (हमेशा)
खादितवती – खाई भी
अत्रैव (अत्र+एव) – यहीं
ब्रूते – बोला, एकाकिनी-अकेली।
अर्थ –
बहुत देर तक भवन में चित्रविचित्र (अनोखी) वस्तुओं को सजी हुई देखकर वह हैरान रह गई। उसको थकी हुई देखकर कौआ बोला-पहले थोड़ा नाश्ता करो-बोलो तुम सोने की थाली में भोजन करोगी या चाँदी की थाली में या ताँबे की थाली में? लड़की बोली-ताँबे की थाली में ही मैं ग़रीब भोजन करूँगी (खाना खाऊँगी)। तब वह कन्या और आश्चर्यचकित हो गई जब सोने के कौवे ने सोने की थाली में (उसे) भोजन परोसा। ऐसा स्वादिष्ट भोजन आज तक उस लड़की ने नहीं खाया था। कौआ बोला-हे बालिका (लडकी)! मैं चाहता हूँ कि तुम हमेशा यहीं रहो परंतु तुम्हारी माँ अकेली है। तुम जल्दी ही अपने घर को जाओ।
अव्ययानां वाक्येषु प्रयोगः –
पूर्वम् – ग्रामात् पूर्वम् जलाशयः विद्यते।
वा – बाल:भवेत् बालिका वा, सम्पूर्ण स्नेहं कुर्यात्।
एव – एव मम भागिनी वर्तते।
यदा-तदा – यदा बालः गृहं गमिष्यति तदा भोजनं खादिष्यति।
अद्यावधि – रामम् इव अद्यावधि कश्चिदपि न अभवत्।
च – भ्राता भगिनी च विद्यालयं गच्छतः।
अत्र – अत्र मम जन्मस्थानम् अस्ति।
शीघ्रम् – अधुना अहं विद्यालयं शीघ्रं गच्छामि।
विशेषण – विशेष्य – चयनम् –
विशेषणम् – विशेष्यः
सज्जितानि – चित्रविचित्रवस्तूनि
निर्धना – अहम्
एतादृक् स्वादु – भोजनाम
श्रान्ताम् – ताम्
सा, आश्चर्यचकिता – कन्या
एकाकिनी – माता
5. इत्युक्त्वा काकः कक्षाभ्यन्तरात् तिस्त्रः मञ्जूषाः निस्सार्य तां प्रत्यवदत्-“बालिके! यथेच्छं गृहाण मञ्जूषामेकाम्।” लघुतमा मञ्जूषां प्रगृह्य बालिकया कथितम् इयत् एव मदीयतण्डुलानां मूल्यम्। गृहमागत्य तया मञ्जूषा समुद्घाटिता, तस्यां महार्हाणि हीरकाणि विलोक्य सा प्रहर्षिता तद्दिनाद्धनिका च सञ्जाता।
शब्दार्था: –
इत्युक्त्वा – ऐसा कहकर के
कक्षाभ्यन्तरात् – कमरे के अंदर से
मञ्जूषा: – बक्से
निस्सार्य – निकालकर
प्रत्यवदत् – बोला
यथेच्छम् – इच्छापूर्वक (इच्छा के अनुसार)
लघुतमाम् – सबसे छोटी (को)
प्रगृह्य – लेकर
इयदेव – इतना ही
मदीय – मेरे
समुद्घाटिता – खोला (खोला गया)
महार्हाणि – महँगे (बहुमूल्य)
प्रहर्षिता – प्रसन्न हो गई
तद्दिनात् – उसी दिन से
सञ्जाता – हो गई।
अर्थ –
ऐसा कहकर कौए ने कमरे के अंदर से तीन बक्से निकालकर उसको कहा- हे कन्या! अपनी इच्छा से एक संदूक ले लो। सबसे छोटी संदूक को लेकर लड़की ने कहा-यही मेरे चावलों की कीमत है। घर आकर उसने संदूक को खोला, उसमें बहुत कीमती (मूल्यवान) हीरों को देखकर वह बहुत खुश हुई और उसी दिन से वह धनी हो गई।
अव्ययानां वाक्येष प्रयोग –
अव्ययः – वाक्येषु प्रयोगः
इति – इति कथयित्वा छात्रः विद्यालयम् अगच्छत्।
एव – त्वम् एव मम बन्धुः वर्तते।
च – रामः श्यामः च मित्रे स्तः।
विशेषण-विशेष्य चयनम –
तिस्त्रः – मञ्जूषाः
इयत्मू – ल्यम्
प्रहर्षिता, धनिका – सा
एकाम् – मञ्जूषाम्
महार्हाणि – हीरकाणि
6. तस्मिन्नेव ग्रामे एका परा लुब्धा वृद्धा न्यवसत्। तस्या अपि एका पुत्री आसीत्। ईर्ण्यया सा तस्य स्वर्णकाकस्य रहस्यम् ज्ञातवती। सूर्यातपे तण्डुलान् निक्षिप्य तयापि स्वसुता रक्षार्थं नियुक्ता। तथैव स्वर्णपक्षः काकः तण्डुलान् भक्षयन् तामपि तत्रैवाकारयत्। प्रातस्तत्र गत्वा सा काकं निर्भर्त्सयन्ती प्रावोचत्-“भो नीचकाक! अहमागता, मह्यं तण्डुलमूल्यं प्रयच्छ।” काकोऽब्रवीत्-“अहं त्वत्कृते सोपानम् अवतारयामि। तत्कथय स्वर्णमयं रजतमयं ताम्रमयं वा।” गर्वितया बालिकया प्रोक्तम्- “स्वर्णमयेन सोपानेन अहम् आगच्छामि।” परं स्वर्णकाकस्तत्कृते ताम्रमयं सोपानमेव प्रायच्छत्। स्वर्णकाकस्तां भोजनमपि ताम्रभाजने एव अकारयत्।
शब्दार्था: –
तस्मिन्नेव – उसी
निर्भर्त्सयन्ती – बुरा-भला कहती हुई
अपरा – दूसरी
प्रावोचत् – बोला
न्यवसत् – रहती थी
आगता – आ गई
रहस्यम् – गुप्त बात को
मह्यम् – मुझे
अभिज्ञातवती – जान गई
त्वत्कृते – तुम्हारे लिए
सूर्यातपे – सूर्य की धूप में
सोपानम् – सीढ़ी को
निक्षिप्य – रखकर/फैलाकर
अवतारयामि – उतारता हूँ
स्वसुता – अपनी पुत्री
तत्कथय – तो कहो
रक्षार्थम् – रखवाली के लिए
गर्वितया – घमंडी
नियुक्ता – बिठा दी
प्रोक्तम् – कहा गया/ कहा
तथैव – वैसे ही
तत्कृते – उसके लिए
भक्षयन् – खाते हुए
प्रायच्छत् – दिया
तत्रैव – वहीं
ताम्रभाजने – ताँबे के पात्र में
आवारयत् – बुलाया,
अकारयत् – कराया।
अर्थ –
उसी गाँव में एक दूसरी लालची बुढ़िया स्त्री रहती थी। उसकी भी एक बेटी थी। ईर्ष्या से उसने उस सोने के कौए का रहस्य जान लिया। सूर्य की धूप में चावलों को रखकर (फैलाकर) उसने भी अपनी बेटी को उसकी रक्षा के लिए बिठा (नियुक्त कर) दिया। वैसे ही सोने के पंख वाले कौए ने चावलों को खाते हुए उसको (लड़की को) भी या। सबह वहाँ जाकर वह कौए को बरा-भला कहती हई बोली- हे नीच कौए! मैं आ गई हूँ, मुझे चावलों का मल्य दो। कौआ बोला- मैं तुम्हारे लिए सीढी उतारता हूँ। तो कहो सोने से बनी हुई, चाँदी से बनी हुई अथवा ताँबे से बनी हुई। घमंडी लड़की बोली- सोने से बनी हुई सीढ़ी से मैं आती हूँ परंतु सोने के कौए ने उसे ताँबे से बनी हुई सीढ़ी ही दी। सोने के कौए ने उसे भोजन भी ताँबे के बर्तन में कराया।
अव्ययानां वाक्येषु प्रयोगः –
एव – एषः एव मम भ्राता अस्ति।
अपि – त्वम् अपि स्वकथां श्रावय!
तथैव – बालकः अपि तथैव करोति यथा तस्य पिता करोति।
तत्रैव – रामः तत्रैव तिष्ठति यत्र तस्य गुरुः आदिशत्
तत्र – त्वमपि तत्र गच्छ!
हि – त्वं हि नः पिता वर्तसे।
विशेषण – विशेष्य – चयनम् –
विशेषणम् – विशेष्य
तस्मिन् – ग्रामे
एका – पुत्री
निर्भर्त्सयन्ती – सा
गर्वितया – बालिकया
एका, अपरा, लुब्धा – वृद्धा
स्वर्णपक्षः – काक:
स्वर्णमयम्/ताम्रमयम् /रजतमयम् – सोपानम्
स्वर्णमयेन – सोपानेन
7. प्रतिनिवृत्तिकाले स्वर्णकाकेन कक्षाभ्यन्तरात् तिम्रः मञ्जूषाः तत्पुरः समुत्क्षिप्ताः। लोभाविष्टा सा बृहत्तमा मञ्जूषां गृहीतवती। गृहमागत्य सा तर्षिता यावद् मञ्जूषामुद्घाटयति तावत् तस्यां भीषणः कृष्णसर्पो विलोकितः। लुब्धया बालिकया लोभस्य फलं प्राप्तम्। तदनन्तरं सा लोभं पर्यत्यजत्।
शब्दार्थाः –
प्रतिनिवृत्तिकाले – वापस जाते समय
लोभाविष्टा – लालची
कक्षाभ्यन्तरात् – कमरे के अंदर से
बृहत्तमाम् – सबसे बड़ी
तिस्त्रः – तीन
गृहीतवती – ले ली
मञ्जूषाः – संदूकें (पेटियाँ),
तर्षिता – व्याकुल
तत्पुरः – उसके सामने
उद्घाटितवती – खोला/खोली
समुत्क्षिप्ताः – रख दी
भीषण:- भयानक
कृष्णसर्पः – काला साँप
विलोकितः – देखा
लुब्धया – लालची
प्राप्तम् – प्राप्त किया गया
पर्यत्यजत् – छोड़ दिया।
अर्थ –
वापस होते समय सोने के कौए ने कमरे के अंदर से तीन पेटियाँ (संदूकें) उसके सामने रख दीं। लालची लड़की ने सबसे बड़ी पेटी ले ली। घर आकर व्याकुल वह जब संदूक खोलती है तो उसमें अचानक काला साँप देखा। लालची लड़की ने लालच का फल पाया। उसके बाद उसने लालच छोड़ दी।
अव्ययानां वाक्येषु प्रयोगः –
अव्ययः – वाक्येषु प्रयोगः
तत्पुरः – रामः बालकं दृष्ट्वा तत्पुरः भोजनम् कृतवान्।
यावद् – यावद् सः पठिष्यति।
तावत् – तावत् तस्य जीवनम् उन्नति करिष्यति।
अनन्तरम् – पठनात् अनन्तरं सः अधिकारी अभवत्।
विशेषण – विशेष्य – चयनम् –
विशेषणम् – विशेष्यः
तिस्रः – मज्जूषाः
बृहत्तमाम् – मञ्जूषाम्
भीषणः – कृष्णसर्पः
लोभाविष्टा – सा
तर्षिता – सा
लुब्धया – बालिकया
Class 9 Sanskrit Chapter 3 गोदोहनम् Summary Notes
गोदोहनम् Summary
यह नाटयांश कृष्णचंद्र त्रिपाठी महोदय द्वारा रचित ‘चतुर्म्यहम्’ पुस्तक से सम्पादित करके लिया गया है। इस नाटक में ऐसे व्यक्ति की कथा है जो धनी और सुखी होने की इच्छा से प्रेरित होकर एक महीने के लिए गाय का दूध निकालना बंद कर देता है ताकि गाय के शरीर में इकट्ठा पर्याप्त दूध एक ही बार में बेचकर सम्पत्ति कमाने में समर्थ हो सके।
परन्तु मास के अन्त में जब वह दूध दुहने का प्रयत्न करता है तब वह दूध की बूंद भी प्राप्त नहीं कर पाता है। दूध प्राप्त करने के स्थान पर वह गाय के प्रहारों द्वारा खून से लथपथ हो जाता है और जान जाता है कि प्रतिदिन का कार्य यदि मास भर के लिए इकट्ठा किया जाता है तब लाभ के स्थान पर हानि ही होती है।
गोदोहनम् Word Meanings Translation in Hindi
1. (प्रथमम् दृश्यम्)
(मल्लिका मोदकानि रचयन्ती मन्दस्वरेण शिवस्तुतिं करोति)
(ततः प्रविशति मोदकगन्धम् अनुभवन् प्रसन्नमना चन्दनः।)
चन्दनः – अहा! सुगन्धस्तु मनोहरः ( विलोक्य ) अये मोदकानि रच्यन्ते? (प्रसन्नः भूत्वा) आस्वादयामि तावत्।
(मोदकं गृहीतुमिच्छति)
मल्लिका – (सक्रोधम् ) विरम। विरम। मा स्पृश! एतानि मोदकानि।
चन्दनः – किमर्थं क्रुध्यसि! तव हस्तनिर्मितानि मोदकानि दृष्ट्वा अहं जिह्वालोलुपतां नियन्त्रयितुम् अक्षमः
अस्मि, किं न जानासि त्वमिदम्?
मल्लिका – सम्यग् जानामि नाथ! परम् एतानि मोदकानि पूजानिमित्तानि सन्ति।
चन्दनः – तर्हि, शीघ्रमेव पूजनं सम्पादय। प्रसादं च देहि।
शब्दार्था:-
मोदकानि – लड्डुओं को
रचयन्ती – बनाती हुई
मन्दस्वरेण – धीमी आवाज़ से
मोदकगन्धम् – लड्डुओं की सुगन्ध को
प्रसन्नमना – प्रसन्न मन वाला
रच्यन्ते – बनाए जा रहे हैं
आस्वादयामि – स्वाद लेता हूँ
तावत् – तो/ तब तक
गृहीतुम् – लेने के लिए
सक्रोधम् – क्रोध के साथ
स्पृश – छुओ
हस्तनिर्मितानि – हाथों से बने हुए नियन्त्रयितुम् काबू करने में
अक्षमः – असमर्थ हूँ
पूजानिमित्तानि – पूजा के लिए
सम्पादय – करो।
(पहला दृश्य)
अर्थ –
(मल्लिका लड्डुओं को बनाती हुई धीमी आवाज़ में शिव की स्तुति करती है।)
(उसके बाद लड्डुओं की सुगन्ध को अनुभव करते हुए प्रसन्न मन से चन्दन प्रवेश करता है।)
चन्दन – वाह! सुगन्ध तो मनोहारी है (देखकर) अरे लड्डू बनाए जा रहे हैं? (प्रसन्न होकर) तो स्वाद लेता हूँ। (लड्डू को लेना चाहता है)
मल्लिका – (क्रोध के साथ) रुको। रुको। मत छुओ! इन लड्डुओं को।
चन्दन – क्यों गुस्सा करती हो! तुम्हारे हाथों से बने लड्डुओं को देखकर मैं जीभ की लालच पर काबू रखने में असमर्थ हूँ, क्या तुम यह नहीं जानती हो?
मल्लिका – अच्छी तरह से जानती हूँ स्वामी। परन्तु ये लड्डू पूजा के लिए हैं।
चन्दन – तो जल्दी ही पूजा करो और प्रसाद को दो।
सन्धिः विच्छेदः वा –
पदानि – सन्धिविच्छेदः
सुगन्धस्तु – सुगन्धः + तु
सम्यग् जानामि – सम्यक् + जानामि
प्रकृति प्रत्ययोः विभाजनम् –
पदानां वाक्यप्रयोगः –
पद परिचयः –
2. मल्लिका – भो! अत्र पूजनं न भविष्यति। अहं स्वसखिभिः सह श्वः प्रातः काशीविश्वनाथमन्दिरं प्रति गमिष्यामि, तत्र गङ्गास्नानं धर्मयात्राञ्च वयं करिष्यामः।
चन्दनः – सखिभिः सह! न मया सह! (विषादं नाटयति)
मल्लिका – आम्। चम्पा, गौरी, माया, मोहिनी, कपिलाद्याः सर्वाः गच्छन्ति। अतः, मया सह तवागमनस्य औचित्यं नास्ति। वयं सप्ताहान्ते प्रत्यागमिष्यामः। तावत्, गृह व्यवस्था, धेनोः दुग्धदोहनव्यवस्थाञ्च परिपालय।
शब्दार्थाः-
पूजनम् – पूजा को
स्वसखिभिः सह – अपनी सखियों के साथ
विषादम् – दु:ख को
नाटयति – अभिनय करता है
आगमनस्य – आने का
औचित्यम् – उचित कारण
प्रत्यागमिष्यामः – वापस आ जाएँगी
तावत् – तब तक
परिपालय – संभालो
दुग्धदोहनव्यवस्थाम् – दूध को दुहने की व्यवस्था को।
अर्थ
मल्लिका – अरे! यहाँ पूजा नहीं होगी। मैं अपनी सखियों के साथ कल सुबह काशीविश्वनाथ मंदिर की ओर जाऊँगी, वहाँ हम गंगा स्नान और धार्मिक यात्रा करेंगी।
चन्दन – सखियों के साथ! मेरे साथ नहीं! (दु:ख का अभिनय करता है)
मल्लिका – हाँ। चंपा, गौरी, माया, मोहिनी, कपिला आदि सब जाती हैं। अतः मेरे साथ तुम्हारे आने का कोई औचित्य (उचित रूप) नहीं है। हम सप्ताह के अन्त में (तक) वापस आ जाएँगी। तब तक घर की व्यवस्था और गाय के दूध को दुहने की व्यवस्था को चलाना।
सन्धिः विच्छेदः वा –
पदानि – सन्धिःविच्छेदःवा
धर्मयात्राञ्च – धर्मयात्राम् + च विषादं
नाटयति – विषादम् + नाटयति
कपिलाद्याः – कपिल + आद्याः
तवागमनस्य – तव + आगमनस्य
नास्ति – न + अस्ति
सप्ताहान्ते – सप्ताह + अन्ते
प्रत्यागमिष्यामः – प्रति + आगमिष्यामः
दुग्धदोहन व्यवस्थाञ्च – दुग्धदोहन व्यवस्थाम् + च
उपसर्ग विभाजनम्
कारकाः उपपदविभक्तयश्च
पदपरिचयः
3. (द्वितीयम् दृश्यम्)
चन्दनः – अस्तु। गच्छ। सखिभिः सह धर्मयात्रया आनन्दिता च भव। अहं सर्वमपि परिपालयिष्यामि। शिवास्ते सन्तु पन्थानः।
चन्दनः – मल्लिका तु धर्मयात्रायै गता। अस्तु। दुग्धदोहनं कृत्वा ततः स्वप्रातराशस्य प्रबन्धं करिष्यामि। (स्त्रीवेषं धृत्वा, दुग्धपात्रहस्तः नन्दिन्याः समीपं गच्छति)
उमा – मातुलानि! मातुलानि!
चन्दनः – उमे! अहं तु मातुलः। तव मातुलानी तु गङ्गास्नानार्थं काशीं गता अस्ति। कथय! किं ते प्रियं करवाणि?
उमा – मातुल! पितामहः कथयति, मासानन्तरम् अस्मत् गृहे महोत्सवः भविष्यति। तत्र त्रिशत-सेटक्रमितं दुग्धम् अपेक्षते। एषा व्यवस्था भवद्भिः करणीया।
चन्दनः – (प्रसन्नमनसा) त्रिशत-सेटककपरिमितं दुग्धम्! शोभनम्। दुग्धव्यवस्था भविष्यति एव इति पितामहं प्रति त्वया वक्तव्यम्।
उमा – धन्यवादः मातुल! याम्यधुना। (सा निर्गता)
शब्दार्था: –
अस्तु – ठीक है
धर्मयात्रया – धर्म की यात्रा से
परिपालयिष्यामि – संभाल लूँगा
शिवा: – कल्याणकारी
पन्थान: – मार्ग (रास्ते)
स्वप्रातराशस्य – अपने नाश्ते का
दुग्धपात्रहस्तः – हाथ में दूध के पात्र वाला
मातुलानि! – मामी!
गता – गई हुई
मासानन्तरम् – महीने बाद
अस्मत् – हमारे
अपेक्षते – चाहिए
भवद्भिः – आपके द्वारा
सेटक – लीटर (सेर)
वक्तव्यम् – कहना
यामि – जाती हूँ
निर्गता – निकल गई।
अर्थ – (दूसरा दृश्य)
चन्दन – ठीक है। जाओ। और सखियों के साथ धर्मयात्रा से आनन्दित होओ। मैं सभी को पाल लूँगा। तुम्हारे रास्ते शुभ हों।
चन्दन – मल्लिका तो धर्मयात्रा हेतु गई। ठीक है। गाय का दूध दुहकर उससे अपने नाश्ते (जलपान) का प्रबन्ध करूँगा। (स्त्री का वेश धारण करके, दूध के हाथ में लिए नन्दिनी गाय के पास जाता है)
उमा – मामी! मामी!
चन्दन – हे उमा! मैं तो मामा हूँ। तुम्हारी मामी तो गंगा स्नान के लिए काशी गई है। कहो! क्या तुम्हारा भला करूँ?
उमा – मामा! दादाजी कहते हैं, महीने भर बाद हमारे घर में उत्सव होगा। तब तीन सौ लीटर तक दूध चाहिए। यह व्यवस्था आपको ही करनी है।
चन्दन – (प्रसन्न मन से) तीस लीटर मात्रा (माप) में दूध! सुन्दर। दूध की व्यवस्था हो जाएगी ही ऐसा दादा जी को तुम कह दो।
उमा – धन्यवाद मामा! अब जाती हूँ। (वह चली गई) सन्धिः विच्छेदः वा
सन्धिःविच्छेदःवा –
शिवास्ते – शिवाः + ते
गङ्गा – गम् + गा
स्नानार्थम् – स्नान + अर्थम्
मासानन्तरम् – मास + अनन्तरम्
महोत्सवः – महा + उत्सवः
याम्यधुना – यामि + अधुना
प्रकृति – प्रत्यय-विभाजनम् –
विशेषण – विशेष्य – चयनम् –
विशेषणानि – विशेष्याः
शिवाः – पन्थानः
दुग्धपात्रहस्तः – चन्दनः
त्रिशत-सेटकमितम् – दुग्धम्
एषा – व्यवस्था
उपपदविभक्तयः कारकाश्च –
4. (तृतीयं दृश्यम्)
चन्दनः – (प्रसन्नो भूत्वा, अलिषु गणयन्) अहो! सेटक-त्रिशतकानि पयांसि! अनेन तु बहुधनं लप्स्ये।
(नन्दिनीं दृष्ट्वा) भो नन्दिनि! तव कृपया तु अहं धनिकः भविष्यामि। (प्रसन्नः सः धेनोः बहुसेवां करोति)
चन्दनः – (चिन्तयति) मासान्ते एव दुग्धस्य आवश्यकता भवति। यदि प्रतिदिनं दोहनं करोमि तर्हि दुग्धं
सुरक्षितं न तिष्ठति। इदानीं किं करवाणि? भवतु नाम मासान्ते एव सम्पूर्णतया दुग्धदोहनं करोमि।
(एवं क्रमेण सप्तदिनानि व्यतीतानि। सप्ताहान्ते मल्लिका प्रत्यागच्छति)
मल्लिका – (प्रविश्य) स्वामिन्! प्रत्यागता अहम्। आस्वादय प्रसादम्।
(चन्दनः मोदकानि खादति वदति च)
चन्दनः – मल्लिके! तव यात्रा तु सम्यक् सफला जाता? काशीविश्वनाथस्य कृपया प्रियं निवेदयामि।
मल्लिका – (साश्चर्यम् ) एवम्। धर्मयात्रातिरिक्तं प्रियतरं किम्?
