नया सबेरा कविता अतुल शर्मा द्वारा

 हल्की हल्की वर्षा थी गुल्मोहर के पेड़ पर था गौरैयों का बसेरा

 गौरैयों  दम्पती के आंगन में आया था नया सवेरा ..... अंडो से बाहर की दुनिया थी विचित्र,

 'बच्चों के झुंड लगने लगे सचित्र, 

गौरैया ने पंखो को फैलाया, 


आज उसने अपने छोटे बच्चों को वर्षा से बचाया। 


बंद हुई वर्षा, फिर से धूप ने दर्श दिखाया। 

गौरेयां ने कर्तव्य निभा, धूप से भी बचाया।


दूर-दूर उड़कर, चिंता कर ,बच्चों को खाना खिलाया । 

बच्चे हो गये बडे, अब उनकी परीक्षा का समय है आया ,

माँ ने ममता छोड़, उन्हें घोंसले के बाहर का रस्ता दिखाया । 

 कर्मक्षेत्र में बच्चा लड़खड़ाता घोंसले से बाहर आया।


मौसा-मौसी, - चाचा - चाची ने उसका साहस बढ़ाया !


धीरे-धीरे चलना सीखा, चेहरे पर सुकून आया ।


 फिर एकदिन गौरेयाँ ने पहले खुद उड़कर दिखाया। 


अचानक से बच्चे ने, थोड़ा सा प्रयास करके दिखाया


ये देखकर गौरेयाँ दम्पती को बहुत मज़ा आया । 


फिर धीरे, धीरे, सुबह, दोपहर, शाम उड़ना सिखाया।

 बच्चों के प्रशिक्षण मे आस-पास वालों ने भी role निभाया। 

बच्चो को अब, सुबह, दोपहर, शाम, को उड़ना था आया।


समय बदला, फिर से वर्षा का दिन आया

 ले गौरेयां उड़ चली, बच्चों ने बर्णा मे भी उड़कर दिखाया ।



वर्षा में पंख हो गये भारी, पहली उड़ान में शरीर लड़खड़ाया ।

 मौसा-मौसी,  चाचा-चाची ने बार-बार साहस बंधाया। मिलजुल कर सभी ने बच्च्चों को कर्ममार्ग दिखलाया ।

अतुल शर्मा

TGT SANSKRIT

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