क्या वो आदमी था ?
गुप्त अंग दिख रहे थे ,उसका पैजामा फटा हुआ था, वह कहां जा रहा था उसको कोई पता नहीं ,उसको कहां जाना है इसका भी पता नहीं
बात है उन दिनों की जब मैं दसवीं कक्षा में पढ़ता था,
हॉस्टल से घर आकर मैं ,अपने घर से तुरंत निकल कर चला गया, क्योंकि आते समय मैंने एक ऐसा दृश्य देखा जो मुझे अंतर्मन से व्यथित कर गया | मैंने घर में अपना सामान रखा ,उसमें घर में कोई नहीं था | इसलिए मैंने फटाफट सामान रख और फिर से पीछे की ओर चला गया |
मेरे घर के साथ में मिलता एक जंगल है | जंगल के बीचो बीच से सड़क निकलती है बस उसी सड़क के किनारे मैंने उसे देखा था ।
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आकाश एकदम काला दिख रहा था और बारिश का मौसम भी था बिजली चमक रही थी
और वह अपना हाथ इधर उधर चला रहा था |
मैं जब उसके पास पहुंचा, मैंने उसे बुलाया चाचा क्या बात है ? आप कहां जा रहे हो ? मैंने ऐसे उनसे एक दो बार पूछा - लेकिन कोई जवाब मुझे नहीं मिला |
मुझे ऐसा लगा जैसे मैं पत्थर से बात कर रहा हूं तभी मेरा प्रश्न है कि क्या वह आदमी था ?
जी हां वह आदमी ही था ईश्वर की बनाई हुई एक ऐसी कृति जो असंख्य मानवों में से एक विचित्र कृति थी |
मैंने अपने दिल ही दिल में यह कहा वाह ! ईश्वर, आपने भी क्या सृष्टि को बनाया है आयु में तो वह लगभग 50 वर्ष के लग रहे थे | मेरे द्वारा पूछने पर जब उनका कोई जवाब नहीं आया तो मैंने उनको स्पर्श किया स्पर्श करते ही उन्होंने मुझे जोर से पकड़ लिया |
मैं डरा क्योंकि मैंने उन्हें पहले कभी देखा नहीं था | क्योंकि मैं ज्यादातर गुरुकुल में ही रहा और घर में आने का मौका चार-पांच महीने बाद ही मिलता था |
जब उन्होंने मुझे पकड़ा मैं एकदम से अपना आप छुड़ाने लगा और काफी जोर से मैंने अपना हाथ छुड़ा लिया | मैं चार कदम पीछे की ओर आ गया |
मैंने सोचा की क्या बात है इन्होंने मेरे प्रश्न का जवाब नहीं दिया और ना ही इन्होंने कुछ मुझसे बोला और सीधा पकड़ लिया ऐसा क्यों ?
ईश्वर की ही प्रेरणा से मैं सारी बात समझ गया | मैंने फिर से जाकर के उन्हें स्पर्श किया स्पर्श करते ही उन्होंने मुझे पकड़ा और मुझे हाथ से इशारा किया जिस तरफ उन्होंने इशारा किया ,उस तरफ एक रास्ता पहाड़ी की ओर जा रहा था मैं उस रास्ते पर चलने लगा |
क्योंकि मैं इतना चला नहीं इसलिए मेरी रफ्तार उनसे कम थी | वह तेज़ चल रहे थे | मैं मात्र उनको पकड़ के सीधे रास्ते से लेकर जा रहा था | कहने का अर्थ यह है कि पहाड़ी रास्तों में कई बार खाई कांटे पत्थर यह सब होते हैं |
मैं सिर्फ उन्हें इससे बचा रहा |
रास्ते में एक छोटी सी नदी आई जिसको हमने पार किया और उसके बाद सीधी पहाड़ी के ऊपर चढ गए चलते समय मैं यह सोच रहा था - की इतनी रात में यदि मैं नहीं आता तो यह मानव कहां पर रहता ? क्या करता ?
आज मैंने भी ठान लिया था कि यह यहां तक जाएगा मैं इसके साथ साथ ही चलूंगा |
मैंने एक बार भी नहीं सोचा की मैंने घर में नहीं बताया घर वालों ने मेरा सामान देखकर क्या सोचा होगा | घरवाले घबराए होंगे लड़का कहां चला गया इत्यादि | अंधेरा था मुझे याद है क्योंकि उस अंधेरे में ,मैं भी कई बार गिरा मेरे साथ वह व्यक्ति भी गिरा ,लेकिन फिर उठा फिर चला |
रास्ते में उस व्यक्ति के मुंह से हां हां हां सिर्फ ऐसी आवाज हीं आ रही थी | वह मुंह से गूंगा था कान से बहरा था आंखों से अंधा था कपड़े फटे थे |
अब थोड़ी दूर पर मुझे बल्ब जलता हुआ दिखा मैंने उस घर में आवाज दी अंकल !अंकल !