शब्दार्था: –
अगुलिषु – अंगुलियों पर
गणयन् – गिनते हुए
लप्स्ये – प्राप्त करूँगा
दोहनम् – दुहना (दूध दुहने का काम)
तिष्ठति – रहता है
सम्पूर्णतया – पूरी तरह से
क्रमश: – क्रमानुसार (एक के बाद एक)
प्रत्यागच्छति – वापस आती है
प्रत्यगता – वापस आ गई
आस्वादय – स्वाद (आनंद) लो
प्रियतरम् – अधिक प्यारी।
अर्थ – (तृतीय दृश्य)
चन्दन – (प्रसन्न होकर, अंगुलियों पर गिनता हुआ) अरे! तीन सौ लीटर दूध। इससे तो बहुत धन प्राप्त करूँगा (पाऊँगा)।
(नन्दिनी को देखकर) हे नन्दिनी! तुम्हारी कृपा से तो मैं धनी हो जाऊँगा। (प्रसन्न होकर वह गाय की बहुत सेवा करता है)
चन्दन – (सोचता है) मास (महीने) के अन्त में ही दूध की जरूरत है। यदि हर रोज़ दुहने का काम करता हूँ
तो दूध सुरक्षित नहीं रहता है। अब क्या करूँ? ठीक है, महीने के अन्त में ही पूरी तरह से दूध को दुहने का काम करता हूँ (करूँगा)।
(इस प्रकार क्रमानुसार सात दिन बीत गए। सप्ताह के अन्त में मल्लिका वापस आती है)
मल्लिका – (प्रवेश करके) स्वामी! मैं वापस आ गई। प्रसाद को खाओ।
(चन्दन लड्डुओं को खाता है और बोलता है।)
चन्दन – मल्लिका! तुम्हारी यात्रा तो ठीक प्रकार से सफल हो गई? काशी विश्वनाथ की कृपा से प्रिय निवेदन करता हूँ।
मल्लिका – (आश्चर्य के साथ) ऐसा है! धर्मयात्रा के अतिरिक्त अधिक प्रिय क्या है?
सन्धिः विच्छेदः वा –
पदानि – सन्धिःविच्छेदः
प्रसन्नोभूत्वा – प्रसन्नः + भूत्वा
मासान्ते – मास + अन्ते
सप्ताहान्ते – सप्ताह + अन्ते
प्रत्यागच्छति – प्रति + आगच्छति
प्रत्यागता – प्रति + आगता
साश्चर्यम् – स + आश्चर्यम्
धर्मयात्रातिरिक्तम् – धर्मयात्रा + अतिरिक्तम्
प्रकृति – प्रत्ययोः – विभाजनम्
विशेषण-विशेष्य-चयनम्
उपसर्ग – पदानाञ्च विभाजनम्
5. चन्दनः – ग्रामप्रमुखस्य गृहे महोत्सवः मासान्ते भविष्यति। तत्र त्रिशत-सेटकमितं दुग्धम् अस्माभिः दातव्यम् अस्ति ।
मल्लिका – किन्तु एतावन्मानं दुग्धं कुतः प्राप्स्यामः।
चन्दनः – विचारय मल्लिके! प्रतिदिनं दोहनं कृत्वा दुग्धं स्थापयामः चेत् तत् सुरक्षितं न तिष्ठति। अत एव
दुग्धदोहनं न क्रियते। उत्सवदिने एव समग्रं दुग्धं धोक्ष्यावः।
मल्लिका – स्वामिन्! त्वं तु चतुरतमः। अत्युत्तमः विचारः। अधुना दुग्धदोहनं विहाय केवलं नन्दिन्याः सेवाम् एव करिष्यावः। अनेन अधिकाधिकं दुग्धं मासान्ते प्राप्स्यावः। (द्वावेव धेनोः सेवायां निरतौ भवतः। अस्मिन् क्रमे घासादिकं गुडादिकं च भोजयतः। कदाचित् विषाणयोः तैलं लेपयतः तिलकं धारयतः, रात्रौ नीराजनेनापि तोषयतः)
चन्दनः – मल्लिके! आगच्छ। कुम्भकार प्रति चलावः।
दुग्धार्थं पात्रप्रबन्धोऽपि करणीयः। (द्वावेव निर्गतौ)
अर्थ
चन्दन – गाँव के प्रधान के घर में महीने के अन्त में महोत्सव होगा। वहाँ तीन सौ लीटर दूध हमें देना है।
मल्लिका – किन्तु इतनी मात्रा में दूध हमें कहाँ से मिलेगा?
चन्दन – सोचो मल्लिका! हर रोज दुह करके हम दूध को रखते हैं यदि वह सुरक्षित न रहे तो। इसलिए गाय का दोहन कार्य नहीं किया जा रहा है। उत्सव के दिन ही सारा दूध दुह लेंगे।
मल्लिका – हे स्वामी! तुम तो बहुत चतुर हो। बहुत सुन्दर विचार है। अब दूध दुहना छोड़कर केवल नन्दिनी की
सेवा ही करेंगे। इससे अधिक से अधिक दूध को महीने के अन्त में प्राप्त करेंगे। (दोनों ही गाय की सेवा में लगे होते हैं। इसी तरह वे घास व गुड़ आदि खिलाते हैं। कभी सीगों पर
तेल लगाते हैं, तिलक लगाते हैं, रात में जल आदि से भी सन्तुष्ट करते हैं।)
चन्दन – मल्लिका! आओ। कुंभार के घर की ओर चलते हैं। दूध के लिए बर्तन का प्रबन्ध भी करना है। (दोनों ही निकलते हैं) सन्धिः विच्छेदः वा
सन्धिः विच्छेदः वा –
प्रकृति – प्रत्ययोः – विभाजनम् –
विशेषण-विशेष्य-चयनम् –
उपपदविभक्तीनां प्रयोगः –
पद परिचयः –
6. (चतुर्थं दृश्यम्)
कुम्भकारः – (घटरचनायां लीनः गायति)
ज्ञात्वाऽपि जीविकाहेतोः रचयामि घटानहम्।
जीवनं भङ्गरं सर्वं यथैष मृत्तिकाघटः॥
शब्दार्थाः-
ज्ञात्वा – जानकर
जीविकाहेतोः – जीवन का कारण
मृत्तिकाघट: – मिट्टी का घड़ा
घटान् – घड़ों को
जीवनम् – जीवन
एषः – यह।
अर्थ – (चौथा दृश्य)
कुंभार – (घड़े बनाने में व्यस्त है और गाता है)
मैं जानकर भी जीविका (जीवन के लिए साधन) के कारण ही इन घड़ों को बनाता हूँ। सारा जीवन टूटकर नष्ट होने योग्य हैं जैसे यह मिट्टी का घड़ा टूटकर समाप्त होने योग्य है।
सन्धिः विच्छेदः वा –
पदानि – सन्धिःविच्छेदः
ज्ञात्वाऽपि – ज्ञात्वा + अपि
घटानहम् – घटान् + अहम्
भगुरम् – भम् + गुरम्
यथैष – यथा + एष
विशेषण – विशेष्य – चयनम्
विशेषणम् – विशेष्यः
सर्वम्, भगुरम् – जीवनम्
एष – मृत्तिकाघटः
7. चन्दनः – नमस्करोमि तात! पञ्चदश घटान् इच्छामि। किं दास्यसि?
देवेश – कथं न? विक्रयणाय एव एते। गृहाण घटान्। पञ्चशतोत्तर-रूप्यकाणि च देहि।
चन्दनः – साधु। परं मूल्यं तु दुग्धं विक्रीय एव दातुं शक्यते।
देवेशः – क्षम्यतां पुत्र! मूल्यं विना तु एकमपि घटं न दास्यामि।
मल्लिका – (स्वाभूषणं दातुमिच्छति) तात! यदि अधुनैव मूल्यम् आवश्यकं तर्हि, गृहाण एतत् आभूषणम्।
देवेशः – पुत्रिके! नाहं पापकर्म करोमि। कथमपि नेच्छामि त्वाम् आभूषणविहीनां कर्तुम्। नयतु यथाभिलषितान् घटान्। दुग्धं विक्रीय एव घटमूल्यम् ददातु।
उभौ – धन्योऽसि तात! धन्योऽसि।
शब्दार्था:-
पञ्चदश – पन्द्रह
दास्यसि – दोगे
विक्रयणाय – बेचने के लिए
विक्रीय – बेचकर, दातुम्
शक्यते – दिया जा सकता है
क्षम्यताम् – क्षमा करें
स्वाभूषणम् – अपने ज़ेवर को
अधुनैव – इसी समय ही
गृहाण – ले लो
पुत्रिके – बेटी,
आभूषणविहीनाम् – जेवरों से रहित
नयतु – ले जाओ
यथाभिलाषात् – इच्छानुसार
विक्रीय – बेचकर।
अर्थ
चन्दन – हे तात! नमस्कार करता हूँ। पन्द्रह घड़े चाहता हूँ। क्या दोगे? ।
देवेश – क्यों नहीं? बेचने के लिए ही हैं ये। घड़ों को ले लो। और पाँच सौ रुपये दे दो।
चन्दन – ठीक है। परन्तु मूल्य (दाम) तो दूध को बेचकर ही दिया जा सकता है।
देवेश – हे पुत्र क्षमा करो! बिना मूल्य (दान) के एक भी घड़ा नहीं दूंगा।
मल्लिका – (अपने आभूषणों को देना चाहती है) हे तात! यदि अभी कीमत देना आवश्यक (ज़रूरी) है तो, यह जेवर ले लो।
देवेश – बेटी! मैं पाप का काम नहीं करता हूँ। तुम्हें आभूषण विहीन कभी भी नहीं करना चाहता हूँ। इच्छानुसार
घड़ों को ले जाओ। दूध को बेचकर ही घड़ों की कीमत दे देना।
दोनों – तात! आप धन्य हो! धन्य हो।
सन्धिः विच्छेदः वा –
पदानि – सन्धिःविच्छेदः
नमस्करोमि – नमः + करोमि
पञ्चशतोत्तर – पञ्चशत + उत्तर
मूल्यं विना – मूल्यम् + विना
स्वाभूषणम् – स्व + आभूषणम्
अधुनैव – अधुना + एव
नाहम् – न + अहम्
नेच्छामि – न + इच्छामि
यथाभिलषितान् – यथा + अभिलषितान्
धन्योऽसि – धन्यो + असि / धन्यः + असि उपसर्गचयनम्
विशेषण-विशेष्य-चयनम् –
विशेषणानि – विशेष्याः
पञ्चदश – घटान्
पञ्चशतोत्तर – रूप्यकाणि
एकम् – घटम्
आवश्यकम् – मूल्यम्
एतत् – आभूषणम्
आभूषणविहीनाम् – त्वाम्
यथाभिलषितान् – घटान्
8. (पञ्चमं दृश्यम्)
(मासानन्तरं सन्ध्याकालः। एकत्र रिक्ताः नूतनघटाः सन्ति। दुग्धक्रेतारः अन्ये च ग्रामवासिनः अपरत्र आसीनाः)
चन्दनः – (धेनुं प्रणम्य, मङ्गलाचरणं विधाय, मल्लिकाम् आह्वयति) मल्लिके! सत्वरम् आगच्छ।
मल्लिका – आयामि नाथ! दोहनम् आरभस्व तावत्।।
चन्दनः – (यदा धेनोः समीपं गत्वा दोग्धुम् इच्छति, तदा धेनुः पृष्ठपादेन प्रहरति। चन्दनश्च पात्रेण सह पतति) नन्दिनि! दुग्धं देहि। किं जातं ते? (पुनः प्रयासं करोति) (नन्दिनी च पुनः पुनः पादप्रहारेण ताडयित्वा चन्दनं रक्तरञ्जितं करोति) हा! हतोऽस्मि। (चीत्कारं कुर्वन् पतति) (सर्वे आश्चर्येण
चन्दनम् अन्योन्यं च पश्यन्ति)
शब्दार्थाः
मासान्तरम् – महीने भर बाद
रिक्ताः – खाली
एकत्र – इकट्ठा
दुग्धक्रेतारः – दूध खरीदने वाले
अपरत्र – दूसरी ओर
आसीनाः – खड़े हैं
विधाय – करके
आह्वयति – बुलाता है
सत्वरम् – शीघ्र/जल्दी
दोहनम् – दुहने के काम को
आरभस्व – शुरू करो
दोग्धुम् – दुहना
पृष्ठपादेन – पीछे के पैर से
प्रहरति – मारती है
ते – तुम्हें
जातम् – हो गया है
पादप्रहारेण – पैर की चोट से
रक्तरञ्जितम् – लहुलुहान
ततोऽस्मि – मारा गया हूँ
चीत्कारम् – चीख,
अन्योन्यम्-एक-दूसरे को।
(पाँचवाँ दृश्य)
अर्थ-
(महीने भर बाद का सायंकाल। इकट्ठे ही खाली नये घड़े हैं। दूध खरीदने वाले और दूसरे गाँववासी दूसरी ओर खड़े हैं।)
चन्दन – (गाय को प्रणाम करके, मंगलाचरण (पूजा) करके, मल्लिका को बुलाता है) हे मल्लिका! जल्दी आओ।
मल्लिका – आती हूँ स्वामी! तब तक दुहना शुरू करो।
चन्दन: (जब गाय के पास जाकर दुहना चाहता है, तब गाय पिछले पैर से मारती है और चन्दन बर्तन के साथ गिरता है) हे नन्दिनी! दूध दो। तुम्हें क्या हो गया? फिर से कोशिश करता है) (और नन्दिनी बार-बार पैर की चोट से मारकर चन्दन को लहुलुहान कर देती है) हाय! मैं मार दिया गया। (चीखते हुए गिरता है) (सभी आश्चर्य से चन्दन और एक-दूसरे को देखते हैं)
सन्धिः विच्छेदः वा –
पदानि – सन्धिः विच्छेदः
मासानन्तरम् – मास + अनन्तरम्
मङ्गलाचरणम् – मङ्गल + आचरणम्
चन्दनश्च – चन्दनः + च
हतोऽस्मि – हतो + अस्मि/हतः + अस्मि
9. मल्लिका – (चीत्कारं श्रुत्वा, झटिति प्रविश्य) नाथ! किं जातम्? कथं त्वं रक्तरञ्जितः?
चन्दनः – धेनुः दोग्धुम् अनुमतिम् एव न ददाति। दोहनप्रक्रियाम् आरभमाणम् एव ताडयति माम्। (मल्लिका धेनुं स्नेहेन वात्सल्येन च आकार्य दोग्धुं प्रयतते। किन्तु, धेनुः दुग्धहीना एव इति अवगच्छति।) मल्लिका – (चन्दनं प्रति) नाथ! अत्यनुचितं कृतम् आवाभ्याम् यत्, मासपर्यन्तं धेनोः दोहनं कृतम्। सा पीडाम् अनुभवति। अत एव ताडयति।
चन्दनः – देवि! मयापि ज्ञातं यत्, अस्माभिः सर्वथा अनुचितमेव कृतं यत्, पूर्णमासपर्यन्तं दोहनं न कृतम्। अत एव, दुग्धं शुष्कं जातम्। सत्यमेव उक्तम्
कार्यमद्यतनीयं यत् तदद्यैव विधीयताम्।
विपरीते गतिर्यस्य स कष्टं लभते ध्रुवम्॥
मल्लिका – आम् भर्तः! सत्यमेव। मयापि पठितं यत्
सुविचार्य विधातव्यं कार्यं कल्याणकाटिणा।
यः करोत्यविचार्यैतत् स विषीदति मानवः॥
किन्तु प्रत्यक्षतया अद्य एव अनुभूतम् एतत्।
सर्वे, – दिनस्य कार्यं तस्मिन्नेव दिने कर्तव्यम्। यः एवं न करोति सः कष्टं लभते ध्रुवम्।
शब्दार्थाः –
चीत्कारम् – चीख को
झटिति – शीघ्र (जल्दी)
जातम् – हुआ
आरभमाणम् – शुरू करने वाले को
स्नेहेन – प्रेम से
वात्सल्येन – पुचकार से
आकार्य – बुलाकर
दुग्धहीना – दूध से रहित
अवगच्छति – समझती है
मासपर्यन्तम् – महीने भर तक
दोहनम् – दुहना
ज्ञातम् – जान लिया
पूर्णमासपर्यन्तम् – पूरे महीने तक
शुष्कम् – सूखा (सूखता)
यत् – जो
अद्यतनीयं – आज का
तत् – उसे
अद्यैव – आज ही
विधीयताम् – करना चाहिए
विपरीते – उल्टा/उल्टी/ विरुद्ध
लभते – पता है
ध्रुवम् निश्चय से, भर्तः!-हे स्वामी
सुविचार्य – अच्छी तरह
सोच – विचार करके
विद्यातव्यम् – करना चाहिए
कल्याणकाक्षिणा – कल्याण चाहने वाले के द्वारा
अविचार्य – बिना विचार करके
विषीदति – दु:खी होता है
मानव – मनुष्य
प्रत्यक्षतया – प्रत्यक्ष रूप से
कर्तव्यम् – करना चाहिए, ध्रुवम् निश्चय से
अर्थ
मल्लिका – (चीख को सुनकर, जल्दी प्रवेश करके) स्वामी! क्या हुआ? कैसे तुम लहुलुहान हो गए?
चन्दन – गाय दूध दुहने की अनुमति ही नहीं दे रही है। दुहने का काम शुरू करते ही मुझे मारती है।
(मल्लिका गाय को प्यार और पुचकार से बुलाकर दुहने की कोशिश करती है किन्तु गाय तो दुधविहीन है यह समझ जाती है।)
मल्लिका – (चन्दन की ओर) हे स्वामी! हम दोनों ने बहुत अनुचित किया कि महीने भर तक गाय का दोहन नहीं
किया। वह पीड़ा (दर्द) को अनुभव कर रही है। इसलिए मारती है।
चन्दन – हे देवी! मुझे भी लगा कि हमने पूरी तरह से अमुचित ही किया कि पूरे महीने तक दोहन नहीं किया। इसीलिए दूध सूख गया। सत्य ही कहा गया है-आज का जो काम है, उसे आज ही करना चाहिए। जिसकी गति (काम करने का तरीका) उल्टी होती है, वह निश्चय ही कष्ट पाता है।
मल्लिका – हाँ स्वामी! सच ही। मैंने भी पढ़ा है यत्-कल्याण चाहने वाले मनुष्य के द्वारा अच्छी तरह से सोच-विचार कर काम को करना चाहिए। जो व्यक्ति बिना विचार किए काम करता है, वह दुखी होता है। किन्तु प्रत्यक्ष रूप से आज ही यह अनुभव किया। दिन का काम उसी दिन ही करना चाहिए। जो ऐसा नहीं करता है वह निश्चित कष्ट को अनुभव करता है।
सन्धिः विच्छेदः वा –
पदानि – सन्धिःविच्छेदः/सन्धिः
किं जातम् – किम् + जातम्
अत्यनुचितम् – अति + अनुचितम्
मयापि – मया + अपि
तदचैव – तत् + अद्य + एव
गतिर्यस्य – गतिः + यस्य
स कष्टम् – स: + कष्टम्
कष्टं लभते – कष्टम् + लभते
अद्य + एव – अद्यैव
तस्मिन्नेव – तस्मिन् + एव
कल्याणकाक्षिणा – कल्याणकाम् + क्षिणा
करोत्यविचार्यैतत् – करोति + अविचार्य + एतत्
विधातव्यं कार्यम् – विधातव्यम् + कार्यम्
विशेषण – विशेष्य – चयनम्
विशेषणम् – विशेष्यः
रक्तरञ्जितः – त्वम्
आरभमाणम् – माम्
अद्यतनीयम् – कार्यम्
ध्रुवम् – कष्टम्
दुग्धहीना – धेनुः
पूर्णमासपर्यन्तम् – दोहनम्
शुष्कम् – दुग्धम्
प्रकृति-प्रत्ययो:-विभाजनम् पदानि
10. (जवनिका पतनम्)
(सर्वे मिलित्वा गायन्ति)
आदानस्य प्रदानस्य कर्तव्यस्य च कर्मणः।
क्षिप्रमक्रियमाणस्य कालः पिबति तद्रसम्॥
शब्दार्थाः-
जवनिका – परदा
पतनम् – गिरता है
आदानस्य – लेने के
प्रदानस्य – देने के
कर्तव्यस्य – करने योग्य
कर्मणः – कर्म के
क्षिप्रम् – शीघ्र
अक्रियामाणस्य – न करने वाले के
काल: – समय
पिबति – पी जाता है
तत् – उसके
रसम् – रस/आनन्द को।।
अर्थ —
(परदा गिरता है।
(सभी मिलकर गाते हैं)
लेने के, देने के और कहने योग्य (अन्य) कर्म के शीघ्र न किए जाने पर समय उसका रस (आनन्द) पी जाता
Class 9 Sanskrit Chapter 4 कल्पतरूः Summary Notes
कल्पतरूः Summary
‘वेतालपञ्चविंशतिः’ मनोहर एवं आश्चर्यजनक घटनाओं से युक्त कथाओं का अनोखा संग्रह है। प्रस्तुत पाठ इसी संग्रह से लिया गया है। इसके द्वारा जीवन-मूल्यों की स्थापना की गई है। इस कथा में पर्वतराज हिमालय के शिखर पर स्थित कंचनपुर नामक नगर का वर्णन किया गया है। उसमें जीमूतकेतु नाम का विद्याधरों का स्वामी रहता था। उसके उद्यान में कल्पतरु वृक्ष था। जीमूतकेतु के यहाँ जीमूतवाहन नाम का पुत्र हुआ। वह स्वभाव से अत्यधिक दयालु और परोपकारी था। एक दिन उसने मंत्री जनों की सभा की और उनसे अपने हित की बात पछी। सभी ने कहा कि
वंश परंपरा से प्राप्त है। यह सभी मनोरथों को पूरा करने वाला है। तुम इसकी आराधना करो। तब जीमूतवाहन ने अपने पिता के पास जाकर कहा कि मैं इस कल्पवृक्ष से अपने मनोरथों की पूर्ति चाहता हूँ। उसके पिता ने उसको कल्पवृक्ष की आराधना करने की अनुमति दे दी। तत्पश्चात् जीमूतवाहन ने कल्पवृक्ष के पास जाकर प्रार्थना किया-देव, आप मेरी इच्छा पूर्ति करें। मेरी इच्छा है कि इस पृथ्वी पर कोई भी निर्धन न बचे। यह सुनकर कल्पवृक्ष ने प्रसन्न होकर धन की वर्षा की। इससे जीमूतवाहन का यश सर्वत्र फैल गया।
कल्पतरूः Word Meanings Translation in Hindi
1. अस्ति हिमवान् नाम सर्वरत्नभूमिः नगेन्द्रः। तस्य सानो: उपरि विभाति कञ्चनपुरं नाम नगरम्। तत्र जीमूतकेतुः इति श्रीमान् विद्याधरपतिः वसति स्म। तस्य गृहोद्याने कुलक्रमागतः कल्पतरुः स्थितः। स राजा जीमूतकेतुः तं कल्पतरुम् आराध्य तत्प्रसादात् च बोधिसत्वांशसम्भवं जीमूतवाहनं नाम पुत्रं प्राप्नोत्। स जीमूतवाहनः महान् दानवीरः सर्वभूतानुकम्पी च अभवत्। तस्य गुणैः प्रसन्नः स्वसचिवैश्च प्रेरितः राजा कालेन सम्प्राप्तयौवनं तं यौवराज्ये अभिषिक्तवान्। कदाचित् हितैषिणः पितृमन्त्रिणः यौवराज्ये स्थितं तं जीमूतवाहनं उक्तवन्तः-“युवराज! योऽयं सर्वकामदः कल्पतरुः तवोद्याने तिष्ठति स तव सदा पूज्यः। अस्मिन् अनुकूले स्थिते सति शक्रोऽपि अस्मान् बाधितुं न शक्नुयात्” इति।
शब्दार्था: –
नगेन्द्रः – पर्वतों का राजा
सम्प्राप्तयौवनम् – जवानी को प्राप्त
सानो: उपरि – चोटी के ऊपर
यौवराज्ये – युवराज के पद पर
विभाति – सुशोभित है
अभिषिक्तवान् – अभिषेक कर दिया
वसति स्म – रहता था
कदाचित् – किसी समय
कुंलक्रमागमः – कुल परंपरा से आया हुआ
सर्वकामदः – सभी की कामनाओं को पूर्ण करने वाला
आराध्य – आराधना करके
अस्मिन् – इसके
तत्प्रसादात् – उसकी कृपा से
अनुकूले – अनुकूल
सम्भवम् – उत्पन्न हुए
स्थिते – रहने पर
प्राप्नोत् – प्राप्त किया
बाधितुम् – दुखी करने में, सर्वभूत
अनुकम्पी – सभी प्राणियों पर दया करने वाला
नशक्नुयात् – समर्थ नहीं होवे
प्रेरितः – प्रेरणा दिया गया
अर्थ-
सब रत्नों की भूमि, पर्वतों में श्रेष्ठ हिमालय नामक पर्वत है। उसके शिखर (चोटी) पर कंचनपुर नामक नगर सुशोभित है। वहाँ विद्याधरों के राजा श्रीमान जीमूतकेतु रहते थे। उनके घर (महल) के बगीचे में वंश परंपरा से आ रहा कल्पवृक्ष था। उस राजा ने उस कल्पवृक्ष की आराधना करके और उसकी कृपा से बोधिसत्व के अंश से उत्पन्न जीमूतवाहन नामक पुत्र को प्राप्त किया। वह महान, दानवीर और सभी प्राणियों पर कृपा करने वाला हुआ। उसके गुणों से प्रसन्न और अपने मंत्रियों से प्रेरित राजा ने समय पर जवानी को प्राप्त उसे (राजकुमार को) युवराज के पद पर अभिषिक्त किया। युवराज पद पर बैठे हुए उस जीमूतवाहन को (एक बार) किसी समय हितकारी पिता के मंत्रियों ने कहा-“हे युवराज! जो यह सब कामनाओं को पूरा करने वाला कल्पवृक्ष आपके बगीचे में खड़ा है, वह आपके लिए सदैव पूज्य है। इसके अनुकूल होने पर इंद्र भी हमें दुखी नहीं कर सकता है”।
अव्ययानां वाक्येषु प्रयोगः –
पदानि – वाक्येषु प्रयोगः
उपरि – गृहस्य उपरि खगाः तिष्ठति।
तत्र – त्वं तत्र गत्वा स्वपाठं पठ।
इति – अहं कथयामि इति।
च – रामः लक्ष्मणः च वनम् अगच्छताम्।
कदाचित् – ऋषिः कदाचित् अपि असत्यं न अवदत्।
अपि – त्वम् अपि एतत् कार्यकर्तुं समर्थोऽसि।
विशेषण-विशेष्य-चयनम् –
सर्वरत्नभूमिर्नगेन्द्रः – हिमवान्
कुलक्रमागतः – कल्पतरुः
बोधिसत्त्वांशसम्भवम् – जीमूतवाहनम्
प्रसन्नः/प्रेरितः – राजा
सर्वकामदः – कल्पतरुः
अनुकूले स्थिते – अस्मिन्
श्रीमान्/विद्याधरपतिः – जीमूतकेतुः
सः/ राजा – जीमूतकेतुः
महान्/दानवीर:/सर्वभूतानुकम्पी – सः
हितैषिभिः – पितृमान्त्रिभिः
पूज्यः – सः
एतत् आकर्ण्य जीमूतवाहनः अचिन्तयत्-“अहो ईदृशम् अमरपादपं प्राप्यापि पूर्वैः पुरुषैः अस्माकं तादृशं फलं किमपि न प्राप्तम्। किन्तु केवलं कैश्चिदेव कृपणैः कश्चिदपि अर्थः अर्थितः। तदहम् अस्मात् कल्पतरोः अभीष्टं साधयामि” इति। एवम् आलोच्य सः पितुः अन्तिकम् आगच्छत्। आगत्य च सुखमासीनं पितरम् एकान्ते न्यवेदयत्-“तात! त्वं तु जानासि एव यदस्मिन् संसारसागरे आशरीरम् इदं सर्व धनं वीचिवत् चञ्चलम्। एकः परोपकार एव अस्मिन् संसारे अनश्वरः यो युगान्तपर्यन्तं यशः प्रसूते। तद् अस्माभिः ईदृशः कल्पतरुः किमर्थ रक्ष्यते? यैश्च पूर्वैरयं ‘मम मम’ इति आग्रहेण रक्षितः, ते इदानीं कुत्र गताः? तेषां कस्यायम्? अस्य वा के ते? तस्मात् परोपकारैकफलसिद्धये त्वदाज्ञया इमं कल्पपादपम् आराधयामि।
शब्दार्थाः –
आकर्ण्य – सुनकर
अन्तिकम् – समीप
असीनम् – बैठे हुए (को)
संसारसागरे – संसार रूपी सागर में
प्राप्यापि – प्राप्त करके भी
आशरीरम् – शरीर से लेकर
किमपि – कुछ भी
वीचिवत् – लहरों की तरह
अनश्वरः – नष्ट न होने वाला
कैश्चित् – कुछ (के द्वारा)
युगान्तपर्यन्तम् – युग के अंत तक
कृपणैः – कंजूसों के द्वारा
प्रसूते – पैदा करता है
अर्थः – धन
पूर्वैः – पूर्वजों के द्वारा
अर्थितः – कमाया गया
आग्रहेण – इच्छा से
अभीष्टम् – प्रिय
एकफलसिद्धये – एकमात्र फल की प्राप्ति के लिए
आलोच्य – सोचकर
आराधयामि – आराधना करता हूँ।
अर्थ –
यह सुनकर जीमूतवाहन ने मन में सोचा-“अरे ऐसे अमर पौधे को प्राप्त करके भी हमारे पूर्वजों के द्वारा वैसा कोई भी फल नहीं प्राप्त किया गया, किंतु केवल कुछ ही कंजूसों ने ही कुछ धन प्राप्त किया। इस कल्पवृक्ष से तो मैं अपनी प्रिय इच्छा को पूरी करूँगा।” ऐसा सोचकर वह पिता के पास आया। (वहाँ) आकर सुखपूर्वक बैठे हुए पिता को एकान्त में निवेदन किया-“पिता जी! आप तो जानते ही हैं कि इस संसार रूपी सागर में इस शरीर से लेकर सारा धन लहरों की तरह चंचल है।
एक परोपकार ही इस संसार में अनश्वर (नष्ट नहीं होने वाला) है जो युगों तक यश पैदा करता (देता) है। तो हम ऐसे कल्पवृक्ष की किसलिए रक्षा करते हैं? और जिन पूर्वजों के द्वारा यह (मेरा-मेरा) इस आशा से रक्षा किया गया, वे (पूर्वज) इस समय कहाँ गए? उनमें से किसका यह है? अथवा इसके वे कौन हैं? तो परोपकार के एकमात्र फल की सिद्धि (प्राप्ति) के लिए आपकी आज्ञा से इस कल्पवृक्ष की आराधना करता हूँ।
विशेषण – विशेष्य चयनम् –
विशेषणम् – विशेष्यः
ईदृशम् – अमरपादपम्
तादृशम् – फलम्
पूर्वैः – पुरुषैः/यैः
कैश्चित् – कृपणैः
अस्मात् – कल्पतरोः
सुखमासीनम् – पितरम्
सर्वम्, चञ्चलम् – धनम्
अभीष्टम् – मनोरथम्
अस्मिन् – सुखमासीनम्
एकः, अनश्वरः – परोपकारः
इमम् – कल्पपापम्’
अव्ययानां वाक्येषु प्रयोगः –
पदानि – वाक्येषु प्रयोगः
अपि – त्वम् अपि मया सह विद्यालयं चल।
किन्तु – किन्तु देवः अत्र एव तिष्ठतु।
एव – सः एव मम बन्धुः वर्तते।
एवं – एवं दुष्कर्म त्वं कदापि मा कुर्याः।
च – रामः लक्ष्मणः च विद्यालयम् अगच्छताम्।
तु – सः तु मम पिता एवास्ति।
कुत्र – बुद्धिम् विना कुत्र जनानां शोभा?
