भारतीय सनातन संस्कृति में जाप का महत्त्व JAAP IN INDIAN CULTURE SANSKRITI

जाप की भूमिका 
जाप अर्थात जप एक ऐसी विधा है जिसमें हम किसी एक नाम अथवा काम को बहुत बार आवृति करके करते है | जैसे आपने आदि कवि वाल्मीकि के विषय में सुना होगा की उन्होंने राम राम ऐसा कह कर , अर्थात इसको बार बार बोल बोल कर , सालों तक इसी को बोल बोलके रामायण का ज्ञान अर्जित किया | ऐसे ही जाप के ऐसे किस्से हमारी संस्कृति में भरे पढ़ें है |बहुत से ऐसी बातों से भारतीय संस्कृति में आस्था रखने वाले विचारकों ने इस जाप को अनेकों रूप दे दिये | जैसे हर व्यक्ति को अथवा मस्तिष्क पर ज़ोर देने वाले व्यक्ति को ये अनुभव होने लगा कि , भारतीय संस्कृति में जिन 33 कोटि देवताओं की बात की गयी है वो सभी कुछ न कुछ लाभ जरूर देते हैं |

किस प्रकार से किया जाता है जाप :- आज के संदर्भ  में  अगर देखें तो व्यक्ति 
किसी भी कार्य को करने से पूर्व ही फल की इच्छा करने लग जाता है , मानव हर कार्य को दैवीय शक्ति के द्वारा करवाना चाहता है | वो अपनी संस्कृति का पूर्णतया लाभ लेना चाहता है यदि किसी को इस संस्कृति में लाभ प्राप्त ना हुआ हो तो वो अन्य धर्म तक स्वीकार करने लग जाता है | अब बात करते हैं कि किस प्रकार से जाप किया जाता है |

जाप करने के अनेकों प्रकार हैं जिनमे तीन प्रकार इस प्रकार हैं :- वाचक। उपांशु | मानसिक | इन तीनों में श्रेष्ठ मानसिक जाप को बताया गया है | मानसिक जाप करते समय आपका मन उस वस्तु /देव में केन्द्रित होना चाहिए जिसके लिए आप समर्पित हैं अपनी काया को लेकर |
 
जाप कैसे करें   :-  जाप कैसे करें अर्थात शरीर की सहायता से किस प्रकार इश्वर , देव अथवा किसी वस्तू का नाम किस प्रकार बार बार लेकर उसे अपनी ओर आकर्षित करें | जाप बैठकर करें, खड़े होकर, अथवा चलते या कोई क्रिया करते हुए | किसी भी स्थिति में जाप करें या कोई विशेष आकार में ही जाप किया जाता है |

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