मेरी आवाज सुनते एक कुत्ता दौड़ा चला आया | जैसे आज वह मुझे काट दे |
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अब कुत्ते की आवाज और कुत्ते का आना मुझे तो दिख रहा था अगर मैं भाग जाता तो कुत्ता उस व्यक्ति को खा जाता | मैं डाटा रहा तभी घर के मालिक बाहर आए और उन्होंने कुत्ते को रोक दिया | उनके घर पर पहुंचा लेकिन व्यक्ति मुझे अभी भी आगे की ओर खींच रहा था | मैंने थोड़ा सा रुक कर अंकल से पूछा _ इन व्यक्ति को आप जानते हो उत्तर मिला हां हम जानते हैं इन्हें |
तब अंकल ने मुझसे पूछा कि आपको यह कहां मिले और आप कौन हैं मैंने अपना सारा परिचय दिया |
तब उन्होंने मुझे उत्तर दिया कि यह सामने पहाड़ी पर रहते हैं कोई नहीं आप इन्हें यही छोड़ दो ,हम इनको कल घर पहुंचा देंगे |
मैं उन्हें छोड़कर वहां से घर भागा चला आया मेरे घर से उस घर तक की दूरी लगभग 3 किलोमीटर होगी |
मैं पूरी रफ्तार में भागा |
घर पहुंचा | मम्मी ने मुझे दिल से लगा लिया | घबराए हुए उन्होंने पूछा तू कहां चला गया था | हम तुम्हें कब से ढूंढ रहे थे | मैंने उन्हें सारी बात बता दी |
तभी मां ने कहा यह आदमी हमने भी कई बार देखा है अकेला ही सड़क पर लाठी लेकर इधर-उधर घूमता रहता है|
उस दिन मैंने भोजन किया और सो गया थोड़े दिन घर में रुका |लेकिन मेरे मन में उस व्यक्ति का चित्र हमेशा सजग रहा जीवंत रहा | गांव में हम लोग अपने पशुओं को पानी पिलाने के लिए जलाश्य पर ले जाते हैं | अर्थात नदी पर ले जाते हैं या तालाब पर | एक दिन मैं जलाश्य गया था, वहां मुझे एक वृद्ध आदमी दिखाई दिए मैंने उनसे उस अनजान व्यक्ति की बात की |
उन्होंने मुझे उसका परिचय दिया | उन्होंने कहा की वह एक अंधा व्यक्ति है जो ना सुन सकता है ना बोल सकता है |
जिस व्यक्ति के घर तूने उसे छोड़ा वह उसका भाई है |
मैं तो हैरान रह गया की कैसे एक भाई अपने घर में आराम से बैठा है |
दूसरा भाई सिर्फ रस्ते पर चलने के लिए तरस रहा है | मुझे पता चला की उस व्यक्ति को उसके परिवार वाले किसी काम का ना समझ कर यूं ही घर से बाहर सड़क पर आकर छोड़ देते थे |
ऐसी स्थिति में व्यक्ति एक फकीर के पास चला जाता था वह फकीर उसे खाने के लिए भी देता था और कुछ पैसे भी देता था | उन पैसों को वह अपने साथ मुट्ठी में पकड़ कर रखता था |
मुट्ठी में पकड़ कर रखता था लेकिन वह पैसे देता किसको था ? इत्यादि प्रश्न मेरे दिलो-दिमाग में चलने लगे ऐसे व्यक्ति का जीवन कैसा होता होगा ?
जिसे ना पता हो कि अभी रात है या दिन ?
अभी बिजली चमक रही है या बादल गरज रहे हैं ?
पास से सांप जा रहा है या दौड़ता हुआ शेर आ रहा है ?
नदी में बाढ़ आ रही है या तेज रफ्तार में सड़क पर कोई गाड़ी आ रही है ?
क्या वह अकेला आदमी था जो इस चराचर जगत में एक मात्र था मेरे ख्याल से विश्व में ऐसे कई लोगों के लोग होंगे जिन्हें आपके हाथ की जरूरत है | ऐसे लोग किसी ऋषि मुनि से कम नहीं है |
उनके पास एक ऐसी रोशनी है जिनसे वह हमेशा देदीप्यमान रहते हैं |
मुझे उसे फिर से देखना था इस बार मैं घर में बता कर के उसे देखने जा रहा था | मैं वहां पहुंचा एक मकान जो कि मिट्टी से बना हुआ था |
पास में ही दीवार के पास बैठा हुआ था आज भी उसके शरीर पर वही वस्त्र थे |
देखने में ऐसे लग रहा था जैसे किसी गौर चिंतन में डूबा हुआ हो |
एक तरफ वृक्ष की ठंडी छाया थी दूसरी ओर उसकी काया थी जिसने अपने जीवन में धूप और छाया को कभी देखा ही नहीं |
संस्कृति संस्कृत सरिता की प्रस्तुति
बहुत अच्छा लिखा है।
जवाब देंहटाएंएकदम शानदार अतुल भाई
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