वा – अधुना त्वं गृहं गच्छ आपणं वा।
इति – तस्य भाषा मधुरा अस्ति इति।
अथ पित्रा ‘तथा’ इति अभ्यनुज्ञातः स जीमूतवाहनः कल्पतरुम् उपगम्य उवाच-“देव! त्वया अस्मत्पूर्वेषाम् अभीष्टाः कामाः पूरिताः, तन्ममैकं कामं पूरय। यथा पृथिवीम् अदरिद्राम् पश्यामि तथा करोतु देव” इति। एवं वादिनि जीमूतवाहने “त्यक्तस्त्वया एषोऽहं यातोऽस्मि” इति वाक् तस्मात् तरोः उदभूत्। क्षणेन च स कल्पतरुः दिवं समुत्पत्य भुवि तथा वसूनि अवर्षत् यथा न कोऽपि दुर्गत आसीत्। ततस्तस्य जीमूतवाहनस्य सर्वजीवानुकम्पया सर्वत्र यशः प्रथितम्।
शब्दार्थाः –
अथ – इसके बाद
कामम् – कामना को
तथा – वैसे ही करो
अदरिद्राम् – गरीब रहित
अभ्यनुज्ञातः – आज्ञा को प्राप्त किया
वादिनि – कहने पर
उपगम्य – पास जाकर
उदभूत् – निकली
अस्मत्पूर्वेषा – हमारे पूर्वजों की,
समुत्पत्य – ऊपर उठकर
अभीष्टाः – प्रिय
वसूनि – रत्नों की
कामाः – कामनाएँ
दुर्गतः – ग़रीब।।
अर्थ –
इसके बाद पिता के द्वारा ‘वैसा ही करो’ ऐसी आज्ञा प्राप्त किया हुआ, वह जीमूतवाहन कल्पवृक्ष के पास जाकर बोला- “हे देव (भगवन्)! आपने हमारे पूर्वजों की सारी प्रिय कामनाएँ पूर्ण की हैं, तो मेरी एक कामना को पूरा कीजिए। जैसे पृथ्वी पर गरीबों को न देखू वैसे आप भगवन् कीजिए”। इस प्रकार जीमूतवाहन के कहने पर “तुम्हारे द्वारा छोड़ दिया गया यह मैं जा रहा हूँ” इस प्रकार की आवाज़ उस पेड़ से हुई। और क्षण भर में वह कल्पवृक्ष आकाश में उठकर भूमि पर वैसे रत्नों को बरसाने लगा, जिससे कोई भी दुर्गत (गरीब) नहीं रह गया। उसके बाद उस जीमूतवाहन की सभी जीवों पर कृपा करने के बाद सब जगह यश फैल गया।
विशेषण – विशेष्य – चयनम् –
विशेषणम् – विशेष्यः
अभ्यनुज्ञातः सः – जीमूतवाहनः
एकम् – कामम्
वादिनि – जीमूतवाहने
तस्मात् – तरोः
अभीष्टाः – कामाः
अदरिद्राम् – पृथ्वीम्
एषः त्यक्तः – अहम्
दुर्गतः – कोऽपि
अव्ययानां वाक्येषु प्रयोगः –
अव्ययः वाक्य प्रयोगः
अथ – अथ रामः स्वगुरुम् अवदत्।
यथा-तथा – यथा अहं कथयामि तथा त्वं कुरु।
च – विद्यालये बालकाः बालिकाः च पठन्ति।
सर्वत्र – रामस्य यशः सर्वत्र प्रासरत्।
इति – त्वं तत्र कथं गच्छसि इति?
एवम् – तेन एवम् कदापि न वक्तव्यम्।
ततः – ततः देवदत्तः स्वगृहं प्राविशत्। सर्वत्र
Class 9 Sanskrit Chapter 5 सूक्तिमौक्तिकम् Summary Notes
सूक्तिमौक्तिकम् Summary
नीति-ग्रंथों की दृष्टि से संस्कृत साहित्य काफी समृद्ध है। इन ग्रंथों में सरल और सारगर्भित भाषा में नैतिक शिक्षाएँ दी गई हैं। इनके द्वारा मनुष्य अपना जीवन सफल और समृद्ध बना सकता है। ऐसे ही मूल्यवान कुछ सुभाषित इस पाठ में संकलित हैं, जिनका सार इस प्रकार है
- मनुष्य को अपने आचरण की रक्षा करनी चाहिए। धन नश्वर है। वह कभी आता है तो कभी चला
- जैसा व्यवहार स्वयं को अच्छा न लगे, वैसा व्यवहार दूसरों के साथ नहीं करना चाहिए।
- मीठे बोल सभी को प्रिय लगते हैं। अतः मीठा बोलना चाहिए। मनुष्य को बोलने में कंजूसी नहीं करनी चाहिए।
महापुरुष अपने लिए कुछ नहीं करते हैं। वे सदा परोपकार करते रहते हैं। कारण कि महापुरुषों का पृथ्वी पर आगमन परोपकार के लिए ही होता है। - मनुष्य को गुणों के लिए यत्न करना चाहिए। गुणों के द्वारा वह महान बनता है। . सज्जन लोगों की मित्रता स्थायी होती है, जबकि दुर्जन लोगों की मित्रता अस्थायी।
- हंस तालाब की शोभा होते हैं। यदि किसी तालाब में हंस नहीं हैं तो यह उस तालाब के लिए हानिकर है।
- गुणज्ञ व्यक्ति को पाकर गुण गुण बन जाते हैं, परंतु निर्गुण को प्राप्त करके वे ही गुण दोष बन जाते हैं।
सूक्तिमौक्तिकम् Word Meanings Translation in Hindi
1. वृत्तं यत्नेन संरक्षेद् वित्तमेति च याति च।
अक्षीणो वित्ततः क्षीणो वृत्ततस्तु हतो हतः॥ -मनुस्मृतिः
शब्दार्थाः-
वित्तम् – धन, ऐश्वर्य,
वृत्तम् – आचरण, चरित्र
अक्षीणः – नष्ट नहीं होता
क्षीणः – नष्ट होना
वृत्ततः – आचरण से
हतः – नष्ट हो जाना
एति – आता है
याति – जाता है
संरक्षेत् – रक्षा करनी चाहिए
यत्नेन – प्रयत्नपूर्वक।
अर्थ- हमें अपने आचरण की प्रयत्नपूर्वक रक्षा करनी चाहिए, क्योंकि धन तो आता है और चला जाता है, धन के नष्ट हो जाने पर मनुष्य नष्ट नहीं होता है। परंतु चरित्र या आचरण के नष्ट हो जाने पर मनुष्य भी नष्ट हो जाता है।
अव्ययानां वाक्येषु प्रयोगः –
पदानि – वाक्येषु प्रयोगः
च (और) – वित्तं आयाति याति च।
तु (तो) – वृत्ततः क्षीणः तु हतो हतः।
विलोमपदानि –
पदानि – विलोमपदानि
एति – याति
अक्षीणः – क्षीणः
2. श्रूयतां धर्मसर्वस्वं श्रुत्वा चैवावधार्यताम्।।
आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्॥ -विदुरनीतिः
शब्दार्थाः –
श्रूयता – सुनो
धर्मसर्वस्वं – धर्म के तत्व को
श्रुत्वा – सुनकर
अवधार्यताम् – ग्रहण करो, पालन करो,
प्रतिकूलानि – विपरीत
परेषाम् – दूसरों के प्रति
समाचरेत् – आचरण नहीं करना चाहिए
आत्मन: – अपने।
अर्थ-
धर्म के तत्व को सुनो और सुनकर उसको ग्रहण करो, उसका पालन करो। अपने से प्रतिकूल व्यवहार का आचरण दूसरों के प्रति कभी नहीं करना चाहिए अर्थात् जो व्यवहार आपको अपने लिए पसंद नहीं है, वैसा आचरण दूसरों के साथ नहीं करना चाहिए।
अव्ययानां वाक्येषु प्रयोगः –
पदानि – वाक्येषु प्रयोगः
न (नहीं) – आत्मनः परेषां न समाचरेत्।
पर्यायपदानि –
पदानि – पर्यायपदानि
धर्मसर्वस्वम् – कर्त्तव्यसारः
समाचारेत् – आचरणं कर्त्तव्यम्
प्रतिकूलानि – विपरीतानि
विपर्ययपदानि
श्रूयताम् – वदताम्
प्रतिकूलानि – अनुकूलानि
3. प्रियवाक्यप्रदानेन सर्वे तुष्यन्ति जन्तवः।
तस्माद् तदेव वक्तव्यं वचने का दरिद्रता। -चाणक्यनीतिः
शब्दार्था:-
प्रियवाक्यप्रदानेन – प्रिय वाक्य बोलने से
तुष्यन्ति – प्रसन्न होते हैं
जन्तवः – प्राणी
वक्तव्यम् – कहने चाहिए
वचने – बोलने में
दरिद्रता – गरीबी, कंजूसी।
अर्थ- प्रिय वचन बोलने से सब प्राणी प्रसन्न होते हैं तो हमें हमेशा मीठा ही बोलना चाहिए। मीठे वचन बोलने में कंजूसी नहीं करनी चाहिए।
विशेषण – विशेष्य – चयनम् –
विशेष्यः – विशेषणम्
तत् – वक्तव्य
का – दरिद्रता
सर्वे – जन्तवः
पर्यायपदानि –
पदानि – विलोमपदानि
तुष्यन्ति – प्रसन्नाः भवन्त
प्रियं – मधुरं
वक्तव्यम् – कथनीयम्
विलोमपदानि –
पदानि – विलोमपदानि
वक्तव्यम् – श्रवणीयम्
तुष्यन्ति – रोदन्ति
प्रियं – कट
4. पिबन्ति नद्यः स्वयमेव नाम्भः।
स्वयं न खादन्ति फलानि वृक्षाः।
नादन्ति सस्यं खल वारिवाहाः
परोपकाराय सतां विभूतयः॥ – सुभाषितरत्नभाण्डागारम्
शब्दार्था:-
नद्यः – नदियाँ
अम्भः – पानी
पिबन्ति – पीती हैं
वृक्षाः – पेड़
खादन्ति – खाते हैं
खलु – निश्चित ही
वारिवाहा: – बादल
सस्य – अनाज
अदन्ति – खाते हैं
सतां – सज्जनों की
विभूतयः – धन – संपत्ति
परोपकाराय – दूसरों की भलाई के लिए।
अर्थ- नदियाँ अपना पानी स्वयं नहीं पीतीं। पेड़ अपने फल स्वयं नहीं खाते, निश्चित ही बादल अनाज (फसल) को नहीं खाते (इसी प्रकार) सज्जनों (श्रेष्ठ लोगों) की धन-सम्पत्तियाँ दूसरों के लिए ही होती हैं।
अव्ययानां वाक्येषु प्रयोगः –
पदानि – वाक्येषु प्रयोगः
न – नद्यः जलं न पिबन्ति।
खलु (निश्चित ही) – खलु वारिवाहाः सस्यं न खादन्ति।
स्वयं (अपना) – स्वकार्यं स्वयं कुरु।
पर्यायपदानि –
पदानि – पर्यायपदानि
वारिवाहाः – मेघाः
अम्भः – जलं, वारि
अदन्ति – खादन्ति
विभूतयः – समृद्धयः
वृक्षाः – तरवः, महीरुहाः
5. गुणेष्वेव हि कर्तव्यः प्रयत्नः पुरुषैः सदा।
गुणयुक्तो दरिद्रोऽपि नेश्वरैरगुणैः समः॥ – मृच्छकटिकम्
शब्दार्था:-
गुणेषु – गुणों में
प्रयत्नः – कोशिश
पुरुषैः – पुरुषों के द्वारा
कर्तव्यः – करना चाहिए
हि – निश्चित ही
सदा – हमेशा
गुणयुक्तः – गुणवान्
दरिद्रः – गरीब
अपि – भी
ईश्वरैः – ऐश्वर्यशाली
समः – समान
न – नहीं
गुणैः – गुणों से
अर्थ – मनुष्य को सदा गुणों को ही प्राप्त करने का प्रयत्न करना चाहिए। गरीब होता हुआ भी वह गुणवान व्यक्ति ऐश्वर्यशाली गुणहीन के समान नहीं हो सकता (अर्थात् वह उससे कहीं अधिक श्रेष्ठ होता है।)
अव्ययानां वाक्येषु प्रयोगः –
वाक्येषु – वाक्येषु प्रयोगः
एव (ही) – ईश्वरः सर्वत्र एव अस्ति।
हि (निश्चित ही) – त्वम् ह्यः हि मम गृहम् आगतवान्।
समः (समान) – श्रेष्ठः जनः ईश्वरेण समः भवति।
पर्यायपदानि –
पदानि – पर्यायपदानि
दरिद्रः – निर्धनः
गुणयुक्तः – गुणसम्पन्नः
समः – समानः
विलोमपदानि –
पदानि – पर्यायपदानि
अगुणैः – सगुणैः
सदा – कदाचित्
गुणयुक्तः – गुणहीनः
समः – असमः
6. आरम्भगुर्वी क्षयिणी क्रमेण
लघ्वी पुरा वृद्धिमती च पश्चात्।
दिनस्य पूर्वार्द्धपरार्द्धभिन्ना
छायेव मैत्री खलसज्जनानाम॥ – नीतिशतकम
शब्दार्थाः-
आरम्भगुर्वी – आरंभ में लंबी
क्रमेण – धीरे-धीरे
क्षयिणी – घटते स्वभाव वाली
पुरा – पहले
लघ्वी – छोटी
वद्धिमती – लंबी होती हुई
पूर्वार्द्ध – पूर्वाह्न
अपरार्द्ध – अपराह्न
छायेव – छाया के समान, भिन्न
‘खल – दुष्ट
सज्जनानाम् – सज्जनों की।
अर्थ – आरंभ में लंबी फिर धीरे-धीरे छोटी होने वाली तथा पहले छोटी फिर धीरे-धीरे बढ़ने वाली पूर्वाह्न तथा अपराह्न काल की छाया की तरह दुष्टों और सज्जनों की मित्रता अलग-अलग होती है।
विशेषण – विशेष्य चयनम् –
विशेषणम् – विशेष्यः
गुर्वी/लघ्वी – मैत्री
अव्ययानां वाक्येषु प्रयोगः –
पदानि – वाक्येषु प्रयोगः
पुरा (पहले) – पुरा भारतस्य नाम आर्यावर्तः आसीत्।
पश्चात् (बाद) – पश्चात् आर्यावर्तः नाम भारतम् अभवत्।
पर्यायपवानि –
पवानि – पर्यायपवानि
आरम्भगुर्वी – आद्यौ दीर्घा
वृद्धिमती – वृद्धिम् उपगता
खल – दुष्ट
पुरा – प्राचीनकाले
क्षयिणी – क्षयशीला
पूर्वार्द्धपरार्द्धभिन्ना – पूर्वार्द्धन परार्द्धन च पृथग्भूता
सज्जनानाम् – सुजनानाम्/श्रेष्ठ जनानाम्
क्रमेण – क्रमानुसारेण
7. यत्रापि कुत्रापि गता भवेयु
हंसा महीमण्डलमण्डनाय।
हानिस्तु तेषां हि सरोवराणां
येषां मरालैः सह विप्रयोगः॥ – भामिनीविलासः
शब्दार्थाः –
महीमण्डल – पृथ्वी
मण्डनाय – सुशोभित करने के लिए
गताः – चले जाने वाले
भवेयुः – होने चाहिए
मरालैः – हंसों से
हंसाः – हंस
सरोवराणां – तालाबों का
विप्रयोगः – अलग होना
हानिः – हानि
सह – साथ
तेषां – उनका
येषां – उनका।
अर्थ – पृथ्वी को सुशोभित करने वाले हंस भूमण्डल में (इस पृथ्वी पर) जहाँ कहीं (सर्वत्र) भी प्रवेश करने में समर्थ हैं, हानि तो उन सरोवरों की ही है, जिनका हंसों से वियोग (अलग होना) हो जाता है।
विशेषण – विशेष्य चयनम् –
विशेषणम् – विशेष्यः
गतः – हंसाः
तेषाम् – सरोवराणाम्
अव्ययानां वाक्येषु प्रयोगः –
पवानि – वाक्येषु प्रयोग
यत्र-कुत्र (जहाँ-कहाँ)- यत्र कृष्णः कुत्र पराजयः?
