आत्मनिर्भर कविता अतुल शर्मा द्वारा
* खुद में इतना साहस भर
जीवन जी ले, लोकर निडर
हिम्मत, साहस के तू कार्य कर
और हो जा तू आत्मनिर्भर ......
*मन - बुद्धि-शरीर का जब हो एक स्वर
कठिन से कठिन कार्यों को कर तर वितर
छोटे बच्चे जैसे एक दिन माँ का हाथ छोड़कर, दौड़ जाते हैं अपने आत्म सुख पर .....
यही जीवन का प्रथम गुण है नाम है आत्मनिर्भर..
* ईश्वर ने सृष्टि बनायी यही सोचकर...
पक्षी के पंख बनाये ताकि वो सानन्द जिये उड़कर,
नदी को गति दी ताकि वो चले से इधर उधर,
नन्हीं सी चींटी को पाँव दिये ताकि वो भी जिये चलकर,
यदि पक्षी, नदी, चींटी नहीं है किसी पर निर्भर.
तो फिर हम क्यों ना हो आत्मनिर्भर....
विशाल पर्वतों से गिरता जल करता छर छर.. भक्तों की टोली करती हर हर ..
शेर के डर से भागते. पशु इधर-उधर
अगर तुम में हिम्मत है तो फिर कौन चाहेगा कि तू मर
सभी विपदाओं से डटकर तू सामना कर -
एवं हो जा तू आत्मनिर्भर,
ध्यान रख जीवन है तेरा और इस दौर में स्वयं का आंकलन कर
क्या करोना रूपी भंवडर से निकल सकता है तू बच कर... "
निकलूंगा और निकल सकता है तू ऐसा संकल्प कर --
क्या करना है क्या कर रहा हूँ इसका हमेशा ध्यान कर
सदमार्ग पर चलकर हो जा तू अमर--- एवं सदैव जियो होकर आत्मनिर्भर -
अपने जीवन में ऐसी सुगन्ध भर, कि दिखे तू आकर्षक जैसे - केसर
सेब की तरह अपना वजन धर
ना गिर सके, ना तोड़ सके ऐसा सामर्थ्य भर कितने आएँ तूफान और चाहे हो जाए उथल-पथल
आज-कल-पल-तल मैं निकाल हल और
हो जा तू आत्मनिर्भर....
....
जल ही जीवन है और उस जीवन को तू ऐसे संवार जैसे हो अमृतसर
भांगडा हो नस नस तेरी और तू सदा सेवा कर
हिमाचल की भाँति हो तू अचल, पहाडों की ढलानों और घाटियों की तरह तू बिखर
राजाओं जैसा हो तेरा स्थान, रोहिडा के पुष्प सा तू हो महान,
कदमों में करके जहान्, हिन्दुस्थान को करके शक्तिमान, और जोर से आहभर
और हो जा तू आत्मनिर्भर ...
योद्धा ताना जी की तरह, अपने कार्य को कर डटकर है
अपने संकल्प को ऐसा मजबूत कर
जैसे पठार है बस्तर
घुलकर किसी की खुशी मे बन जा तू चूना पत्थर ।
छिपकली टकरा जाए जैसे सर्प से,
हो जा तू भी ऐसे आत्मनिर्भर ...
बंजर भूमि पर पैदा कर ज्वार और बना दे तू उसे महाराष्ट्र ।
औषधरूप बनारस का तू पान कर, नित्य निरंतर ,
गंगादि नदियों में सहृदय श्रद्धा धर
पाप प्रलय हेतुः बन जा तू चोरावाडी सर
तू बरस , भूल तरस, ना हा कोई तुमसे निरस, ऐसा तू काम कर,
हो जा तू भी आत्मनिर्भर
* छोटी खुशी बना जैसे लुसाई का केर,
पादांगुलियों से घुंगरु रूपी स्वाराघात उत्पन्नकर अपने आवास को बना मणिपुर,
निश्चल होकर चरे गाय जिस तरह वन मे जाकर शक्ति संपन्न होकर बना दे तू भी हरिहर जैसा विजयनगर |
जो किसी से ना कभी हारा, बन जा तू चिंकारा, तेरे चरित्र को लिखने फिर से आएं हुलुकी भास्कर,
तुझमें दिखे सर्वस्व नर, हो जा तू आत्मनिर्भर
तुम्हारे ऐसे कार जैसे शनीश्वर के लिए तिरुणलार,
आत्मनिर्भर होकर नित नए कार्य करो और कृष्ण के तरह डाकोर में पग धरो ..
- जीवन मे तेरे हो उमंग जैसे लोसर,
अपनी कीमत ऐसे बढ़ा जैसे मूगा, टसर ... कछुए की तरह छुप जा सामर्थ्य में लघुता में जैसे इंचूगेर,
चक्रव्यूह तू खुद रच जैसे घनत्व में मुन्नार एवं तरल में पेरियार .....
नन्हा सा बच्चा जैसे माँ का हाथ छोड़कर,
* बन्दर का बच्चा जैसे माँ का हाथ छोड़कर
चढ़ जाता है पेढ़ पर
'अंडा फूटते ही जैसे मेढक निकलता है कूदकर
हो जा तू भी आत्मनिर्भर ...
हे बारिश की बूँद तू जितना भी बिखर ..
है हिम्मत मुझमें, कि मैं तुम्हें इकट्ठा कर बना दूँगा एक नहर
सूखे का जहर बनने ना दूँगा कहर
मेरी इकट्ठी की बूँद जब बनेगी लहर -.
जुगनू अंधियारी रात में थोड़ा सा चमककर,
दौड रहा है ना जाने किसकी तलाश में इधर उधर ...
सीख रहा हूँ मैं भी इनसे यह कैसे रहते है। आत्मनिर्भर .....
एक दिन चलती चीटियों को रोक कर →
चढ़ा लिया हथेली पर कुछ ऐसे ही सोचकर - नहीं रुकी बो,
मैने समझा, जैसे वो कर रही है तू अपना
काम कर
बस मस्तिष्क में लगी ज्वाला,
बना गई मुझे आत्मनिर्भर .....
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