अपि (भी) – त्वम् अपि पठ।
(साथ) – रामेण सह सीता अगच्छत्। पर्यायपदानि
पर्यायपवानि –
पवानि पर्यायपदानि
महीमण्डल – पृथ्वीमण्डल
मण्डनाय – अलङ्करणाय
मरालैः – हंसाः
विप्रयोगः – वियोगः
सरोवराणाम् – तडागानाम्
8. गुणा गुणज्ञेषु गुणा भवन्ति
ते निर्गुणं प्राप्य भवन्ति दोषाः।
आस्वाधतोयाः प्रवहन्ति नद्यः
समुद्रमासाद्य भवन्त्यपेयाः॥ – हितोपदेशः
शब्दार्था:-
गुणज्ञेषु – गुणों को जानने वालों में (गुणवान),
निर्गुणं – गुणहीन
दोषा: – दुर्गु
आस्वाद्यतोया: – स्वादयुक्त, जलवाली,
आसाद्य – प्राप्त करके
प्रवहन्ति – बहती हैं
नद्यः – नदियाँ
अपेया: – न पीने योग्य
प्राप्य – प्राप्त करके
भवन्ति – हो जाती हैं।
अर्थ – गुणवान लोगों में रहने के कारण ही गुणों को सगुण कहा जाता है। गुणहीन को प्राप्त करके वे दुर्गुण (दोष) बन जाते हैं। जिस प्रकार नदियाँ स्वादयुक्त जलवाली होती हैं, परंतु समुद्र को प्राप्त करके न पीने योग्य अर्थात् (कुस्वादु या नमकीन) हो जाती हैं।
विशेषण-विशेष्य चयनम् –
आस्वाद्यतोयाः – नघ:
अपेयाः – नघ:
पर्यायपदानि
गुणज्ञेषु – गुणज्ञातृषु जनेषु
आसाद्य – प्राप्य
निर्गुणं – गुणहीनः
आस्वाद्यतोयाः – स्वादनीयजलसम्पन्नाः
अपेयाः – न पेयाः, न पानयोग्याः
Class 9 Sanskrit Chapter 6 भ्रान्तो बालः Summary Notes
भ्रान्तो बालः Summary
नामक ग्रंथ से लिया गया है। इस पाठ में एक ऐसे बालक की कहानी कही गई है, जिसका मन अध्ययन की अपेक्षा खेल-कूद में कुछ ज्यादा ही लगता है। खेलने के लिए वह पशु-पक्षियों तक का आह्वान करता है, लेकिन कोई भी उसके साथ खेलने को तैयार नहीं होता। इसका अनुभव हम इस प्रकार कर सकते हैं उस बालक को रास्ते में एक भौंरा मिला। बालक ने उसे खेलने के लिए बुलाया। परंतु उसने कहा कि मैं शहद एकत्र करने में व्यस्त हूँ।
हूँ।
तब उसे एक चिड़िया दिखाई दी। वह अपना घोंसला बनाने में व्यस्त थी। अतः उसने भी बालक के साथ खेलने से मना कर दिया। तब वह एक कुत्ते के पास जाकर उसे अपने साथ खेलने के लिए कहने लगा। कुत्ते ने कहा कि मैं अपने स्वामी के कार्य को पलभर के लिए भी नहीं छोड़ सकता। इससे बालक निराश होता है। उसे बोध होता है कि इस संसार में हर प्राणी अपने-अपने कार्य में व्यस्त है। एक वही है जो निरुद्देश्य इधर-उधर घूमता रहता है। इसके बाद वह निश्चय करता है कि वह अपना समय व्यर्थ नहीं गँवाएगा, बल्कि अध्ययन करेगा।
भ्रान्तो बालः Word Meanings Translation in Hindi
1. भ्रान्तः कश्चन बालः पाठशालागमनवेलायां क्रीडितुम् अगच्छत्। किन्तु तेन सह केलिभिः कालं क्षेप्तुं तदा कोऽपि न वयस्येषु उपलभ्यमान आसीत्। यतः ते सर्वेऽपि पूर्वदिनपाठान् स्मृत्वा विद्यालयगमनाय त्वरमाणाः अभवन्। तन्द्रालु बालः लज्जया तेषां दृष्टिपथमपि परिहरन् एकाकी किमपि उद्यानं प्राविशत्। सः अचिन्तयत्-“विरमन्तु एते वराकाः पुस्तकदासाः। अहं तु आत्मानं विनोदयिष्यामि। सम्प्रति विद्यालयं गत्वा भूयः बुद्धस्य उपाध्यायस्य मुखं द्रष्टुं नैव इच्छामि। एते निष्कुटवासिनः प्राणिनः एव मम वयस्याः सन्तु इति।
शब्दार्थाः
कश्चन – कोई
भ्रान्तः – गलत रास्ते पर पड़ा हुआ
बेलायाम् – समय पर
क्रीडितुम् – खेलने के लिए
केलिभिः – खेल द्वारा
कालं क्षेप्तुम् – समय बिताने के लिए
वयस्येषु – मित्रों में से
उपलभ्यमान – उपलब्ध
यत: – क्योंकि
स्मृत्वा – याद करके
त्वरमाणा: – शीघ्रता करते हुए
तन्द्रालुः – आलसी
परिहरन् – बचता हुआ
एकाकी – अकेला
विरमन्तु – रुकें
वराका: – बेचारे
आत्मानं – अपना
पुस्तकदासा: – पुस्तकों के दास
विनोदयिष्यामि – मैं मनोरंजन , करूँगा
उपाध्यायस्य – गुरु के
निष्कुटवासिनः – वृक्ष के कोटर में रहने वाले
वयस्याः – मित्र
सन्तु – हों
एते – ये सब
अर्थ – कोई भ्रमित बालक पाठशाला जाने के समय खेलने के लिए चला गया किंतु उसके साथ खेल के द्वारा समय बिताने के लिए कोई भी मित्र उपलब्ध नहीं था। वे सभी पहले दिन के पाठों को याद (स्मरण) करके विद्यालय जाने की शीघ्रता से तैयारी कर रहे थे। आलसी बालक लज्जावश उनकी दृष्टि से बचता हुआ अकेला ही उद्यान में प्रविष्ट हो गया। उसने सोचा-ये बेचारे पुस्तक के दास वहीं रुकें, मैं तो अपना मनोरंजन करूँगा। क्रुद्ध गुरु जी का मुख मैं बाद में देलूँगा। वृक्ष के खोखलों में रहने वाले ये प्राणी (पक्षी) मेरे मित्र बन जाएँगे।
विशेषण-विशेष्य-चयनम् –
विशेषणम् – विशेष्यः
कश्चन/भ्रान्तः – बाल:
एते/वराकाः – पुस्तकदासाः
ते – सर्वे
अव्ययानां – वाक्येषु प्रयोगः –
वाक्येषु – वाक्येषु प्रयोगः
कश्चन (कोई) – तत्र कश्चन बालः भ्रमति स्म।
किन्तु (परंतु) – किन्तु सः एकाकी एव आसीत्।
सह (साथ) – बालेन सह एकः बालकः अपि आसीत्।
तदा (तब) – तदा एकः बालकः अपि तत्र आगच्छत्।
कोऽपि (कोई भी) – तत्र उद्याने कोऽपि न आसीत्।
यतः (क्योंकि) – यतः सर्वे बालाः पाठान् स्मरन्ति स्म।
पुनः (फिर से) – सः पुनः पाठम् अस्मरत्।
ननु (निश्चित ही) – ननु सः ह्यः अगच्छत्।
एव (ही) – ईश्वरः सर्वत्र एव अस्ति।
इति – सः अचिन्तयत्-एषः प्राणी एव मम वयस्य इति।
पर्यायपदानि –
पदानि – पर्यायपदानि
भ्रान्तः – भ्रमयुक्तः
केलिभिः – क्रीडाभिः
तन्द्रालुः – अलसः,अक्रियः
चिन्तयामास – अचिन्तयत्
उपाध्यायस्य – आचार्यस्य
क्रीडितुम् – खेलितुम्
दृष्टिपथम् – त्वरां कुर्वन्तः, त्वरयन्तः
पुस्तकदासाः – पुस्तकानां दासाः
निष्कुटवासिनः – वृक्षकोटरनिवासिनः
विलोमपदानि –
पदानि – विलोमपदानि
बाल: – बाला
प्रविवेश – निरगच्छत्
स्मृत्वा – विस्मृत्य
2. अथ सः पुष्पोद्यानं व्रजन्तं मधकरं दृष्ट्वा तं क्रीडितम द्वित्रिवारं आह्वयत्। तथापि सः मधुकरः अस्य बालस्य आह्वानं तिरस्कृतवान्। ततो भूयो भूयः हठमाचरति बाले सः मधुकरः अगायत्-“वयं हि मधुसंग्रहव्यग्रा” इति। तदा स बालः ‘अलं भाषणेन अनेन मिथ्यागर्वितेन कीटेन’ इति विचिन्त्य अन्यत्र दत्तदृष्टिः चञ्च्वा तृणशलाकादिकम् आददानम् एकं चटकम् अपश्यत्, अवदत् च-“अयि चटकपोत! मानुषस्य मम मित्रं भविष्यसि। एहि क्रीडावः। एतत् शुष्कं तृणं त्यज स्वादूनि भक्ष्यकवलानि ते दास्यामि” इति। स तु “मया वटद्रुमस्य शाखायां नीडं कार्यम्” इत्युक्त्वा स्वकर्मव्यग्रो अभवत्।
शब्दार्थाः
मधुकरम् – भौरे को
व्रजन्तं – घूमते हुए
आह्वयत् – बुलाया
हठमाचरति – हठ कस्ने पर
मधुसंग्रहव्यग्राः – पुष्प के रस के संग्रह में लगे हुए
भूयो भूयः – बार-बार
मिथ्यागवितेन – झूठे गर्व वाले
कीटेन – कीड़े से
चञ्च्चा – चोंच से
चटकम् – चिड़ा (पक्षी)
आददानम् – ग्रहण करते हुए को
स्वादूनि – स्वादिष्ट
भक्ष्यकवलानि – खाने के लिए उपयुक्त कौर (ग्रास)
ते – तुम्हें
नीडः – घोंसला
वटद्रुमस्य शाखायाम् – बरगद के पेड़ की शाखा पर
कार्यम् – बनाना है
स्वकर्मव्यग्रः – अपने काम में व्यस्त
उक्त्वा – कहकर
तृणं – तिनके को
त्यज – छोड़ दो, एहि-आओ।
अर्थ- तब उसने उस उपवन में घूमते हुए भौरे को देखकर खेलने के लिए बुलाया। उस भौरे ने उस बालक की दो-तीन आवाजों की ओर तो ध्यान ही नहीं दिया। तब बार-बार हठ करने वाले उस बालक के प्रति उस (भौरे) ने गुनगुनाया “मैं तो पराग संचित करने में व्यस्त हूँ।” तब उस बालक ने अपने मन में ‘व्यर्थ में घमंडी इस कीड़े को छोड़ो’, ऐसा सोचकर दूसरी ओर देखते हुए एक चिड़े (पक्षी) को चोंच से घास-तिनके आदि उठाते हुए देखा। वह (बच्चा) उस (चिड़े) से बोला-“अरे चिड़िया के बच्चे (शावक)! तुम मुझ मनुष्य के मित्र बनोगे? आओ खेलते हैं। इस सूखे तिनके को छोड़ो। मैं तुम्हें स्वादिष्ट खाद्य-वस्तुओं के ग्रास दूंगा।” “मुझे बरगद के पेड़ की शाखा (टहनी) पर घोंसला बनाना है, अतः मैं काम से जा
रहा हूँ”-ऐसा कहकर वह अपने काम में व्यस्त हो गया।
विशेषण-विशेष्य-चयनम् –
विशेषणम् – विशेष्यः
स – बालः
आचरति – बाले
व्रजन्तं – मधुकरं
मिथ्यागवितेन – कीटेन
अव्ययानां वाक्येषु प्रयोगः –
पदानि – वाक्येषु प्रयोगः
अथ (इसके बाद) – अथ सः बालः पुष्पोद्यानं गच्छति।
न (नहीं) भूयः – सः न आगमिष्यति।
भूयः (बार-बार) – सः भूयः भूयः तम् आह्वयति।
इति (ऐसा) – इति उक्त्वा सः स्वकर्मणि व्यग्रः अभवत्।
तदा (तब) – तदा सः बालः अनृत्यत्।
पर्यायपदानि –
पदानि – पर्यायपदानि
मिथ्यागर्वितेन – व्याहङ्कारयुक्तेन
चञ्च्वा – चञ्चुपुटेन
स्वादूनि – स्वादिष्टानि
स्वकर्मव्यग्रः – स्वकीयकार्येषु तत्परः
चटकम् – पक्षिणम्
आददानम् – गृह्णन्तम्
भक्ष्यकवलानि – भक्षणीयग्रासाः
मधुकरः – भ्रमरः
विलोमपदानि –
पदानि – विलोमपदानि
स्वादूनि – कटूनि
शत्रुः – मित्रम्
गृहाण – त्यज
3. तदा खिन्नो बालकः एते पक्षिणो मानुषेषु नोपगच्छन्ति। तद् अन्वेषयामि अपरं मानुषोचितं विनोदयितारम् इति विचिन्त्य पलायमानं कमपि श्वानम् अवलोकयत्। प्रीतो बालः तम् इत्थं सम्बोधयत्-रे मानुषाणां मित्र! किं पर्यटसि अस्मिन् निदाघदिवसे? इदं प्रच्छायशीतलं तरुमूलम् आश्रयस्व। अहमपि क्रीडासहायं त्वामेवानुरूपं पश्यामीति। कुक्कुरः प्रत्यवदत्
यो मां पुत्रप्रीत्या पोषयति स्वामिनो गृहे तस्य।
रक्षानियोगकरणान्न मया भ्रष्टव्यमीषदपि॥ इति।
शब्दार्थाः –
उपगच्छति – समीप जाते हैं
विनोदयितारम् – मनोरंजन करने वाले को
अन्वेषयामि – ढूँढ़ता/खोजता हूँ
श्वानम् – कुत्ते को
अवलोकयत् – देखा
विचिन्त्य – सोचकर
प्रीतः – प्रसन्न
इत्थम् – इस प्रकार
निदाघदिवसे – गर्मी के दिनमें
क्रीडासहाय – खेल में सहयोगी
पलायमानं – दौड़ते हुए/भागते हुए
मानुषोचितं – मनुष्यों के योग्य
पर्यटसि – घूम रहे हो
प्रच्छायशीतलं – ठंडी छाया वाले
अनुरूपम् – योग्यम्
प्रत्यवदत् – बोला
ईषदपि – थोड़ा-सा भी
भ्रष्टव्यम् – हटना चाहिए।
अर्थ-
तब दुखी बालक ने कहा- ये पक्षी मनुष्यों के पास नहीं आते। अतः मैं मनुष्यों के योग्य किसी अन्य मनोरंजन करने वाले को ढूँढ़ता हूँ– ऐसा सोचकर भागते हुए किसी कुत्ते को देखकर प्रसन्न हुए उस बालक ने कहा-हे मनुष्यों के मित्र! इतनी गर्मी के दिन में व्यर्थ क्यों घूम रहे हो? इस घनी और शीतल छाया वाले पेड़ का आश्रय लो। मैं भी खेल में तुम्हें ही उचित सहयोगी समझता हूँ। कुत्ते ने कहा –
जो अपने पुत्र के समान मेरा पोषण करता है, उस स्वामी के घर की रक्षा के कार्य में लगे होने से मुझे थोड़ा-सा भी नहीं हटना चाहिए।
विशेषण-विशेष्य चयनम् –
विशेषणम् – विशेष्यः
खिन्नः – बालकः
प्रीतः – बालः
तरुमूलम् – प्रच्छायशीतलं
एते – पक्षिणः
अस्मिन् – निदाघदिवसे
अव्ययानां वाक्येषु प्रयोगः –
पदानि – वाक्येषु प्रयोगः
तदा (तब) – तदा खिन्नः बालकः अचिन्तयत्।
इत्थम् (इस प्रकार) – अहम् इत्थम् एव कार्यं करोमि।
पर्यायपदानि –
पदानि – पर्यायपदानि
उपगच्छन्ति – समीपं गच्छन्ति
विनोदयितारम् – मनोरञ्जनकारिणम्
अवलोकयत् – अपश्यत्
निदाघदिवसे – ग्रीष्मदिने
श्वानः – कुक्कुरः
रक्षानियोगकरणात् – सुरक्षाकार्यवशात्
ईषदपि – अल्पमात्रम् अपि
अन्वेषयामि – अन्वेषणं करोमि
पलायमानम् – धावन्तम्
संबोधयामास – संबोधितवान्
अनुरूपम् – योग्यम्
तरुः – वृक्षः
भ्रष्टव्यम् – पतितव्यम्
विलोमपदानि –
पदानि – विलोमपदानि
खिन्नः – प्रसन्नः
उचितम् – अनुचितम्
मित्रम् – रिपुः
निदाघः – शीतः
सहायम् – असहायम्
स्वामिनः – सेवकस्य
उपगच्छन्ति – दूरं गच्छन्ति
प्रीतः – अप्रीतः
दिवसे – रात्रौ
शीतमलम् – उष्णम्
अनुरूपम् – अननुरूपम्
4. सर्वैः एवं निषिद्धः स बालो भग्नमनोरथः सन्-‘कथमस्मिन् जगति प्रत्येक स्व-स्वकार्ये निमग्नो भवति। न कोऽपि मामिव वृथा कालक्षेपं सहते। नम एतेभ्यः यैः मे तन्द्रालुतायां कुत्सा समापादिता। अथ स्वोचितम् अहमपि करोमि इति विचार्य त्वरितं पाठशालाम् अगच्छत्। ततः प्रभृति स विद्याव्यसनी भूत्वा महती वैदुषी प्रथा सम्पदं च अलभत।
शब्दार्था: –
निषिद्धः – मना किया गया
भग्नमनोरथः – टूटे इच्छाओं वाला
जगति – संसार में
निमग्नः – लीनः
कालक्षेपम् – समय , बिताना
तन्द्रालतायाम – आलस्य में
कत्सा – घृणा, भर्त्सना
विद्याव्यसनी – विद्या में रुचि रखने वाला वैदषीम विद्वता
अलभत – प्राप्त कर ली
त्वरितम् – जल्दी से
समापादिता – उत्पन्न करा दी
भूत्वा – होकर
वृथा – बेकार में
ततः प्रभतिः – तब से लेकर
विचार्य – विचार करके
अगच्छत् – चला गया
सम्पदं – संपत्ति
स्वोचितम् – अपना , उचित
अर्थ –
सबके द्वारा इस प्रकार मना कर दिए जाने पर टूटे मनोरथ (इच्छा) वाला वह बालक सोचने लगा- इस संसार में प्रत्येक प्राणी अपने-अपने कर्तव्य में व्यस्त हैं। कोई भी मेरी तरह समय नष्ट नहीं कर रहा है। इन सबको प्रणाम, जिन्होंने आलस्य के प्रति मेरी घृणा-भावना उत्पन्न कर दी। अतः मैं भी अपना उचित कार्य करता हूँ-ऐसा सोचकर वह शीघ्र पाठशाला चला गया। तब से वह विद्याध्ययन के प्रति इच्छायुक्त होकर विद्वता, कीर्ति तथा धन को प्राप्त किया।
विशेषण-विशेष्य-चयनम् –
विशेषणम् – विशेष्यः
विनितमनोरथः – बाल:
एते – पक्षिणः
महतीं – वैदुषीं
अस्मिन् – जगति
निषिद्ध – बाला:
अव्ययानां वाक्येषु प्रयोगः –
पदानि – वाक्येषु प्रयोगः
कथम् (कैसे) – एतत् कार्यं कथम् अभवत्?
न (नहीं) – अहं एतत् कार्यं न करिष्यामि।
वृथा (व्यर्थ में) – वृथा कलह मा कुरुत।
ततः प्रभृतिः (तब से लेकर) – ततः प्रभृतिः सः विद्याध्ययने अभवत्।
पर्यायपदानि –
पदानि – पर्यायपदानि
जगति – संसारे
भग्नमनोरथः – खण्डितकामः
तन्द्रालुतायाम् – तन्द्रालुजनस्य भावे, अलसत्वे
विद्याव्यसनी – अध्ययनरतः
निमग्नः – लीनः
त्वरितं – शीघ्रम्
वैदुषीं – विद्वता,युक्तम्
निषिद्धः – अस्वीकृतः
कालक्षेपम् – समयस्य यापनम्
कुत्सा – घृणा, भर्त्सना
कृत्ये – कार्ये
विचार्य – विचारं कृत्वा
ख्यातिम् – प्रसिद्धिम्
विचार्यम् – अविचार्यम्
अथ – इति
उपजगाम – दुर्जगाम
निषिद्धः – स्वीकृतः
त्वरितं – शनैः
कृत्ये – अकृत्ये
वृथा – वास्तविकम्
Class 9 Sanskrit Chapter 7 प्रत्यभिज्ञानम् Summary Notes
प्रत्यभिज्ञानम् Summary
यह पाठ भास द्वारा रचित ‘पञ्चरात्रम्’ नामक नाटक से लिया गया है। पांडव अपने वनवास के अंतिम वर्ष अज्ञातवास में रह रहे थे। वे महाराज विराट के राज्य में नाम तथा वेश बदलकर रह रहे थे।
।
इस दौरान कौरवों ने राजा विराट की गायों का अपहरण कर लिया था। महाराज विराट के पुत्र उत्तर तथा बृहन्नला के वेश में अर्जुन कौरवों से युद्ध करने के लिए गए। कौरवों की तरफ से अभिमन्यु (अर्जुन-पुत्र) युद्ध कर रहा था। इस युद्ध में कौरवों की हार हुई। भीम अभिमन्यु को पकड़कर राजा विराट के दरबार में पेश करते हैं। अभिमन्यु अपना नाम लेकर बुलाए जाने पर अपमानित अनुभव करता है।है।
वह अपने पिता अर्जुन को नहीं पहचान पाता तथा उनसे उग्र होकर बात करता है। तभी विराट-पुत्र उत्तर दरबार में पहुँच जाता है। वह पांडवों का भेद खोल देता है और उनकी बहादुरी के विषय में सबको बताता है। अभिमन्यु अपने पिता को पहचानकर प्रसन्न हो जाता है।
प्रत्यभिज्ञानम् Word Meanings Translation in Hindi
1. भटः – जयतु महाराजः।
राजा – अपूर्व इव ते हर्षों ब्रूहि
केनासि विस्मितः?
भटः – अश्रद्धेयं प्रियं प्राप्त
सौभद्रो ग्रहणं गतः॥
राजा – कथमिदानीं गृहीतः?
भटः – रथमासाद्य निश्शहू
बाहुभ्यामवतारितः।
राजा- केन?
भटः – यः किल एव नरेन्द्रेण विनियुक्तो महानसे (अभिमन्युमुद्दिश्य ) इत इतः कुमारः।
अभिमन्युः – भोः को नु खल्वेषः? येन भुजैकनियन्त्रितो बलाधिकेनापि न पीड़ितः अस्मि।
अर्थ – भट – महाराज की जय हो।
राजा – तुम्हारी प्रसन्नता अद्भुत-सी लग रही है, बताओ किस कारण इतने प्रसन्न हो?
भट – अविश्वसनीय प्रिय प्राप्त हो गया है, अभिमन्यु पकड़ लिया गया।
राजा – अब वह किस प्रकार पकड़ लिया गया है?
भट – रथ पर पहुँचकर निश्शङ्क भाव से हाथों द्वारा उतार लिया गया है। राजा
राजा – कैसे?
भट – निश्चय से जो यह महाराज के द्वारा रसोई में नियुक्त किया गया है (अभिमन्यु को संकेत करके)
कुमार! इधर से इधर से (आओ)।
अभिमन्युः – अरे! यह कौन?, जिसने एक हाथ से पकड़कर अधिक बलशाली होकर भी मुझे पीड़ित नहीं किया।
अव्ययानां वाक्येषु प्रयोगः
पदानि – वाक्येषु प्रयोगः
इव (समान) – सः सिहः इव अवदत्।
इतः (यहाँ से) – इतः बहिः मा गच्छ।
नून (निश्चित) – नूनम् सः मातरम् सेवते।
खलु (निश्चित) – खलु सः भालांकारः एव अस्ति।
न (नहीं) – अहम् न क्रीडामि।
कथम् (कैसे) – अभिमन्युः कथम् गृहीतः।
अपि (भी) – अहम् अपि क्रीडामि।
विशेषण-विशेष्य-चयनम्
विशेषणम् – विशेष्यः
विशेष्यः – प्रियं
महत् – कौतूहलम्
को – एषः
2. बृहन्नला – इत इत: कुमारः।
अभिमन्युः – अये! अयमपरः कः विभात्युमावेषमिवाश्रितो हरः।
बृहन्नला – आर्य, अभिभाषणकौतूहलं मे महत्। वाचालयत्वेनमार्यः।
बल्लभः – (अपवार्य) बाढम् (प्रकाशम्) अभिमन्यो।
अभिमन्युः – अभिमन्युर्नाम?
बल्लभः – रुष्यत्येष मया त्वमेवैनमभिभाषय।
बृहन्नला – अभिमन्यो!
अभिमन्युः – कथं कथम्। अभिमन्यु माहम्। भोः!
किमत्र विराटनगरे क्षत्रियवंशोद्भूताः नीचैः अपि नामभिः
अभिभाष्यन्ते अथवा अहं शत्रुवशं गतः। अतएव तिरस्क्रियते।
शब्दार्थाः –
हरः – महादेव
अपरः – दसरा
अपवार्य – हरा करके
बाढम – अच्छा
विभाति – सशोभित होना
अभिभाषय – बात करने को प्रेरित करो
मे – मुझे
महत – बहुत ज्यादा
अथवा – या
प्रकाशम् – प्रकट में
रुष्यति – चिढ़ता होता है
अभिभाष्यन्ते – पुकारे जाते है।
अर्थ-बृहन्नला – कुमार, इधर चलें।
अभिमन्यु – अरे! यह दूसरा कौन है, ऐसा लग रहा है जैसे महादेव ने उमा का वेष ग्रहण किया हो।
बृहन्नला – आर्य! मुझे इससे बात करने की बहुत उत्सुकता हो रही है। आप इसे बोलने के लिए प्रेरित करें।
बल्लभः – (एक ओर को) अच्छा (प्रकट रूप से) अभिमन्यु।
अभिमन्यु – अभिमन्यु?
बल्लभः – यह मुझसे चिढ़ता है, तुम्ही इसे बात करने के लिए प्रेरित करो।
बृहन्नला – अभिमन्यु!
अभिमन्यु – क्यों, मेरा नाम अभिमन्यु है! अरे! क्या यहाँ विराट नगर में क्षत्रिय कुमारों को नीच लोग भी नाम । लेकर पुकारते हैं, अथवा मैं शत्रओं के अधीन हो गया, इसलिए अपमानित किया जा रहा है मुझे।
अव्ययानां वाक्येषु प्रयोगः –
पदानि – वाक्येषु प्रयोगः
कथं (कैसे) – भवान् कथं आगच्छति।
अत्र (यहाँ) – अत्र एकं कूपम् अस्ति।
नीचैः (नीचे) – जलम् नीचैः पतति।
अपि (भी) – अहम् अपि आपणम् गामिष्यामि।
विलोमपदानि –
पदानि – विलोमपदानि
नीचैः – उच्चैः
आर्यः – अनार्यः
मया – त्वया
अत्र – तत्र
रुष्यति – प्रसीदति
गतः – आगतः
इतः – ततः
अहम्: – त्वम्
प्रकाशम् – मनसि
शत्रुवशम् – मित्रवशम्
पर्यायपदानि –
पदानि – पर्यायपदानि
रुष्यति – क्रुध्यति
नीचैः – अधः
प्रकाशम् – प्रकटम्
कौतूहलम् – उत्सुकता
गतः – अगच्छत्
इतः – अस्मात् स्थानात्
तिरस्क्रियते – उपेक्ष्यते
विशेषण – विशेष्य – चयनम् –
विशेषणम् – विशेष्यः
महत् – कौतूहलं
उमावेषमिवाश्रितः – हरः
अपरः – कः
3. बृहन्नला – अभिमन्यो! सुखमास्ते ते जननी?
अभिमन्युः – कथं कथम्? जननी नाम? किं भवान् मे पिता अथवा पितृव्यः? कथं मां पितृवदाक्रम्य स्त्रीगतां कथां पृच्छति?
बृहन्नला – अभिमन्यो! अपि कुशली देवकीपुत्रः केशवः?
अभिमन्युः – कथं कथम्? तत्रभवन्तमपि नाम्ना। अथ किम् अथ किम्? (बृहन्नलावल्लभौ परस्परमव लोकयतः)
अभिमन्युः – कथमिदानीं सावज्ञमिव मां हस्यते?
बृहन्नला – न खलु किञ्चित्। पार्थं पितरमुद्दिश्य मातुलं च जनार्दनम्।
तरुणस्य कृतास्त्रस्य युक्तो युद्धपराजयः॥
अभिमन्युः – अलं स्वच्छन्दप्रलापेन। अस्माकं कुले आत्मस्तवं कर्तुमनुचितम्। रणभूमौ हतेषु शरान् पश्य, मदृते अन्यत् नाम न भविष्यति।
बृहन्नला – एवं वाक्यशौण्डीर्यम्। किमर्थं तेन पदातिना गृहीतः?
अभिमन्युः – अशस्त्रं मामभिगतः। पितरम् अर्जुनं स्मरन् अहं कथं हन्याम्। अशस्त्रेषु मादृशाः न प्रहरन्ति। अतः
अशस्त्रोऽयं मां वञ्चयित्वा गृहीतवान्। राजा – त्वर्यतां त्वर्यतामभिमन्युः।
शब्दार्थाः –
पितृव्यः – चाचा
उभौ – दोनों
परस्परम् – आपस में
मातुलं – मामा।
जनार्दनम् – श्रीकृष्ण को
पार्थं – अर्जुन को
पदाति: – पैदल चलने वाला
कृतास्त्रस्य – धनुर्विद्या में निपुण से
आत्मस्तवम् – आत्मप्रशंसा
उद्दिश्य – याद करके
महते – मेरे सिवाय
वाक्यशौण्डीर्यम् – वाणी की वीरता
तरुणस्य – युवक के।
अर्थ – बृहन्नला – अभिमन्यु! तुम्हारी माता सकुशल है?
अभिमन्यु – क्या, क्या? माता? क्या आप मेरे पिता या चाचा हैं? आप क्यों मुझ पर पिता के समान अधिकार दिखाकर माता के सम्बन्ध में प्रश्न कर रहे हैं?
बृहन्नला – अभिमन्यु! देवकीपुत्र केशव सकुशल हैं?
अभिमन्यु – क्या आदरणीय कृष्ण को भी नाम से……? और क्या, और क्या! (कुशल हैं) (बृहन्नला और बल्लभ एक-दूसरे की ओर देखते हैं)
अभिमन्यु – ये मेरे ऊपर अज्ञानी की तरह क्यों हँस रहे हैं?
बृहन्नला – क्या कुछ ऐसा ही नहीं है? पिता पार्थ तथा मामा श्री कृष्ण वाला युवक युद्ध में निपुण होकर भी युद्ध में परास्त हो जाता है।
अभिमन्युः – स्वच्छन्द प्रलाप करना बन्द करो। हमारे कुल में आत्मप्रशंसा करना अनुचित है। युद्ध क्षेत्र में मेरे बाणों से अतिरिक्त दूसरा नाम नहीं होगा।
बृहन्नला – अरे वाणी की ऐसी वीरता! फिर उन्होंने तुम्हें पैदल ही क्यों पकड़ लिया?
अभिमन्युः – वे अशास्त्र (शस्त्रहीन) होकर मेरे सामने आए। पिता अर्जुन को याद करके मैं उन्हें कैसे मारता? मुझ जैसे लोग शस्त्रहीन पर प्रहार नहीं करते। अतः इस शस्त्रहीन ने मुझे धोखा देकर पकड़ लिया।
राजा – अभिमन्यु को शीघ्र बुला लाओ।
पर्यायपदानि –
पदानि – पर्यायपदानि
इदानीम् – अधुना
आस्ते – अस्ति
मे – मम
उद्दिश्य – स्मृत्वा
आत्मस्तवम् – आत्मप्रशंसा
आस्ते – अस्ति
सावज्ञाम् – अवज्ञा सहितम्
तरुणस्य – युवकस्य
पदातिः – पादाभ्याम् अतति
विलोमपदानि –
पदानि – विलोमपदानि
सुखम् – दुखम्
पिता – माता
मातुलः – मातुलानी
जनकः – जननी
पितृव्यः पितृव्या
पराजयः – जयः
अव्ययानां – वाक्येषु – प्रयोगः –
पदानि – वाक्येषु प्रयोगः
एवं (ऐसा) – त्वम् एवं किमर्थम् वदसि?
किमर्थं (इसलिए) – क्यों-त्वम् किमर्थम् हससि?
अतः (इसलिए) सः उच्चैः अवदत् अतः सः दण्डितः अभवत्
अन्यत् (दूसरा) – सः कदापि अध्ययनात् अन्यत् कार्यं न करोति।
अथ (अथ) – अथ श्री महाभारत कथा।
कथम् (कैसे) – अधुना त्वम् कथम् गृहीतः।
विशेषण – विशेष्य – चयनम् –
विशेषणम् – विशेष्यः
एषं – महाराज
उत्सिक्तः – क्षत्रियकुमारः
गृहीतः – अयम्
4. बृहन्नला – इत इतः कुमारः। एष महाराजः। उपसर्पतु कुमारः।
अभिमन्युः – आः। कस्य महाराजः?
राजा – एोहि पुत्र! कथं न मामभिवादयसि? (आत्मगतम्) अहो! उत्सिक्तः खल्वयं क्षत्रियकुमारः।
अहमस्य दर्पप्रशमनं करोमि। (प्रकाशम्) अथ केनायं गृहीतः?
भीमसेनः – महाराज! मया।
अभिमन्युः – अशस्त्रेणेत्यभिधीयताम्।
भीमसेनः – शान्तं पापम्। धनुस्तु दुर्बलैः एव गृह्यते। मम तु भुजौ एव प्रहरणम्।
अभिमन्युः – मा तावद् भोः! किं भवान् मध्यमः तातः यः तस्य सदृशं वचः वदति।
भीमसेनः – पुत्र! कोऽयं मध्यमो नाम?
अभिमन्युः – योक्त्रयित्वा जरासन्धं कण्ठश्लिष्टेन बाहुना।
असह्यं कर्मतत्कृत्वा नीतःकृष्णोऽतदर्हताम्॥
राजा – न ते क्षेपेण रुष्यामि, रुष्यता भवता रमे।
किमुक्त्वा नापराद्धोऽहं, कथं तिष्ठति यात्विति॥
अभिमन्युः – यद्यहमनुग्राह्यः
पादयोः समुदाचारः क्रियतां निग्रहोचितः।
बाहुभ्यामाहृतं भीमः बाहुभ्यामेव नेष्यति॥
(ततः प्रविशत्युत्तरः)
शब्दार्थाः –
उपसर्पतु – समीप जाएँ
एह्येहि – आओ, आओ
आत्मगतम् – मन में
उत्सिक्तः – घमण्डी
दर्पप्रशमनं – घमंडी का नाश
इत्यभिधीयताम् – ऐसा कहिए
रमे – मैं आनन्दित होता हूँ।
अपराद्धः – अपराधी
अनुग्राहय – कृपा करने योग्य
यातु – चला जाए, जाओ
भुजौ – दोनो भुजाएँ
योक्त्रयित्वा – बाँधकर
असह्यम् – असाध्य
अतदर्हताम् – असमर्थता
क्षेपेण – निन्दापूर्ण वचनों से
समुदाचारः – सभ्य आचरण
निग्रहोचितः – उचित दण्ड
प्रविशति – अंदर आता है
सदृशं – समान
नेष्यति – ले जाएगा।
अर्थ – बृहन्नला – कुमार इधर आएँ। यह महाराज हैं। आप समीप जाएँ।
अभिमन्यु – आह! किसके महाराज?
राजा – आओ, आओ पुत्र। तुम मुझे प्रणाम क्यों नहीं करते (मन में) अरे! यह क्षत्रिय कुमार बहुत घमण्डी है।
मैं इसका घमण्ड शान्त करता हूँ। (प्रकट रूप से) तो इसे किसने पकड़ा?
भीमसेनः – महाराज! मैंने।
अभिमन्यु – शस्त्रहीन होकर पकड़ा- ऐसा कहिए।
भीमसेन – शान्त हो जाइए। धनुष तो दुर्बलों के द्वारा उठाया जाता है। मेरी तो भुजाएँ ही शस्त्र हैं।
अभिमन्यु – अरे नहीं! क्या आप हमारे मध्यम तात हैं, जो उनके समान वचन बोल रहे हैं।
भीमसेन – पुत्र! यह मध्यम तात कौन हैं?
अभिमन्यु – सुनिए-जिसने अपनी भुजाओं से जरासन्ध का कण्ठावरोध करके कृष्ण के लिए जो असाध्य कार्य था, उसको साध्य बना दिया था।
राजा – तुम्हारे निन्दापूर्ण वचनों से मैं चिढ़ता नहीं हूँ। तुम्हारे चिढ़ने से मुझे आनन्द प्राप्त होता है। तुम यहाँ क्यों खड़े हो, जाओ यहाँ से – यदि मैं ऐसा कहूँ तो क्या मैं अपराधी नहीं होऊँगा?
अभिमन्यु – यदि आप मुझ पर कृपा करना चाहते हो तो- मेरे पैर बाँधकर मुझे उचित दण्ड दीजिए। मैं हाथों से पकड़कर लाया गया हूँ। मेरे मध्यम तात भीम मुझे हाथों से ही छुड़वाकर ले जाएँगे। (तब उत्तर का प्रवेश)
पर्यायपदानि –
पदानि – पर्यायपदानि
एहि – आगच्छ
उपसर्पतु – समीपं , गच्छतु
उत्सिक्तः – गर्वोद्धतः, अहङ्कारी
दर्पप्रशमनं – गर्वस्य शमनम्
गृहीतः – ग्रहणे कृतः
प्रहरणम् – शस्त्रम्
निगृहोचितम् – बन्धनोचित
योक्त्रयित्वा – बद्र्ध्वा
क्षेपेण – निन्दावचनेन
रमे – प्रीतो भवामि
यातु – गच्छतु
समुदाचारः – शिष्टाचारः
अनुग्राह्य – अनुग्रहस्य योग्यतम्
त्वरितम् – शीघ्र
अव्ययानां चयनम् –
पदानि – वाक्येषु प्रयोगः
इतः (यहाँ से) – हे पुत्र! त्वम् इतः मा गच्छ।
कथं (कैसे) – त्वं कथम् ईदृशम् कार्यं करोषि।
न (नहीं) – सः असत्यम् न वदाति। अथ
(इसके बाद) – अथ शब्दानुशासनम्।
एव (ही) – ईश्वरः सर्वत्र एव अस्ति।
तु (तो) – त्वम् तु अतीव बुद्धिमान् असि।
मा (मत) – कोलाहलं मा कुरु।
सदृशं (के समान) – मोहनः श्रीकृष्णस्य सदृशं वर्तते।
ततः (उसके बाद) – त्वं प्रथमं पठ ततः क्रीड।
विशेषण-विशेष्य-चयनम् –
विशेषणम् – विशेष्यः
एषः – महाराजः
शान्तं – पापम्
उत्सिक्तः – क्षत्रियकुमारः
विलोमपदानि –
यातु – तिष्ठतु
आत्मगतम् – प्रकाशम्
दुर्बलैः – सबलैः
त्वरितम् – शनैः
5. उत्तरः तात! अभिवादये!
उत्तरः राजा आयुष्मान् भव पुत्र। पूजिताः कृतकर्माणो योधपुरुषाः।
उत्तरः पूज्यतमस्य क्रियतां पूजा।
राजा – पुत्र! कस्मै?
उत्तरः – इहात्रभवते धनञ्जयाय।
राजा – कथं धनञ्जयायेति? .
उत्तरः – अथ किम्
श्मशानाद्धनुरादाय तूणीराक्षयसायके।
नृपा भीष्मादयो भग्ना वयं च परिरक्षिताः॥
राजा – एवमेतत्।
उत्तरः – व्यपनयतु भवाञ्छङ्काम्। अयमेव अस्ति धनुर्धरः धनञ्जयः।
बृहन्नला – यद्यहं अर्जुनः तर्हि अयं भीमसेनः अयं च राजा युधिष्ठिरः।
अभिमन्युः – इहात्रभवन्तो मे पितरः। तेन खलु …
न रुष्यन्ति मया क्षिप्ता हसन्तश्च क्षिपन्ति माम्।
दिष्ट्या गोग्रहणं स्वन्तं पितरो येन दर्शिताः॥
(इति क्रमेण सर्वान् प्रणमति, सर्वे च तम् आलिङ्गन्ति।)
शब्दार्था:
धनञ्जयः – अर्जुन
तूणीर – तरकश
व्यपनयतुः – दूर करे
क्षिप्ताः – आक्षेप किए जाने पर
भग्नाः – परास्त किए गए
दिष्ट्या – भाग्य से
गोग्रहणम् – गायों का अपहरण
स्वन्तं – सुखान्त
आलिड्गन्ति – आलिंगन करते हैं।
अर्थ- उत्तर – भगवन्! मैं प्रणाम करता हूँ।
राजा – दीर्घायु हो पुत्र! क्या युद्ध में वीरता दिखाने वाले वीरों का सत्कार कर दिया गया है?
उत्तर – अब सबसे अधिक पूज्य की पूजा कीजिए।
राजा – किसकी पूजा पुत्र?
उत्तर – यहीं मौजूद अर्जुन की।
राजा – क्या अर्जुन यहाँ आए हैं?
उत्तर – और क्या? पूज्य अर्जुन ने श्मशान से अपना धनुष तथा अक्षय तरकश लेकर भीष्म आदि राजाओं को परास्त कर दिया तथा हम लोगों की रक्षा की।
राजा – ऐसी बात है?
उत्तर आप अपना सन्देह दूर करें। धनुर्विद्या में प्रवीण अर्जुन यही हैं।
बृहन्नला – यदि मैं अर्जुन हूँ तो यह भीमसेन है और यह राजा युधिष्ठिर हैं।
अभिमन्यु – ये मेरे पूज्य पितागण हैं, इसीलिए……
मेरे निन्दापूर्ण वचनों से ये क्रुद्ध नहीं होते और हँसते हुए मुझे चिढ़ाते हैं। गौ-अपहरण की यह घटना सौभाग्य से सुखान्त हुई। इसी के कारण मुझे अपने सभी पिताओं के दर्शन हो गए।
(ऐसा कहकर क्रम से सबको प्रणाम करता है और सब उसका आलिंगन करते हैं)
अव्ययानां वाक्येषु प्रयोगाः –
पदानि – वाक्येषु प्रयोगः
(इसके बाद) – अथ श्री रामायण कथा।
अत्र (यहाँ) – अत्र एकम् उद्यानम् अस्ति।
च (और) – मातुलं च जनार्दनम् अत्र आगच्छतः।
एवम् (ऐसा) – एवं मा वद। यदि
(अगर) – यदि त्वम् आगमिष्यसि।
तर्हि (तो) – तर्हि अहम् गमिष्यामि।
न (नहीं) – अधुना सः न आगमिष्यति।
इति (ऐसा) – पयः ददाति इति पयोदः।
विशेषण-विशेष्य चयनम् –
विशेषणम् – विशेष्यः
धनुर्धरः – धनञ्जयः
राजा – युधिष्ठिरः
अयं – भीमसेनः
Class 9 Sanskrit Chapter 8 लौहतुला Summary Notes
लौहतुला Summary
प्रस्तुत पाठ ‘पञ्चतन्त्रम्’ नामक ग्रंथ के ‘मित्र भेद’ नामक तंत्र से लिया गया है। इसके रचयिता विष्णुशर्मा हैं। इस कथा में लोभ के दुष्परिणाम को दिखाया गया है। कथासार इस प्रकार है किसी स्थान पर जीर्णधन नामक व्यापारी रहता था। वह धन कमाने के उद्देश्य से दूसरे देशों को जाया करता था। एक बार उसने अपने पूर्वजों के द्वारा कमाई हुई लोहे की तराजू को एक सेठ के यहाँ धरोहर रख दिया। वह विदेश से आकर उस सेठ से अपनी धरोहर वापस माँगने लगा तो उस सेठ ने कहा कि उसे तो चूहों ने खा लिया।
यह सुनकर जीर्णधन सेठ को पाठ पढ़ाने की एक युक्ति सोची। वह नहाने का बहाना करके उस सेठ के पुत्र को अपने साथ ले गया और उसको एक गुफा में छिपाकर वापस लौट आया। सेठ ने उससे अपने पुत्र के विषय में पूछा तो उसने कहा कि बच्चे को बाज उठा ले गया। यह सुनकर उसने जीर्णधन को बुरा-भला कहा तथा उससे झगड़ते हुए न्यायालय पहुँच गया। न्यायाधिकारी ने विवाद की सच्चाई जानकर सेठ को लोहे की वह तराजू लौटाने का आदेश दिया। अपने तराजू को पाकर जीर्णधन ने सेठ के बच को वापस कर दिया।
लौहतुला Word Meanings Translation in Hindi
आसीत् कस्मिंश्चिद् अधिष्ठाने जीर्णधनो नाम वणिक्पुत्रः। स च विभवक्षयात् देशान्तर गन्तुमिच्छन् व्यचिन्तयत्
यत्र देशेऽथवा स्थाने भोगा भुक्ताः स्ववीर्यतः।
तस्मिन् विभवहीनो यो वसेत् स पुरुषाधमः॥
तस्य च गृहे लौहघटिता पूर्वपुरुषोपार्जिता तुला आसीत्। तां च कस्यचित् श्रेष्ठिनो गृहे निक्षेपभूतां कृत्वा देशान्तरं प्रस्थितः। ततः सुचिरं कालं देशान्तरं यथेच्छया भ्रान्त्वा पुनः स्वपुरम् आगत्य तं श्रेष्ठिनम् अवदत्-“भोः श्रेष्ठिन्! दीयतां मे सा निक्षेपतुला।” सोऽवदत्- “भोः! नास्ति सा, त्वदीया तुला मूषकैः भक्षिता” इति। जीर्णधनः अवदत्-“भोः श्रेष्ठिन्! नास्ति दोषस्ते, यदि मूषकै भक्षिता। ईदृशः एव अयं संसारः। न किञ्चिदत्र शाश्वतमस्ति। परमहं नद्यां स्नानार्थं गमिष्यामि। तत् त्वम् आत्मीयं एनं शिशुं धनदेवनामानं मया सह स्नानोपकरणहस्तं प्रेषय” इति।
शब्दार्था: –
आसीत् – था
अधिष्ठाने – स्थान पर
कस्मिंश्चिद् – किसी
विभव – धन
अक्षयात् – कमी से
देशान्तरं – दूसरे देश
स्ववीर्यतः – अपने पराक्रम से
अधमः – नीच
विभवहीनः – धनेश्वर्य से हीन
भुक्ताः – भोगे जाते हैं
प्रेषय – भेजो
शाश्वत – स्थिर
ततः – उसके बाद
पूर्वपुरुषः – पूर्वजों के द्वारा
उपार्जितः – खरीदी गई
श्रेष्ठिनः – सेठ के
निक्षेपभूता – धरोहर के रूप में
प्रस्थितः – चल दिया
भक्षिता – खा ली गई
वणिक्पुत्रः – बनिए का पुत्र
लौहघटिता – लोहे से बनी हुई
भ्रान्त्वा – घूमकर
स्वपुरम् – अपने देश में
मूषकैः – चूहों के द्वारा।
अर्थ- किसी स्थान पर जीर्णधन नामक एक बनिए का पुत्र था। धन की कमी के कारण विदेश जाने की इच्छा से उसने सोचा जिस देश अथवा स्थान पर अपने पराक्रम से भोग भोगे जाते हैं वहाँ धन-ऐश्वर्य से हीन रहने वाला मनुष्य नीच पुरुष होता है। उसके घर पर उसके पूर्वजों द्वारा खरीदी गई लोहे से बनी हुई एक तराजू थी।
उसे किसी सेठ के घर धरोहर के रूप में रखकर वह दूसरे देश को चला गया। तब लंबे समय तक इच्छानुसार दूसरे देश में घूमकर वापस अपने देश आकर उसने सेठ से कहा- “हे सेठ! धरोहर के रूप मे रखी मेरी वह तराजू दे दो।” उसने कहा- “अरे! वह तो नहीं है, तुम्हारी तराजू को चूहे खा गए।” जीर्णधन ने कहा- “हे सेठ! यदि उसको चूहे खा गए तो इसमें तुम्हारा दोष नहीं है। यह संसार ही ऐसा है। यहाँ कुछ भी स्थायी नहीं है। किंतु मैं नदी पर स्नान के लिए जा रहा हूँ। खैर, तुम धनदेव नामक अपने इस पुत्र को स्नान की वस्तुएँ हाथ में लेकर मेरे साथ भेज दो।”
पर्यायपदानि
पदानि – पर्यायपदानि
यथेच्छया – इच्छानुसारम्
अधमः – नीचः
स्ववीर्यतः – स्वपराक्रमेण
पूर्वपुरुषः – पूर्वजः
त्वदीया – तव
अधिष्ठाने – विदेशम्
देशान्तरम् – विदेशम्
उवाच – अवदत्
पुनः – भूयः
विलोमपदानि
पदानि – विलोमपदानि
शाश्वतम् – अशाश्वतम्
आसीत् – अस्ति
स्वपुरम् – देशान्तरम्
अधमः – उत्तमः
विशेषण-विशेष्य-चयनम्
विशेषणम् – विशेष्यः
कस्मिश्चित् – अधिष्ठाने
सुचिरम् – कालम्
पूर्व पुरुषोपार्जिता – लौहघटिता
सा – निक्षेपतुला
अव्ययानां वाक्येषु प्रयोगः
पदानि वाक्येषु प्रयोगः
च (और) – रामः लक्ष्मणः च गच्छतः।
यत्र (जहाँ) – यत्र धूमः तत्र अग्निः
ततः – ततः छात्रः अवदत्।
इति – जलं ददाति इति जलदः।
यदि – यदि परिश्रमं करिष्यसि सफलं भविष्यसि।
अत्र – अत्र एक: विद्यालयः अस्ति।
2. स श्रेष्ठी स्वपुत्रम् अवदत्-“वत्स! पितृव्योऽयं तव, स्नानार्थं यास्यति, तद् अनेन साकं गच्छ” इति। अथासौ श्रेष्ठिपुत्रः धनदेवः स्नानोपकरणमादाय प्रहृष्टमनाः तेन अभ्यागतेन सह प्रस्थितः। तथानुष्ठिते स वणिक् स्नात्वा तं शिशुं गिरिगुहायां प्रक्षिप्य, तद्वारं बृहत् शिलया आच्छाद्य सत्त्वरं गृहमागतः।
सः श्रेष्ठी पृष्टवान्-“भोः! अभ्यागत! कथ्यतां कुत्र मे शिशुः यः त्वया सह नदीं गतः”? इति। स अवदत्-“तव पुत्रः नदीतटात् श्येनेन हृतः” इति। श्रेष्ठी अवदत्- “मिथ्यावादिन्! किं क्वचित् श्येनो बालं हर्तुं शक्नोति? तत् समर्पय मे सुतम् अन्यथा राजकुले निवेदयिष्यामि।” इति। सोऽकथयत्-“भोः सत्यवादिन्! यथा श्येनो बालं न नयति, तथा मूषका अपि लौहघटितां तुला न भक्षयन्ति। तदर्पय मे तुलाम्, यदि दारकेण प्रयोजनम्।” इति।
शब्दार्था:
अवदत् – बोला
पितृव्यः – चाचा
यास्यति – जाएगा
सार्धम् – साथ
श्रेष्ठिपुत्रः – बनिए का पुत्र
प्रहृष्टमना: – प्रसन्न मान वाला
अभ्यागतेन – अतिथि
प्रस्थितः – अतिथि
स्नात्वा – नहा करके
गिरिगुहायां – पर्वत की गुफा में
प्रक्षिप्य – रखकर, बृहत्
शिलया – विशाल शिला से
आच्छाद्य – ढककर
सत्वरं – जल्दी
पृष्टः – पूछा
श्येन – बाज
क्वचित् – कोई
हृतः – ले जाया गया
मिथ्यावादिन् – झूठ बोलने वाले
सत्यवादिन् – सत्य बोलने वाले
समर्पय – लौटा दो, अन्यथा, नहीं तो।।
अर्थ-
उस सेठ ने अपने पुत्र से कहा-“पुत्र! ये तुम्हारे चाचा हैं, स्नान के लिए जा रहे हैं, तुम इनके साथ जाओ।” इस तरह वह बनिए का पुत्र धनदेव स्नान की वस्तुएँ लेकर प्रसन्न मन से उस अतिथि के साथ चला गया। तब वहाँ पुहँचकर और स्नान करके उस शिशु को पर्वत की गुफा में रखकर उसने गुफा के द्वार को एक बड़े पत्थर से ढक कर जल्दी से घर आ गया।
और उस सेठ ने पूछा- हे अतिथि! बताओ कहाँ है मेरा पुत्र, तुम्हारे साथ नदी पर गया था।
वह बोला- “तुम्हारे बेटे को नदी के किनारे से बाज उठाकर ले गया है”। सेठ ने कहा- “हे झूठे! क्या कहीं बाज बालक को ले जा सकता है? तो मेरा पुत्र लौटा दो अन्यथा मैं राजकुल में शिकायत करूँगा।” उसने कहा- “हे सत्य बोलने वाले! जैसे बाज बालक को नहीं ले जा सकता, वैसे ही चूहे भी लोहे की बनी हुई तराजू नहीं खाते हैं। यदि पुत्र को पाना चाहते हो तो मेरी तराजू लौटा दो।”
पर्यायपदानि
पदानि – पर्यायपदानि
अवदत् – उवाच
यास्यति – गमिष्यति
प्रक्षिप्य – स्थित्वा
सत्वरं – शीध्र
प्रह्ष्टमनाः – प्रसन्न:मना
पृष्टः – अपृच्छत्
साकम् – सार्धम्
सतः – पत्रः
निम्नपदानां – विलोमपदानि मेलयत
पदानि – विलोमपदानि
गतः – आगतः
सुतः – सुता:
विशेषण-विशेष्य-चयनम्
विशेषणम् – विशेष्यः
श्रेष्ठी – सः
लौहघटिताम् – तुलाम्
प्रहृष्टमनाः असौ – श्रेष्ठिपुत्रः
3. एवं विवदमानौ तौ द्वावपि राजकुलं गतौ। तत्र श्रेष्ठी तारस्वरेण अवदत्- “भोः! वञ्चितोऽहम्! वञ्चितोऽहम्! अब्रह्मण्यम्! अनेन चौरेण मम शिशुः अपहृतः” इति। अथ धर्माधिकारिणः तम् अवदन्- “भोः! समर्म्यतां श्रेष्ठिसुतः”। सोऽवदत्- “किं करोमि? पश्यतो मे नदीतटात् श्येनेन शिशुः अपहृतः”। इति। तच्छ्रुत्वा ते अवदन्-भोः! भवता सत्यं नाभिहितम्-किं श्येनः शिशुं हर्तुं समर्थो भवति? सोऽवदत्-भोः भोः! श्रूयतां मद्वचः
तुलां लौहसहस्रस्य यत्र खादन्ति मूषकाः।
राजन्तत्र हरेच्छ्येनो बालकं, नात्र संशयः॥
ते अपृच्छन्- “कथमेतत्”।
ततः स श्रेष्ठी सभ्यानामग्रे आदितः सर्वं वृत्तान्तं न्यदयत्। ततः न्यायाधिकारिणः विहस्य तौ द्वावपि सम्बोध्य तुला-शिशुप्रदानेन तोषितवन्तः।
शब्दार्थाः
विवदमानौ – झगड़ा करते हुए
द्वावपि – दोनों भी
गतौ – दोनों चले गए
तारस्वरेण – ज़ोर से
अवदन् – बोला,
वञ्चितोऽहम् – घोर अन्याय, अनुचित
अपहृतः – चुरा लिया गया
धर्माधिकारिणः – न्यायाधिकारी
पश्यतः – मेरे देखते हुए
श्रुत्वा – सुनकर
अभिहितम् – कहा गया
हरेत् – ले जा सकता है
संशयः – संदेह
सभ्यानाम् – सभासदों के
अग्रे – सामने
आदितः – शुरू से ही
वृतान्तम् – घटना
विहस्य – हँसकर
संबोध्य – समझा – बुझाकर,
तोषितवन्त: – दोनों संतुष्ट किए गए
अर्थ –
इस प्रकार झगड़ते हुए वे दोनों राजकुल में चले गए। वहाँ सेठ ने जोर से कहा- “अरे! अनुचित हो गया! अनुचित! मेरे पुत्र को इस चोर ने चुरा लिया।” इसके बाद न्यायकर्ताओं ने उससे कहा- “अरे! सेठ का पुत्र लौटा दो।” उसने कहा- “मैं क्या करूँ? मेरे देखते-देखते बाज बालक को नदी के तट (किनारे) से ले गया।” यह सुनकर सब बोले- अरे! आपने सच नहीं कहा- क्या बाज बालक को ले जा सकता है? उसने कहा- अरे, अरे! मेरी बात सुनिए हे राजन्! जहाँ लोहे से बनी तराजू को चूहे खा जाते हैं, वहाँ बाज बालक को उठाकर ले जा सकता है, इसमें संदेह नहीं। उन्होंने कहा-“यह कैसे हो सकता है।” इसके बाद उस सेठ ने सभासदों के सामाने शुरू से ही सारी घटना कह दी। तब हँसकर उन्होंने दोनों को समझा बुझाकर तराजू तथा बालक का आदान-प्रदान करके उन दोनों को प्रसन्न किया।
विशेषण-विशेष्य चयनम्
विशेषणम् – विशेष्यः
विवदमानौ – तौ
सर्व – वृत्तान्तं
पदानि – पर्यायपदानि
विवदमानौ – कहलं कुर्वन्तौ
निवेदयामास – निवेदनमकरोत्
संबोध्य – बोधयित्वा
आदितः – प्रारम्भतः
संशयः – संदेहः
Class 9 Sanskrit Chapter 9 सिकतासेतुः Summary Notes
सिकतासेतुः Summary
यह पाठ ‘कथासरित्सागर’ के सप्तम लम्बक से लिया गया है। मूलतः यह सोमदेव की रचना है। इसमें तपोदत्त नामक एक बालक तपस्या के बल पर विद्या प्राप्त करना चाहता है। तपोदत्त को एक व्यक्ति मिला जो बालू के द्वारा नदी पर पुल बना रहा था। वह यह देखकर उसका उपहास करने लगा। वह व्यक्ति तपोदत्त से कहने लगा कि जो व्यक्ति बिना अक्षर ज्ञान के विद्या प्राप्त करना चाहता है, वह व्यक्ति कहीं ज्यादा मूर्ख है। मैं जिस कार्य में लगा हुआ है, उसमें मुझे एक दिन सफलता अवश्य मिल जाएगी, परन्तु जो परिश्रम विद्या प्राप्त करना चाहता है, वह कभी सफल नहीं हो सकता।यह सुनकर तपोदत्त को बड़ी आत्मग्लानि हुई। वह पश्चाताप करने लगा। उसने उस व्यक्ति से कहा कि आपने मेरी आँखें खोल दी हैं। मैं आज से ही परिश्रम करूँगा। यह कहकर वह गुरुकुल में चला गया और विद्याभ्यास के द्वारा विद्वान बन गया।
सिकतासेतुः Word Meanings Translation in Hindi
1. (ततः प्रविशति तपस्यारतः तपोदत्तः)
तपोदत्तः – अहमस्मि तपोदत्तः। बाल्ये पितचरणैः क्लेश्यमानोऽपि विद्यां नाऽधीतवानस्मि। तस्मात् सर्वैः
कुटुम्बिभिः मित्रैः ज्ञातिजनैश्च गर्हितोऽभवम्।
(ऊर्ध्वं निःश्वस्य)
हा विधे! किम् इदं मया कृतम्? कीदृशी दुर्बुद्धिः आसीत् तदा। एतदपि न चिन्तितं यत्
परिधानैरलङ्कारैर्भूषितोऽपि न शोभते।
नरो निर्मणिभोगीव सभायां यदि वा गृहे॥1॥
(किञ्चिद् विमृश्य)
भवतु, किम् एतेन? दिवसे मार्गभ्रान्तः सन्ध्यां यावद् यदि गृहमुपैति तदपि वरम्। नाऽसौ भ्रान्तो मन्यते। अतोऽहम् इदानीं तपश्चर्यया विद्यामवाप्तुं प्रवृत्तोऽस्मि।
शब्दार्थाः
बाल्ये – बचपन में
पितृचरणैः – पिता के द्वारा
क्लेश्यमानः – व्याकुल किए जाने पर
कुटुम्बिभिः – परिवार सब सदस्यों के द्वारा
ज्ञातिजनैः – सम्बन्धियों के द्वारा
तदा – तब, उस समय
गर्हितः – अपमानित किया गया
ऊर्ध्व – ऊपर
निःश्वस्य – साँस लेना, हा विधे! हे विधाता
दुर्बुद्धिः – बुरी बुद्धि
चिन्तितम् – सोचा गया
परिधानैः – वस्त्रों से
भूषितः – सजा हुआ
निर्मणिभोगीव – मणिहीन साँप की तरह,
शोभते – सुशोभित होता है
विमृश्य – सोच कर
मार्गभ्रान्तः – मार्ग भूला हुआ
उपैति – आ जाता है
अवाप्तुम् – प्राप्त करने के लिए
तपश्चर्यया – तपस्या के द्वारा।
अर्थ- (इसके बाद तपस्या करता हुआ तपोदत्त प्रवेश करता है)
तपोदत्त – मैं तपोदत्त हूँ। बचपन में पूज्य पिताजी के द्वारा क्लेश किए जाने पर भी मैने विद्या नहीं पढ़ी। इसीलिए
परिवार के सब सदस्यों, मित्रों और सम्बन्धियों के द्वारा मेरा अपमान किया गया।
(ऊपर की ओर साँस छोड़कर)
हे प्रभो! मैंने यह क्या किया? उस समय मेरी कैसी दुष्ट बुद्धि हो गई थी! मैने यह भी नहीं सोचा कि वस्त्रों तथा आभूषणों से सुशोभित किन्तु विद्याहीन मनुष्य घर पर या सभा में उसी प्रकार सुशोभित नहीं होता है जिस प्रकार मणि से रहित साँप।
(कुछ सोचकर)
अच्छा, इससे क्या? दिन में रास्ता भूला हुआ मनुष्य यदि शाम तक घर आ जाए तो भी ठीक है। तब वह भूला हुआ नहीं माना जाता। अब मैं तपस्या के द्वारा विद्या प्राप्ति में लग जाता हूँ।
विशेषण-विशेष्य-चयनम्
विशेषणम् – विशेष्यः
तपस्यारतः – तपोदत्तः
गर्हितः – अहम्
निर्मणिभोगी – नरः
सर्वैः – कुटुम्बिभिः, मित्रैः, ज्ञातिजनैः
दुर् – बुद्धि
अव्ययानां वाक्येषु प्रयोगः
अपि (भी) – त्वम् अपि पठ।
न (नहीं) – सम्प्रति सः न आगमिष्यति।
यत् (कि) – सः अवदत् यत् अहं श्वः विद्यालयं न गमिष्यामि।
यदि (यदि) – यदि वर्षा भविष्यति तर्हि मयूरः नर्तिष्यति।
वा (अथवा/या) – रामः श्यामः वा कोऽपि एकः तत्र गच्छतु।
किञ्चित् (थोड़ा) – अहम् किञ्चित् खादितुम् इच्छामि।
यावत् (जब तक) – यावत् अहं पठामि तावत् त्वम् शयनं कुरु।
पर्यायपदानि
पदानि – पर्यायपदानि
बाल्ये – बाल्यकाले
कुटुम्बिभिः – परिवारजनैः
सिकता – बालुका
पितृचरणैः – तातपादैः
ज्ञातिजनैः – बन्धुबान्धवै
दुर्बुद्धिः – दुर्मतिः
अलङ्कारैः – आभूषणैः
मार्गभ्रान्तः – पथभ्रष्टः
तपश्चर्यया – तपसा
अधीतवान् – पठितवान्
तपस्यारतः – तपः कुर्वन्
सेतुः – जलबन्धः
क्लेश्यमानः – संताप्यमानः
गर्हितः – निन्दितः
परिधानैः – वस्त्रैः
शोभते – सुशोभितः
उपैति – समीपं गच्छति
अवाप्तुम् – प्राप्तुम्
2. (जलोच्छलनध्वनिः श्रूयते)
अये कुतोऽयं कल्लोलोच्छलनध्वनिः? महामत्स्यो मकरो वा भवेत्। पश्यामि तावत्।
(पुरुषमेकं सिकताभिः सेतुनिर्माण-प्रयास कुर्वाणं दृष्ट्वा सहासम्)
हन्त! नास्त्यभावो जगति मर्खाणाम! तीव्रप्रवाहायां नद्यां मूढोऽयं सिकताभिः
सेतुं निर्मातुं प्रयतते!
(साट्टहासं पार्श्वमुपेत्य)
भो महाशय! किमिदं विधीयते!
अलमलं तव श्रमेण। पश्य,
रामो बबन्ध यं सेतुं शिलाभिर्मकरालये।
विदधद् बालुकाभिस्तं यासि त्वमतिरामताम्॥2॥
चिन्तय तावत्। सिकताभिः क्वचित्सेतुः कर्तुं युज्यते?
शब्दार्था:
कल्लोलोच्छलनध्वनिः – तरंगों के उछलने की ध्वनि
मत्स्यः – मछली
मकर: – मगरमच्छ
सेतुनिर्माण – पुल बनाने
प्रयासं – कोशिश
कुर्वाणं – करते हुए
सहासम् – हँसते हुए
जगति – संसार में
प्रयतते – कोशिश कर रहा है
साट्टहासं – जोर से हँसकर
पार्व – पास
सिकताभिः – रेत से
बबन्ध – बाँधा था
उपेत्य – पास जाकर
शिलाभिः – पत्थरों से
मकरालये – समुद्र पर
विदधद् – करते हुए
अतिरामताम् – अतिक्रमण
यासि – कर रहे हो,
क्वचित् – कोई
युज्यते – सकता है
नद्याम् – नदी पर
अभावो – कमी
मूढो – मूर्ख।
अर्थ – (पानी के उछलने की आवाज़ सुनी जाती है)
तपोदत्त – अरे! यह लहरों के उछलने की आवाज़ कहाँ से आ रही है? शायद बड़ी मछली या मगरमच्छ हो। चलो मैं देखता हूँ।
(एक पुरुष को रेत से पुल बनाने का प्रयास करते हुए देखकर हँसते हुए)
हाय! इस संसार में मूों की कमी नहीं है। तेज़ प्रवाह (बहाव) वाली नदी में यह मूर्ख रेत से पुल बनाने का प्रयत्न कर रहा है।
(जोर-जोर से हँसकर पास जाकर)
हे महाशय! यह क्या कर रहे हो आप? बस-बस मेहनत मत करो। देखो –
श्रीराम ने समुद्र पर जिस पुल को शिलाओं से बनाया था,
उस पुल को (इस प्रकार) रेत से बनाते हुए,
तुम उनके पुरुषार्थ का अतिक्रमण कर रहे हो।
जरा सोचो! कहीं रेत से पुल बनाया जा सकता है?
विशेषण-विशेष्य-चयनम्
विशेषणम्
मूढः – अयम्
तीव्रप्रवाहायाम् – नद्याम्
एकम् – पुरुषम्
यम् – सेतुम्
अव्ययानां वाक्येषु प्रयोगः
पदानि – वाक्येषु प्रयोगः
कुतः (कहाँ से) – त्वम् कुतः आगच्छसि?
वा (अथवा) – तत्र एकः मत्स्यः मकरो वा भवेत्।
तावत् (तब तक) – तावत् गिरयः स्थास्यन्ति।
पावं (समीप) – गुरुः शिष्यस्य पार्वं गच्छति।
पर्यायपदानि
पदानि – पर्यायपदानि
सिकताभिः – बालुकभिः
सहासम् – हासेन सहितम्
जलोच्छलनध्वनिः – जलोर्ध्वगतेः शब्दः
मूर्खा: – मूढाः
दृष्ट्वा – अवलोक्य
जगति – संसारे
कल्लोलोच्छलनध्वनिः – तरङ्गोच्छलनस्य
कुर्वाणम् – कुर्वन्तम्
3. पुरुषः – भोस्तपस्विन्! कथं माम् अवरोधं करोषि। प्रयत्नेन किं न सिद्धं भवति? कावश्यकता शिलानाम्? सिकताभिरेव सेतुं करिष्यामि स्वसंकल्पदृढतया।
तपोदत्तः – आश्चर्यम् किम् सिकताभिरेव सेतुं करिष्यसि? सिकता जलप्रवाहे स्थास्यन्ति किम्? भवता चिन्तितं न वा?
पुरुषः – (सोत्प्रासम्) चिन्तितं चिन्ततम्। सम्यक् चिन्तितम्। नाहं सोपानसहायतया अधिरोढं विश्वसिमि समुत्प्लुत्यैव गन्तुं क्षमोऽस्मि।
तपोदत्तः – (सव्यङ्ग्यम्) साधु साधु! आञ्जनेयमप्यतिक्रामसि!
पुरुषः – (सविमर्शम् )
कोऽत्र सन्देहः? किञ्च,
विना लिप्यक्षरज्ञानं तपोभिरेव केवलम्।
यदि विद्या वशे स्युस्ते, सेतुरेष तथा मम॥3॥
शब्दार्थाः
अवरोधं करोषि – रोकते हो
सिद्धं – सफल
स्वसंकल्प दृढ़तया – अपने संकल्प की दृढ़ता से
सोत्प्रासम् – मजाक उड़ाते हुए
सोपानसहायतयाः – सीढ़ी की मदद से
अधिरोढुम् – चढ़ने के लिए
विश्वसिमि – विश्वास करता हूँ
समुत्प्लल्य – छलाँग मारकर
सव्यङ्ग्यम – व्यंग्य सहित
आञ्जनेयम – अञ्जनि पुत्र हनुमान को
अतिक्रामसि – तुम अतिक्रमण कर रहे हो
सविमर्शम् – सोच-विचार कर
किञ्च – इसके अतिरिक्त
विना लिप्यक्षरज्ञान – लिपि और अक्षर ज्ञान के बिना
तपोभिः – तपस्या के द्वारा
वशे स्युः – यदि वश में है
अर्थ – पुरुष – हे तपस्विन्! तुम मुझे क्यों रोकते हो? प्रयत्न करने से क्या सिद्ध नहीं होता? शिलाओं की क्या आवश्यकता?
मैं रेत से ही पुल बनाने के लिए संकल्पबद्ध हूँ।
तपोदत्त – आश्चर्य है! रेत से ही पुल बनाओगे? क्या तुमने यह सोचा है कि रेत पानी के बहाव पर कैसे ठहर पाएगी?
पुरुष – (उसकी बात का खण्डन करते हुए) सोचा है, सोचा है, अच्छी प्रकार सोचा है। मैं सीढ़ियों के मार्ग से
(परम्परागत तरीके से) अटारी पर चढ़ने में विश्वास नहीं करता। मुझमें छलाँग मारकर जाने की क्षमता है।
तपोदत्त – (व्यंग्यपूर्वक) शाबाश, शाबाश! तुम तो अञ्जनिपुत्र हनुमान का भी अतिक्रमण कर रहे हो।
पुरुष – (सोच-विचार कर) और क्या? इसमें क्या सन्देह है। लिपि तथा अक्षर-ज्ञान के बिना जिस प्रकार केवल तपस्या से विद्या तुम्हारे वश में हो जाएगी, उसी प्रकार मेरा यह पुल भी। (केवल रेत से बन जाएगा)
विशेषण-विशेष्य-चयनम्
विशेषणम् – विशेष्यः
एषः – सेतुः
अव्ययानां वाक्येषु प्रयोगः
पदानि – वाक्येषु प्रयोगः
कथं (कैसे) – त्वम् एतत् कार्यं कथं करिष्यसि?
साधु (ठीक) – साधु उक्तम्।
विना (बिना) ज्ञानं विना जीवनम् सफलं न भवति।
यदि (अगर) – यदि परिश्रमं करिष्यसि तदा सफलं भविष्यसि।
पर्यायपदानि
पदानि – पर्यायपदानि
उपरुणत्सि – अवरोधं करोषि
अट्टम् – अट्टालिकाम्
आञ्जनेयम – हनुमन्तम्
सिद्धम् – सफलं
सोत्प्रासम् – उपहासपूर्वकम्
अधिरोढुम् – उपरि गन्तुम्
सविमर्शम् – विचारसहितम्
4. तपोदत्तः – ( सवैलक्ष्यम् आत्मगतम्)
अये! मामेवोद्दिश्य भद्रपुरुषोऽयम् अधिक्षिपति! नूनं सत्यमत्र पश्यामि। अक्षरज्ञानं विनैव वैदुष्यमवाप्तुम् अभिलषामि! तदियं भगवत्याः शारदाया अवमानना। गुरुगृहं गत्वैव विद्याभ्यासो मया करणीयः। पुरुषाथैरेव लक्ष्य प्राप्यते।
(प्रकाशम्)
भो नरोत्तम! नाऽहं जाने यत् कोऽस्ति भवान्। परन्तु भवद्भिः उन्मीलितं मे नयनयुगलम्। तपोमात्रेण विद्यामवाप्तुं प्रयतमानः अहमपि सिकताभिरेव सेतुनिर्माणप्रयासं करोमि। तदिदानी विद्याध्ययनाय गुरुकुलमेव गच्छामि।
( सप्रणामं गच्छति)
शब्दार्थाः
सवैलक्ष्यम् – लज्जापूर्वक
आत्मगतम् – मन में
भद्रपुरुष – सज्जन
अधिक्षिपति – आक्षेप लगाना
वैदुष्यम् – विद्वता
अवाप्तुम् – प्राप्त करने की
अभिलषामि – इच्छा कर रहा हूँ
भगवत्याः – देवी की
शारदाया – शारदा का
अवमानना – अपमान
पुरुषार्थ – मेहनत
लक्ष्य – उद्देश्य
पुरुषार्थः – मेहनत से
प्रकाशम् – प्रकट रूप से
भो नरोत्तम! – हे महापुरुष
उन्मीलितं – खोल दिए हैं
प्रयतमानः – प्रयत्न करता हुआ
सिकताभिरैव – रेत से ही
सेतुनिर्माणप्रयासम् – पुल बनाने का प्रयत्न
तदिदानीम् – तो अब।
अर्थ- तपोदत्त-(लज्जापूर्वक अपने मन में)
अरे! यह सज्जन मुझे ही लक्ष्य करके आक्षेप लगा रहा है। निश्चय ही यहाँ मैं सच्चाई देख रहा हूँ। मैं बिना अक्षर ज्ञान के ही विद्वता प्राप्त करना चाहता हूँ। यह तो देवी सरस्वती का अपमान है। मुझे गुरुकुल जाकर ही विद्या का अध्ययन करना चाहिए। पुरुषार्थ (मेहनत) से ही लक्ष्य की प्राप्ति सम्भव है। (प्रकट रूप से) हे श्रेष्ठ पुरुष! मैं नहीं जानता कि आप कौन हैं? किन्तु आपने मेरे नेत्र खोल दिए। तपस्या मात्र से ही विद्या को प्राप्त करने का प्रयत्न करता हुआ मैं भी रेत से ही पुल बनाने का प्रयास कर रहा था, तो अब मैं विद्या प्राप्त करने के लिए गुरुकुल जाता हूँ।
(प्रणाम करता हुआ चला जाता है)
विशेषण-विशेष्य-चयनम्
विशेषणम् – विशेष्य
भगवत्याः – शारदायाः
भद्रः – पुरुषः
प्रयतमानः – अहम्
अयं – पुरुषः
उत्तमः – नरः
अव्ययानां वाक्येषु प्रयोगः पदानि
वाक्येषु – प्रयोगः
नूनं (निश्चितम्) – अहम् नूनं सत्यमेव पश्यामि।
विना (बिना) – अक्षरज्ञानं विना विद्या कथं अवाप्नोषि।
एव (ही) – गुरुकुलं गत्वा एव विद्याध्ययनं करोमि। पर्यायपदानि
पर्यायपदानि
पदानि – पर्यायपदानि
सवैलक्ष्यम् – सलज्जम्
उन्मीलितम् – उद्घाटितम्
पुरुषार्थः – उद्योगः उद्यमः
अवाप्तुम् – प्राप्तुम्
नदी – तरङ्गिणी
वैदुष्यम् – पाण्डित्यम्
विद्याध्ययनाय – विद्याध्ययनार्थं
अभिलषामि – इच्छामि
इदानीम् – अधुना
जलम् – वारि
Class 9 Sanskrit Chapter 10 जटायोः शौर्यम् Summary Notes
जटायोः शौर्यम् Summary
प्रस्तुत पाठ महाकाव्य ‘रामायणम्’ के अरण्यकांड से लिया गया है। इस महाकाव्य के रचयिता आदिकवि वाल्मीकि हैं। इस पाठ में जटायु और रावण के मध्य युद्ध का वर्णन है। पाठ का सार इस प्रकार है पंचवटी में सीता करुण विलाप करती है। उसके विलाप को सुनकर, पक्षिराज जटायु उसकी रक्षा के लिए आता है।
वह रावण को धिक्कारता है, परंतु रावण पर इसका कोई असर नहीं होता है। रावण की अपरिवर्तित मनोवृत्ति को देखकर जटायु उसके साथ युद्ध के लिए उद्यत हो जाता है। यद्यपि रावण युवा है और जटायु वृद्ध तथापि वह रावण को ललकारता है और कहता है कि मेरे जीवित रहते तुम सीता का अपहरण नहीं कर सकते। जटायु अपने पैने नाखूनों और पंजों से रावण पर आक्रमण करता है और उसके शरीर पर अनेक घाव कर देता है। जटायु रावण के धनुष को तोड़ डालता है।
इस प्रकार रावण रथ से विहीन, नष्ट घोड़ों और सारथी वाला हो जाता है। जटायु पर रावण लात से प्रहार करता है। जटायु हार नहीं मानता है तथा बदले में रावण पर आक्रमण करता है। वह रावण की दशों भुजाओं को उखाड़ डालता है। इस प्रकार इस पाठ में जटायु की शूरवीरता की कहानी कही गई है।
जटायोः शौर्यम् Word Meanings Translation in Hindi
1. सा तदा करुणा वाचो विलपन्ती सुदुःखिता।
वनस्पतिगतं गृधं ददर्शायतलोचना॥
शब्दार्था:-
तदा – तब, करुणा वाचो: – दुख भरी आवाज़ से, विलपन्ती – रोती हुई, सुदुःखिता – बहुत दुखी, वनस्पतिगतम् – वृक्ष पर बैठे हुए को, गृध्रम् – गिद्ध को, ददर्श – देखा, आयतलोचना-बड़ी – बड़ी आँखों वाली।
अर्थ – तब करुण वाणी में रोती हुई, बहुत दुखी और बड़ी-बड़ी आँखों वाली (सीता) ने वृक्ष पर (स्थित) बैठे हुए गीध्र (जटायु) को देखा।
विशेषण-विशेष्य-चयनम् ।
विशेषणम्
विशेष्यः विशेषणम् विशेष्यः वाचः
करुणा – वाचः
सुदु:खिता. – सा
वनस्पतिगतम् – गृध्रम्
विलपन्ती – सा
आयतलोचना – सा
अव्ययानां वाक्येषु प्रयोगः
तदा – तदा सीता जटायुम् अपश्यत्
2.जटायो पश्य मामार्य ह्रियमाणामनाथवत्।
अनेन राक्षसेन्द्रेण करुणं पापकर्मणा॥
शब्दार्था:-
जटायो – हे जटायु!, पश्य – देखो, माम् – मुझे (मुझ को), आर्य – श्रेष्ठ, ह्रियमाणाम् – हरी (हरण की) जाती हुई, अनाथवत् – अनाथ की तरह, अनेन -इस (से), राक्षसेन्द्रेण – राक्षसराज के द्वारा, करुणम् – दुखी, पापकर्मण-पापकर्म वाले।
अर्थ – हे आर्य जटायु! इस पापकर्म करने वाले राक्षस राज (रावण) के द्वारा अनाथ की तरह हरण की जाती हुई मुझ दुखी को देखो।
विशेषण-विशेष्य-चयनम्
आर्य – जटायो
अनेन/पापकर्मणा – राक्षसेन्द्रेण
ह्रियमाणाम्/करुणाम् – माम्
क्रियापद-वाक्येषु प्रयोगः
क्रियापदम् – वाक्येषु प्रयोगः
पश्य – त्वम् तम् बालकं पश्य।
3. तं शब्दमवसुप्तस्तु जटायुरथ शुश्रुवे।
निरीक्ष्य रावणं क्षिप्रं वैदेहीं च ददर्श सः॥
शब्दार्था:- तम् – उस (को), शब्दम् – शब्द को, अवसुप्तः – सोए हुए, तु – तो, रावणम् – रावण को, क्षिप्रम् – शीध्र, जटायुः – जटायु ने, अथ – इसके बाद, शश्रुवे – सुना, निरीक्ष्य – देखकर, वैदेहीम् – सीता को, ददर्श – देखा।
अर्थ – इसके बाद सोए हुए जटायु ने उस शब्द को सुना तथा रावण को देखकर और उसने शीध्र ही वैदेही (सीता) को देखा।
अव्ययानां वाक्येषु प्रयोगः
पदानि – वाक्येषु प्रयोगः
अथ – अथ श्रीराम कथा।
क्षिप्रम् – विद्यालयं क्षिप्रम् गच्छ।
च – वनम् अगच्छताम्
विशेषण-विशेष्य चयनम्
विशेषणम् – विशेष्यः
तम् – शब्दम्
अवसुप्तः, सः – जटायुः
4. ततः पर्वतशृङ्गाभस्तीक्ष्णतुण्डः खगोत्तमः।
वनस्पतिगतः श्रीमान्व्याजहार शुभां गिरम्॥
शब्दार्थाः –
ततः-उसके बाद, पर्वतश्रृंगाभः-पर्वत की चोटी की तरह शोभा वाले, तीक्ष्णतुण्डः-तीखी चोंच वाले, खगोत्तमः-पक्षियों में उत्तम, गिरम्-वाणी को, वनस्पतिगतः-वृक्ष पर स्थित, श्रीमान्-शोभायुक्त, व्याजहार-बोला (कहा), शुभाम्-सुदर।
अर्थ – उसके बाद (तब) पर्वत शिखर की तरह शोभा वाले, तीखे चोंच वाले, वृक्ष पर स्थित, शोभायुक्त पक्षियों में उत्तम (जटायु) ने सुंदर वाणी में कहा।
अव्ययानां वाक्येषु प्रयोगः
ततः – ततः रामः सीताम् अवदत्
विशेषण-विशेष्य-चयनम्
विशेषणम् – विशेष्यः विशेषणम् विशेष्यः
पर्वतशृङ्गाभः – खगोत्तमः (जटायुः)
वनस्पतिगतः – खगोत्तमः (जटायुः)
शुभाम् – गिरम्
तीक्ष्णतुण्डः – खगोत्तमः (जटायुः)
श्रीमान् – खगोत्तमः (जटायुः)
5. निवर्तय मतिं नीचां परदाराभिमर्शनात्।
न तत्समाचरेद्धीरो यत्परोऽस्य विगर्हयेत्॥
शब्दार्था: –
निवर्तय-मना करो, रोको, मतिम्-बुद्धि (विचार) को, परदारा-पराई स्त्री के, अभिमर्शनात्- स्पर्श दोष से, अस्य-इसकी, तत्-वह (उस तरह का), समाचरेत्-आचरण करना चहिए, धीरः-बुद्धिमान (धैर्यशाली) को, यत्-जो (जिसे), परः-दूसरे लोग, विगर्हयेत्-निंदा (बुराई) करें, नीचाम-नीच (गंदी)।
अर्थ – पराई नारी (परस्त्री) के स्पर्शदोष से तुम अपनी नीच बुद्धि (नीच विचार) को हटा लो, क्योंकि बुद्धिमान (धैर्यशाली) मनुष्य को वह आचरण नहीं करना चाहिए, जिससे कि दूसरे लोग उसकी निंदा (बुराई) करें।
अव्ययानां वाक्येषु प्रयोगः
पदानि – वाक्येषु प्रयोगः
तत्-यत् – त्वं कदापि तत् न कुर्याः यत् जनाः वर्जयन्ति।
विशेषण-विशेष्य-चयनम्
विशेषणम् विशेष्यः
नीचाम् – मतिम्
विलोमपदानि
पदानि – विलोमपदानि
तत् – यत्
समाचरेत् – विगर्हयेत्
6. वृद्धोऽहं त्वं युवा धन्वी सरथः कवची शरी।
न चाप्यादाय कुशली वैदेहीं मे गमिष्यसि॥
शब्दार्थाः-
वृद्धः-बूढा, अहम्-मैं, युवा-जवान (युवक), धन्वी- धनुषधारी, सरथः-रथ से युक्त, कवची-कवच वाले, शरी-बाणों वाले, आदान-लेकर, कुशली-कुशलतापूर्वक, वैदेहीम्-सीता को, मे-मेरे (रहते), गमिष्यसि- जा सकोगे।
अर्थ – मैं (तो) बूढा हूँ परंतु तुम युवक (जवान) हो, धनुषधारी हो, रथ से युक्त हो, कवचधारी हो और बाण धारण किए हो। तो भी मेरे रहते सीता को लेकर नहीं जा सकोगे।
विशेषण-विशेष्या-चयनम्
विशेषणम् – विशेष्यः
वृद्धः – अहम् युवा, धन्वी, सरथः, कवची, शरी
कुशली – त्वम्
विलोमपदानि ।
पदानि – विलोमपदानि
वृद्धः – युवा
अहम् – त्वम्
7. तस्य तीक्ष्णनखाभ्यां तु चरणाभ्यां महाबलः।
चकार बहुधा गात्रे व्रणान्पतगसत्तमः।
शब्दार्था:- तस्य-उसके (जटायु के), तीक्ष्णनखाभ्याम्-तेज नाखूनों से, चरणाभ्याम्-पैरों से, महाबल:- बहुत बलशालो, पतगसत्तमः-पक्षियों में उत्तम (श्रेष्ठ), चकार-कर दिए, बहुधा-बहुत से, गात्रे-शरीर पर, व्रणान्-घावों को।
अर्थ – उस उत्तम तथा अतीव बलशाली पक्षी (राज) ने अपने तीखे नाखूनों तथा पैरों से उस (रावण) के शरीर पर बहुत से घाव कर दिए।
अव्ययानां वाक्येषु प्रयोगः
पदानि – वाक्येषु प्रयोग
तु – सः तु मम भ्राता वर्तते।
बहुधा – तेन बहुधा सत्कार्यं कृतम्।
विशेषण-विशेष्य-चयनम्
विशेषणम् – विशेष्यः
तीक्ष्णनखाभ्याम् – चरणाभ्याम्
महाबलः – पतगसत्तमः
8. ततोऽस्य सशरं चापं मुक्तामणिविभूषितम्।
चरणाभ्यां महातेजा बभञ्जास्य महद्धनु॥
शब्दार्थाः-
ततः-उसके बाद, अस्य-इसके, सशरम्-बाणों के सहित, चापम्- धनुष को, मुक्तामणिविभूषितम्-मोतियों और मणियों से सजे हुए, चरणाभ्याम्-दोनों पैरों से, महातेजा-महान तेजस्वी, बभञ्ज-तोड़ दिया, अस्य-इसके, मृहद्धनु:-विशाल धनुष को।
अर्थ – उसके बाद उस महान तेजस्वी (जटायु) ने मोतियों और मणियों से सजे हुए बाणों सहित उसके (रावण के) विशाल धनुष को अपने पैरों से तोड़ डाला।
अव्ययानां वाक्येषु प्रयोगः
ततः – ततः छात्रः स्वपुस्तकं नीत्वा अपठत्
विशेषण-विशेष्य चयनम्
विशेषणम् – विशेष्यः
सशरम् – चापम्
महातेजा – सः (जटायुः)
महत्, मुक्तामणिविभूषितम् – धनुः
9. स भग्नधन्वा विरथो हताश्वो हतसारथिः।
तलेनाभिजघानाशु जटायुं क्रोधमूछितः ॥
शब्दार्थाः- सः-वह, भग्नधन्वा-टूटे हुए धनुषवाला, विरथः-रथ से रहित, हताश्वः-मारे गए घोड़ों वाला पर, हतसारथिः-मारे गए सारथि वाला, तलेन-मूंठ से, अभिजघान-हमला या प्रहार किया, आशु-शीघ्र, क्रोधमूर्च्छितः-बहुत क्रोधी
अर्थ – (तब) टूटे हुए धनुष वाले, रथ से विहीन, मारे गए घोड़ों व सारथि वाले अत्यन्त क्रोधित उसने तलवार की अत्यन्त क्रोधित मँठ से शीघ्र ही जटाय पर घातक प्रहार किया।
पर्यायापदानि
पदानि – पर्यायापदानि
हताश्वः – हताः अश्वाः यस्य सः
अभिजघानं – आक्रान्तवान
आशु – शीघ्रम्
विशेषण-विशेष्य-चयनम्
विशेषणम् – विशेष्यः
सः – रावणः
विरथः – रावणः
हताश्वः – रावणः
हतसारथिः – रावणः
अव्यानां वाक्येषु प्रयोगः
आशु – बालकाः आशु विद्यालयं गच्छन्ति
10. जटायुस्तमतिक्रम्य तुण्डेनास्य खगाधिपः।
वामबाहून्दश तदा व्यपाहरदरिन्दमः ॥
शब्दार्था:-
जटायुः – जटायु ने, तम्-उसको, अतिक्रम्य-झपट करके, तुण्डेन-चोंच से, अस्य-उसके (रावण के),
खगाधिपः-पक्षियों के राजा, वाम–बाईं ओर की, बाहूम्-भुजाओं को, व्यपाहरत्-नष्ट कर दिया, अरिन्दमः-शत्रुाओं का नाश करने वाला।
अर्थ – तब उस पक्षीराज जटायु ने शत्रुओं का नाश करने वाली अपनी चोंच से झपटकर (अक्रमण करके) उसके (रावण के) बाईं ओर की दसों भुजाओं को नष्ट कर दिया।
अव्ययानां वाक्येषु प्रयोगः
तदा – यदा कन्या गृहं गतवती तदा माता प्रासीदत्।
विशेषण-विशेष्य-चयनम्
विशेषणम् – विशेष्यः
खागाधिपः अरिन्दमः – जटायुः
दश – बाहून् ।
Class 9 Sanskrit Chapter 11 पर्यावरणम् Summary Notes
पर्यावरणम् Summary
प्रस्तुत पाठ पर्यावरण की समस्या को ध्यान में रखकर लिखा गया एक लघु निबंध है। आज मनुष्य का वातावरण बुरी तरह प्रदूषित हो गया है। पर्यावरण को प्रदूषित करने में मानव का सर्वाधिक योगदान है। मनुष्य ने अपनी दुर्बुद्धिवश जल, मृदा, वायु आदि को प्रदूषित कर दिया है। कारखानों का विषाक्त कचरा जल में डाला जाता है।
इससे जल पीने योग्य नहीं रह जाता है, जबकि जल मनुष्य की महती आवश्यकता है। प्रतिदिन वृक्षों को काटा जा रहा है। इस प्रकार हरियाली का नाश हो रहा है। इससे मनुष्य को शुद्ध वायु उपलब्ध नहीं होती है। वाहनों की होड़ भी वायु को प्रदूषित कर रही है। वाहनों के धुएँ से वायु अत्यधिक जहरीली हो चुकी है।
इसमें न केवल मानव अपितु अन्य जीवों का भी जीवित रहना कठिन हो गया है। मनुष्य को प्रकृति की रक्षा करनी चाहिए। अधिकाधिक वृक्षों का रोपण करना चाहिए। वृक्षों की कटाई शीघ्र बंद करनी चाहिए। जल के स्रोतों को प्रदूषण मुक्त करना चाहिए। ऊर्जा का संरक्षण करना चाहिए। सभी प्राणियों की रक्षा करनी चाहिए। इन कदमों से ही मानव-जीवन सुखद बनेगा।
पर्यावरणम् Word Meanings Translation in Hindi
1. प्रकृतिः समेषां प्राणिनां संरक्षणाय यतते। इयं सर्वान् पुष्णाति विविधैः प्रकारैः, सुखसाधनैः च तर्पयति ।
पृथिवी, जलं, तेजः, वायुः, आकाशः च अस्याः प्रमुखानि तत्त्वानि। तान्येव मिलित्वा पृथक्तया वाऽस्माकं पर्यावरणं रचयन्ति। आवियते परितः समन्तात् लोकः अनेन इति पर्यावरणम्। यथा अजातश्शिशुः मातृगर्भे सुरक्षितः तिष्ठति तथैव मानवः पर्यावरणकुक्षौ। परिष्कृतं प्रदूषणरहितं च पर्यावरणम् अस्मभ्यं सांसारिक जीवनसुखं, सद्विचारं, सत्यसङल्पं माङ्गलिकसामग्रीञ्च प्रददाति। प्रकृतिकोपैः आतङितो जनः किं कर्त प्रभवति? जलप्लावनैः, अग्निभयैः, भूकम्पैः, वात्याचक्रैः, उल्कापातादिभिश्च सन्तप्तस्य मानवस्य क्व मङ्गलम्?
शब्दार्था:-
यतते-कोशिश करती है, संरक्षणाय-रक्षा के लिए, पुष्णाति-पुष्ट करता है, तर्पयति-तृप्त (संतुष्ट) करती है, तेज-अग्नि, आवियते-आच्छादित किया जाता है, परितः-चारों तरफ से, समन्तात्-चारों तरफ से, अजातः शिशुः-अजन्मा शिशु, मातृगर्भे-माता के गर्भ में, कुक्षौ-गर्भ में, परिष्कृतं-शुद्ध, लोकः-संसार, सुरक्षितः-सुरक्षित, प्रदूषणरहितम्-प्रदूषण से रहित, सद्विचारं-अच्छे विचार, सत्यसङ्कल्पम्-अच्छे संकल्प, माङ्गलिकसामग्रीम्-मंगल सामग्री, प्रकृतिकोपैः-प्रकृति के गुस्से से, अतङ्किकतः-व्याकुल, प्रभवति-समर्थ है, जलप्लावनैः-बाढ़ों से, भूकम्पैः-भूचालों से, वात्यचक्रैः-आँधी, बावंडर, उल्कापातादिभिः-उलका आदि के गिरने से, सन्तप्त-दुखी, क्व-कहाँ, मङ्गलम्-कल्याण।
अर्थ-
प्रकृति सब प्राणियों की रक्षा के लिए प्रयत्न करती है। यह विभिन्न प्रकार से सबको पुष्ट करती है तथा सुख-साधनों से’ तृप्त करती है। पृथ्वी, जल, तेज़, वायु और आकाश ये इसके प्रमुख तत्व हैं। ये ही मिलकर या अलग-अलग हमारे पर्यावरण को बनाते हैं। संसार जिसके द्वारा सब ओर से आच्छादित किया जाता है, वह ‘पर्यावरण’ कहलाता है। जिस प्रकार अजन्मा (जिसने जन्म नहीं लिया है) शिशु अपनी माता के गर्भ में सुरक्षित रहता है, उसी प्रकार मनुष्य पर्यावरण की कोख में (सुरक्षित रहता है)।
परिष्कृत (शुद्ध) तथा प्रदूषण से रहित पर्यावरण हमें सांसारिक जीवन-सुख, अच्छे विचार, अच्छे संकल्प तथा मांगलिक सामग्री देता है। प्रकृति के क्रोधों से व्याकुल मनुष्य क्या कर सकता है? बाढ़, अग्निभय, भूकंपों, आँधी-तूफानों तथा उल्का आदि के गिरने से संतप्त (दुखी) मानव का कहाँ कल्याण है? अर्थात् कहीं नहीं।
विशेषण-विशेष्य-चयनम्
विशेषणम् – विशेष्यः
विविधैः – प्रकारैः
प्रमुखानि – तत्त्वानि
आतङ्कितः – जनः
समेषां – प्राणिनां
विशेषणम् – विशेष्यः
विविधैः – सुखसाधनैः
सांसारिकं – जीवनसुखं
सन्तप्तस्य – मानवस्य
इयं – प्रकृतिः
अव्ययानां वाक्येषु प्रयोगः
पदानि च (और) – प्रकृतिः विविधैः पकारैः सर्वान् पुष्णाति तर्पयति च।
यथा-तथा (जैसा-वैसा) – यथा परिश्रमं तथा फलम्।
एव (ही) – सः एवम् एव करिष्यति।
पर्यायपदानि
पदानि – पर्यायपदानि
समेषां – सर्वेषां
तर्पयति – संतुष्टं करोति
आवियते – आच्छादितं क्रियते
कुक्षौ – गर्भ
परितः – समन्तात्
जलप्लावनैः – जलौघैः
यतते – प्रयत्नं करोति
पुष्णाति – पोषणं करोति
अजात:शिशुः – अनुत्पन्नः जातकः
लोकः – संसारः –
परिष्कृतम् – शुद्धम्
वात्याचक्रैः – वातचक्रैः
विलोमपदानि
पदानि – विलोमपदानि
तर्पयति – अतर्पयति
सुरक्षितः – असुरक्षितः
परिष्कृतं – अपरिष्कृतं
सांसारिकम् – असांसारिकम्
सद्विचारम् – कुविचारम्
माङ्गलिकम् – अमाङ्गलिकम्
आतङ्किकतः – अभयः
अजातशिशुः – विलोमपदानि
मानवः – पशुः/दानवः
प्रदूषणरहितः – प्रदूषितः
सुखम् – दुखम्
सत्यम् – असत्यम्
प्रददाति – ग्रह्णाति
2. अत एव अस्माभिः प्रकृतिः रक्षणीया। तेन च पर्यावरणं रक्षितं भविष्यति। प्राचीनकाले लोकमङ्गलाशंसिनः ऋषयो वने निवसन्ति स्म। यतो हि वने सुरक्षितं पर्यावरणमुपलभ्यते स्म। विविधा विहगाः कलकूजिश्रोत्ररसायनं ददति। सरितो गिरिनिर्झराश्च अमृतस्वादु निर्मलं जलं प्रयच्छन्ति। वृक्षा लताश्च फलानि पुष्पाणि इन्धनकाष्ठानि च बाहुल्येन समुपहरन्ति। शीतलमन्दसुगन्धवनपवना औषधकल्पं प्राणवायु वितरन्ति।
शब्दार्थाः-
अत एव-इसलिए, रक्षणीया-रक्षा करने योग्य, प्राचीनकाले-पुराने समय में, लोकमङ्गलाशासिनः-जनता का कल्याण चाहने वाले, ऋषयः-ऋषि (सारे), निवसन्ति स्म- रहते थे, यतः-क्योंकि, उपलभ्यते-प्राप्त होता है, विहगाः-पक्षी, कलकूजितैः-मधुर कूजन से, श्रोत्ररसायनम्-कानों को अच्छा लगने वाला, ददति-देते हैं, सरितः-नदियाँ, गिरिनिर्झरा-पर्वतीय झरने, अमृतस्वादु-अमृत के समान स्वादिष्ट, निर्मलम्-पवित्र, बाहुल्येन-अधिकता, औषधकल्पम्-दवाई के समान, वितरन्ति-बाँटते हैं, इन्धन काष्ठानि-जलाने की लकड़ियाँ।
अर्थ- इसलिए हमें प्रकृति की रक्षा करनी चाहिए। उससे पर्यावरण अपने-आप सुरक्षित हो जाएगा। प्राचीनकाल में जनता का कल्याण चाहने वाले ऋषि वन में ही रहते थे क्योंकि वन में ही सुरक्षित पर्यावरण प्राप्त होता था। अनेक प्रकार के पक्षी अपने मधुर कूजन से वहाँ कानों को अन्त प्रदान करते हैं।
नदियाँ तथा पर्वतीय झरने अमृत के समान स्वादिष्ट और पवित्र जल देते हैं। पेड़ तथा लताएँ फल, फूल तथा इंधन की लकड़ी बहुत मात्राा में देते हैं। वन की शीतल (ठंडी), मंद तथा सुगंधित वायु औषध के समान प्राण-वायु बाँटते हैं।
विशेषण-विशेष्य चयनम्
विशेषणम् – विशेष्य:
विविधाः – विहगाः
शीतल:/मन्दः – वनपवनः
निर्मलम् – जलम
सुगन्धः – विशेष्यः
अव्ययानां वाक्येषु प्रयोगः
पदानि – वाक्येषु प्रयोगः
अतएव (इसलिए) – अतएव प्रकृतिः अस्माभिः रक्षणीया अस्ति।?
यतः (क्योंकि) – यतः सः वने एव सुरक्षितम् अस्ति।
विलोमपदानि
पदानि – विलोमपदानि
अस्माभिः – युष्माभिः
प्राचीनकाले – आधुनिक काले
बाहुल्येन – अल्पेन/अल्पतया
भविष्यति – आसीत्
सुरक्षितम् – असुरक्षितम्
3. परन्तु स्वार्थान्धो मानवः तदेव पर्यावरणम् अद्य नाशयति। स्वल्पलाभाय जना बहमल्यानि वस्तुनि नाशयन्ति। जनाः यन्त्रागाराणां विषाक्तं जलं नद्यां निपातयन्ति। तेन मत्स्यादीनां जलचराणां च क्षणेनैव नाशो भवति। नदीजलमपि तत्सर्वथाऽपेयं जायते। मानवा: व्यापारवर्धनाय वनवृक्षान् निर्विवेकं छिन्दन्ति। तस्मात् अवृष्टिः प्रवर्धते, वनपशवश्च शरणरहिता ग्रामेषु उपद्रवं विदधति। शुद्धवायुरपि वृक्षकर्तनात् सङ्कटापन्नो जायते। एवं हि स्वार्थान्धमानवैः विकृतिम् उपगता प्रकृतिः एव सर्वेषां विनाशकी भवति। विकृतिमुपगते पर्यावरणे विविधाः रोगाः भीषणसमस्याश्च सम्भवन्ति तत्सर्वमिदानी चिन्तनीयं प्रतिभाति।
शब्दार्था:-
अद्य-आज, नाशयति-नष्ट कर रहा है, स्वल्पलाभाय-थोड़े से लाभ के लिए, यन्त्रागाराणाम्-कारखानों के, विषाक्तम्-विषैला, जलचराणां-पानी में रहने वाले जीवों का, अपेयम्-न पीने योग्य, जायते-हो जाता है, वनवृक्षाः-जंगल के पेड़; निर्विवेकम्-अकारण, अवृष्टि:-वर्षा की कमी, प्रवर्धते-बढ़ती है, वनपशवः-जंगली पशु, शरणरहिता:-बिना शरण के, वृक्षकर्तनात्-पेड़ों के काटने से, उपद्रवं-भय, विदधति-करते हैं, सङ्कटापन्नो-संकटयुक्त, जायते-होती है, विकृतिम्-विकारयुक्त, उपगता-हो गई है, विनाशकी-विनाश करने वाली, भवति–हो गई है, इदानीम्-अब, चिन्तनीयम्-चिंता से युक्त, प्रतिभाति-प्रतीत हो रहा है।
अर्थ –
किंतु स्वार्थ में अंधा हुआ मनुष्य उसी पर्यावरण को आज नष्ट कर रहा है। थोड़े से लाभ के लिए लोग बहुमूल्य वस्तुओं को नष्ट कर रहे हैं। कारखानों का विषैला जल नदियों में गिराया जा रहा है, जिससे मछली आदि जलचरों का क्षणभर में ही नाश हो जाता है। नदियों का पानी भी सर्वथा (हर प्रकार से) न पीने योग्य (अपेय) हो जाता है। वन के पेड़ व्यापार बढ़ाने के लिए अंधाधुंध काटे जाते हैं, जिससे अवृष्टि (वर्षा न होना) में वृद्धि होती है तथा वन के पशु असहाय (बिना सहायता के) होकर गाँवों में उपद्रव उत्पन्न करते हैं। पेड़ों के कट जाने से शुद्ध वायु भी दुर्लभ हो गई है। प्रकार स्वार्थ में अंधे मनुष्यों के द्वारा विकारयुक्त प्रकृति ही उनकी विनाशिनी हो गई है। पर्यावरण में विकार आ जाने से
विभिन्न रोग तथा भयंकर समस्याएँ उत्पन्न हो रही हैं। इसलिए अब सब कुछ चिंतायुक्त प्रतीत हो रहा है।
विशेष्यः
विशेषण-विशेष्य-चयनम्
विशेषणम् – विशेष्यः
बहुमूल्यानि – वस्तूनि
विविधाः – रोगाः
विनाशकी – प्रकृतिः
विषाक्तम् – जलम्
उपगता – प्रकृतिः
सङ्कटापन्नः – शुद्धवायुः
यन्त्रागाराणाम् – यन्त्रालयानाम्
वृक्षकर्तनात् – वृक्षाणाम् उच्छेदात्
मत्स्यः – मीन:
निर्विवेकम् – विवेकम् रहितम्
जातः – अभवत्
इदानीम् – अधुना
अपेयम् – पातुम् आयोग्यम्
अद्य – अधुना
नाशः – नष्टम्
अवृष्टि – वर्षा रहितः
भीषणः – भयङ्करः
चिन्तनीयम् – शोचनीयम्
स्वार्थ – परार्थ
अद्य – पुरा
विषाक्तम् – अविषाक्तम्
निर्विवेकम् – सविवेकम्
अवष्टिः – वृष्टिः
अन्धः – नेत्रयुक्तः
बहुमूल्यानि – अल्पमूल्यानि
अपेयम् – पेयम्
विनाशकी – उपकर्त्री
4. धर्मो रक्षति रक्षितः इत्यार्षवचनम्। पर्यावरणरक्षणमपि धर्मस्यैवाङ्गमिति ऋषयः प्रतिपादितवन्तः। अत एव वापीकूपतडागादिनिर्माणं देवायतन-विश्रामगृहादिस्थापनञ्च धर्मसिद्धेः स्रोतो रूपेण अङ्गीकृतम्। कुक्कुर-सूकर-सर्प-नकुलादि-स्थलचराः, मत्स्य-कच्छप-मकरप्रभृतयः जलचराश्च अपि रक्षणीयाः, यतः ते स्थलमलानाम् अपहारिणश्च। प्रकृतिरक्षया एव लोकरक्षा सम्भवति इत्यत्र नास्ति संशयः।
शब्दार्थाः
रक्षित-रक्षा किया गया, रक्षति-रक्षा करता है, आर्षवचनम्-ऋषियों के वचन, प्रतिपादितवन्तः-प्रतिपादित किया है, वापी-बावड़ी, कूप-कुएँ, तडाग-तालाब, देवायतन-मंदिर, विश्रामगृहादिस्थापन-विश्रामगृह बनवाना, संशयः-संदेह, धर्मसिद्धेः-धर्म की सिद्धि के, अङ्गीकृतम्-माने गए हैं, कुक्कुरः-कुत्ता, नकुलः-नेवला, सर्पः-साँप, स्थलचरः-पृथ्वी पर रहने वाले जीव, सूकरः-सूअर, मत्स्यः-मछली, कच्छपः-कछुआ, मकर:-मगरमच्छ, जलचरः-पानी में रहने वाली जीव। स्थलमलानाम् अपनोदिनः-पृथ्वी की गंदगी को दूर करने वाले, सम्भवति-संभव है।
अर्थ-
‘रक्षा किया गया धर्म रक्षा करता है’-ये ऋषियों के वचन हैं। पर्यावरण की रक्षा करना भी धर्म का ही अंग है-ऐसा ऋषियों ने प्रतिपादित किया है। इसीलिए बावड़ी, कुएँ, तालाब आदि बनवाना, मंदिर, विश्रामगृह आदि की स्थापना धर्मसिद्धि के साधन के रूप में ही माने गए हैं। कुत्ते, सूअर, साँप, नेवले आदि स्थलचरों तथा मछली, कछुए, मगरमच्छ आदि जलचरों की भी रक्षा करनी चाहिए, क्योंकि ये पृथ्वी तथा जल की मलिनता को दूर करने वाले हैं। प्रकृति की रक्षा से ही संसार की रक्षा हो सकती है। इसमें संदेह नहीं है।
विशेषण-विशेष्य चयनम्
विशेषणम् – विशेष्यः
रक्षितः – धर्मों
अव्ययानां वाक्येषु प्रयोगः
पदानि – वाक्येषु प्रयोगः
इति (ऐसा) – धर्मों रक्षति रक्षितः इति आर्ष वचनम्।
ततः (उसके बाद) – ततः स अगच्छत्।
एव (ही) – सः मालाकारः एव अस्ति।
पर्यायपदानि
पदानि – पर्यायपदानि
आर्षः – ऋषयः
देवायतनम् – देवालयः, मन्दिरम्
कुक्कुरः – श्वानः
मत्स्यः – मीन:
अङ्गीकृतम् – स्वीकृतम्
प्रतिपादितवन्तः – कथितः
तडागः – सरोवरः
सर्पः – भुजंगः
स्थलमलापनोदिनः – भूमिमलापसारिणः
विलोमपदानि
पदानि – विलोमपदानि
धर्मः – अधर्मः
अङ्गीकृतम् – अनङ्गीकृतम्
रक्षणीयाः – अरक्षणीयाः
संशयः – असंशयः
रक्षितः – अरक्षितः
जलचराः – स्थलचराः
सम्भवति – असम्भवति
Class 9 Sanskrit Chapter 12 वाङ्मनःप्राणस्वरूपम् Summary Notes
वाङ्मनःप्राणस्वरूपम् Summary
यह पाठ छान्दोग्योपनिषद् के छठे अध्याय के पाँचवें खण्ड से उद्धृत है। इसमें एक रोचक विवरण प्रस्तुत किया गया है। श्वेतकेतु आचार्य आरुणि से प्रश्न करता है कि मन क्या है? आचार्य उसे बताते हैं कि खाए गए अन्न का जो सर्वाधिक लघु अंश होता है, वह मन है। श्वेतकेतु पुनः प्रश्न करता है कि प्राण क्या है? आचार्य उसे बताते हैं कि पान किए जल का जो सर्वाधिक लघु अंश होता है, वह प्राण है।
श्वेतकेतु तीसरा प्रश्न करता है कि वाणी क्या है? आचार्य उसे बताते हैं कि खाए गए तेज का सर्वाधिक लघु अंश वाणी है। आचार्य श्वेतकेतु को दृष्टान्त के द्वारा समझाते हैं कि जिस प्रकार दही को मथने पर घी निकलता है, उसी प्रकार खाए गए अन्न का जो लघुतम अंश ऊपर आ जाता है, वही मन है। इसी प्रकार वे प्राण और वाणी का रहस्य भी बताते हैं। अन्त में आचार्य कामना करते हैं कि हम दोनों का पढ़ा हुआ ज्ञान तेजस्वी हो।
वाङ्मनःप्राणस्वरूपम् Word Meanings Translation in Hindi
श्वेतकेतुः – भगवन्! श्वेतकेतुरहं वन्दे।
आरुणिः – वत्स! चिरञ्जीव।
श्वेतकेतुः – भगवन्! किञ्चित्प्रष्टुमिच्छामि।
आरुणिः – वत्स! किमद्य त्वया प्रष्टव्यमस्ति?
श्वेतकेतुः – भगवन्! ज्ञातुम् इच्छामि यत्
किमिदं मनः?
आरुणिः – वत्स! अशितस्यान्नस्य
योऽणिष्ठः तन्मनः।
शब्दार्थाः-
वन्दे-प्रणाम करता हूँ, चिरञ्जीव-लम्बी आयु वाले बनो, किञ्चित्-कुछ, प्रष्टुम्-पूछना, इच्छामि-चाहता हूँ, अद्य-आज, प्रष्टव्यम्-पूछने योग्य, इदम्-यह, किम्-क्या, मन:-मन, चित्त, अशितस्य-खाए गए, अणिष्ठः – सबसे छोटा, अन्नस्य-भोजन का, यः-जो, तत्-वह।
अर्थ- श्वेतकेतु – हे भगवन्! मैं श्वेतकेतु (आपको) प्रणाम करता हूँ।
आरुणि – हे पुत्र! दीर्घायु हो।
श्वेतकेतु – हे भगवन्! मैं कुछ पूछना चाहता हूँ?
आरुणि – हे पुत्र! आज तुम क्या पूछना चाहते हो?
श्वेतकेतु – हे भगवन्! मैं पूछना चाहता हूँ कि यह मन क्या है?
आरुणि – हे पुत्र! पूर्णतः पचाए गए अन्न का सबसे छोटा भाग मन होता है।
विशेषण-विशेष्य-चयनम्
विशेषणम् – विशेष्यः
इदम् – मनः
यः – अणिष्ठः
तत् – मनः
अव्ययानां वाक्येषु प्रयोगः
किञ्चित् (कुछ) – सः किञ्चित् प्रष्टुम् इच्छति।
वन्दे – प्रणमामि
प्रष्टुम् – प्रश्नं कर्तुम्
इच्छामि – वाञ्छामि
अणिष्ठः – लघिष्ठः, लघुतः।
चिरञ्जीव – दीर्घायु
प्रष्टव्यम् – प्रष्टुं योग्यम्
आशितस्य – भक्षितस्य
चिरञ्जीव – दीर्घायु
प्रष्टव्यम् – प्रष्टुं योग्यम्
आशितस्य – भक्षितस्य
2. श्वेतकेतुः – कश्च प्राणः?
आरुणिः – पीतानाम् अपां योऽणिष्ठः स प्राणः। श्वेतकेतुः – भगवन्! का इयं वाक्?
आरुणिः – वत्स! अशितस्य तेजसा योऽणिष्ठः सा वाक्। सौम्य! मनः अन्नमयं, प्राणः आपोमयः वाक् च तेजोमयी भवति इत्यप्यवधार्यम्।
श्वेतकेतुः – भगवन्! भूय एव मां विज्ञापयतु।
आरुणिः – सौम्य! सावधानं शृणु! मथ्यमानस्य दध्नः योऽणिमा, स ऊर्ध्वः समुदीषति। तत्सर्पिः भवति।
श्वेतकेतुः – भगवन्! भवता घृतोत्पत्तिरहस्यम् व्याख्यातम्। भूयोऽपि श्रोतुमिच्छामि।
आरुणिः – एवमेव सौम्य! अश्यमानस्य अन्नस्य योऽणिमा, स ऊर्ध्वः समुदीषति। तन्मनो भवति। अवगतं न वा?
शब्दार्था:-
अन्नमयम्-अन्न से बना हुआ, पीतानाम् पिए हुए के, अपाम्-पानी का, अणिष्ठः-सबसे छोटा, वाक्-वाणी, तेजसा अग्नि से, आपोमयः-जल में परिणत अर्थात् जल में परिवर्तित, तेजोमयी-तेजस्वी, प्रभावशाली, अवधार्यम्-समझने योग्य, भूयः-एक बार फिर, विज्ञापयतु-समझाओ, मथ्यमानात्-मथे जाते हुए के, दन:-दही के, समुदीषति-ऊपर उठता है, ऊर्ध्व-ऊपर, अणिमा-सबसे छोटा भाग, सीपः-घी, व्याख्यातम्-व्याख्या कर दी है, घृतोत्पत्तिरहस्यम् घी के बनने के रहस्य को, श्रोतुम्-सुनने के लिए, अश्यमानस्य-खाए जाते हुए, अवगतम्-समझ गए, वा-या। अथवा, भवता-आपके द्वारा।
अर्थ-श्वेतकेतु – और प्राण क्या है?
आरुणि – पिए गए तरल द्रव्यों का सबसे छोटा भाग प्राण होता है।
श्वेतकेतु – हे भगवन्! वाणी क्या है? ।
आरुणि – हे पुत्र! ग्रहण की गई ऊर्जा का जो सबसे छोटा भाग है, वह वाणी है। हे सौम्य! मन अन्नमय, प्राण जलमय तथा वाणी तेजोमयी होती है-यह भी समझ लेना चाहिए। श्वेतकेतु – हे भगवन्! आप मुझे पुनः समझाइए।
आरुणि – हे सौम्य! ध्यान से सुनो। मथे जाते हुए दही की अणिमा (मलाई) ऊपर तैरने लगती है, उसका घी बन जाता है।
श्वेतकेतु – हे भगवन्! आपने तो घी की उत्पत्ति का रहस्य समझा दिया, मैं और भी सुनना चाहता हूँ।
आरुणि – सौम्य! इसी तरह खाए जाते हुए अन्न की अणिमा (मलाई) ऊपर उठती है, वह मन बन जाती है समझ गए या नहीं?
विशेषण-विशेष्य चयनम्
विशेषणः – विशेष्यम्
इयम् – का/वाक्:
व्याख्यातम् – रहस्यम्
सा – वाक्
तत् – मनः
अव्ययानां वाक्येषु प्रयोगः
पदानि – वाक्येषु प्रयोगः
भूयः (बार बार)- सः भूयः पाठान् असमरत्।
एवमेव – अहम् तु सदैव एवमेव करोमि।
न – त्वम् कथम् इदम् न अकरो:?
वा (अथवा) – त्वम् अधुना पठ भ्रम वा।
पर्यायपदानि
पदानि – पर्यायपदानि
अपाम – जलम् / जलानाम्
अन्नमयम् – अन्नविकारभूतम्
तेजोमयः – अग्निमयः
अवधार्यम् – अवगन्तव्यम्
भूयोऽपि – पुनरपि
सर्पिः – घृतम्, आज्यम्
अणिष्ठः – लघुतमः, लघिष्ठः
आपोमयः – जलमयः
वाक् – वाणी
विज्ञापयतु – प्रबोधयत
समुदीषति – समुत्तिष्ठति, समुद्याति, समुच्छलति
अश्यमानस्य – भक्ष्यमाणस्य, निगीर्यमाणस्य
विलोमपदानि
पदानि – विलोमपदानि
मथ्यमानस्य – अमथ्यमानस्य
भूयः – एकवारम्
अणिष्ठः – गरिष्ठः
श्रोतुम् – वक्तुम्
ऊर्ध्वः – अधः
रहस्यम् -प्रकटम्
अवगतम् – अनवगतम्
3. श्वेतकेतुः – सम्यगवगतं भगवन्!
आरुणिः – वत्स! पीयमानानाम् अपां योऽणिमा स ऊर्ध्वः समुदीषति स एव प्राणो भवति।
श्वेतकेतुः – भगवन्! वाचमपि विज्ञापयतु।
आरुणिः – सौम्य! अश्यमानस्य तेजसो योऽणिमा, स ऊर्ध्वः समुदीषति। सा खलु वाग्भवति। वत्स!
उपदेशान्ते भूयोऽपि त्वां विज्ञापयितुमिच्छामि यत्, अन्नमयं भवति मनः, आपोमयो भवति प्राणाः तेजोमयी च भवति वागिति। किञ्च यादृशमन्नादिकं गृह्णाति मानवस्तादृशमेव तस्य
चित्तादिकं भवतीति मदुपदेशसारः। वत्स! एतत्सर्वं हृदयेन अवधारय।
श्वेतकेतुः – यदाज्ञापयति भगवन्। एष प्रणमामि।
आरुणिः – वत्स! चिरञ्जीव। तेजस्वि नौ अधीतम् अस्तु (आवयोः अधीतम् तेजस्वि अस्तु)।
शब्दार्थाः-
विज्ञापयतु-समझाओ, उपदेशान्ते-व्याख्यान के अंत में, पीयमानानाम्-पिए जाते हुए, किञ्च-इसके अतिरिक्त, तेजस्वि-तेजस्विता से युक्त, हृदयेन-हृदय में, चेतना में, मदुपदेशसार:-मेरे उपदेश का सार, चित्तादिकम्-मन, बुद्धि और अहंकार आदि, अवधारय-धारण कर लो, समझ लो, आज्ञापयति-आज्ञा देते हैं; अस्तु-हो, नौ-हम दोनों का, गृह्णाति-ग्रहण करता है, यादृशम्-जैसा, तादृशम्-वैसा, प्रणमामि-प्रणाम करता हूँ, चिरञ्जीव-लंबी आयु वाले हो, वत्स-पुत्र, अधीतम्-पढ़ा हुआ अध्ययन।
अर्थ –
श्वेतकेतु – अच्छी तरह समझ गया भगवन्।
आरुणि – हे पुत्र! पिए जाते हुए जल की अणिमा प्राण बन जाती है।
श्वेतकेतु – हे भगवन्! वाणी के बारे में भी समझाए।
आरुणि – हे सौम्य! शरीर द्वारा ग्रहण किए गए तेज (ऊर्जा) की अणिमा वाणी बन जाती है। हे पुत्र!
उपदेश के अंत में मैं तुम्हें पुनः यही समझाना चाहता हूँ कि अन्न का सारतत्व मन, जल का प्राण तथा तेज का वाणी है। इसके अतिरिक्त अधिक क्या, मेरे उपदेश का सार यही है कि मनुष्य जैसा अन्न ग्रहण करता है उसका मन, बुद्धि और अहंकार (चित्त) वैसा ही बन जाता है।
हे पुत्र! इस सबको हृदय में धारण कर लो। (अच्छी प्रकार से समझ लो)
श्वेतकेतु – जैसी आपकी आज्ञा भगवन्! मैं आपको प्रणाम करता हूँ।
आरुणि – हे पुत्र! दीर्घायु हो, तुम्हारा अध्ययन तेजस्विता से युक्त हो। (हम दोनों की पढ़ाई तेजयुक्त हो)।
पर्यायपदानि
पदानि – पर्यायपदानि
अस्यमानस्य – भक्ष्यमाणस्य, निगीर्यमाणस्य
तेजस्वि – तेजोयुक्तम्
अधीतम् – पठितम्
अवगतम् – अवगच्छम्
वाक् – वाणी
इच्छामि – वाञ्छामि
मत् – मे
आज्ञापयति – आज्ञां ददाति
चित्तम् – मनः
नौ – आवयोः
सम्यक् – भली-भाँति
ऊर्ध्वः – ऊपरि
विज्ञापयितुम् – अवगमयितुम्
गृहणाति – ग्रहणं करोति
अवधारय – धारणं कुरु
प्रणमामि – नमामि/प्रणमामं करोमि
अवधारयत – ध्यानेनशृणुत
विलोमपदानि
पदानि – विलोमपदानि
सम्यक् – असम्यक
विज्ञापयतु – अविज्ञापयतु
उन्ते – आरम्भे
मत् – त्वत्
ऊर्ध्वः – अधः
सौम्य – चञ्चल/उद्दण्ड
गृह्णाति – ददाति
विशेषण-विशेष्य चयनम्
विशेषणम् – विशेष्यः
अन्नमयम् – मनः
अपोमयः – प्राणः
तेजोमयी – वाणी
स: – प्राणः
अव्ययानां वाक्येषु प्रयोगः
पदानि – वाक्येषु प्रयोगः
यादृशं (जैसा) – मनुष्यः यादृशं अन्नं गृहणाति तस्य।
तादृशं (वैसा) – चित्रमपि तादृशं एव भवति।
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